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Updated: 23 मई, 2018 03:41 PM
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हरदनहल्ली देवेगौड़ा कुमारस्वामी भी बीएस येदियुरप्पा की तरह अपनी बात को सच साबित करने जा रहे हैं. येदियुरप्पा को इस्तीफा जरूर देना पड़ा लेकिन अपनी भविष्यवाणी के अनुसार वो 17 मई को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर ही माने. चुनावों के दौरान जब कुमारस्वामी के सामने कोई किंगमेकर की बात करता वो कुछ ऐसे रिएक्ट करते - 'किंगमेकर नहीं, किंग हूं मैं.' कुमारस्वामी का वो आत्मविश्वास कहें, किस्मत कहें या कोई सियासी रणनीति, कर्नाटक के किंग तो वो बन ही रहे हैं.

कुमारस्वामी का शपथग्रहण मौजूदा दौर में विपक्षी एकजुटता का सबसे बड़ा इवेंट भी बन रहा है. क्या गैर-बीजेपी और क्या गैर-कांग्रेसी, सारे के सारे विपक्षी नेता कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह का हिस्सा बनने को पहले से ही आतुर हैं.

जैसे कोई सुपर 'महागठबंधन' सम्मेलन हो!

कर्नाटक चुनाव भले ही घोर जातिवादी तरीके से लड़ा गया हो, धर्म का बढ़ चढ़ कर बोल बाला रहा हो, लेकिन कुमारस्वामी के शपथग्रहण में उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक हर गैर-बीजेपी नेता शिरकत कर रहा है.

rahul, kumaraswamy, soniaकुमारस्वामी कुर्सी पर कितने दिन?

तीसरे मोर्चे के बनने में भी खेमेबाजी देखने को मिली. एक गैर-बीजेपी और दूसरा गैर-कांग्रेस दल और नेता. कुमारस्वामी के शपथ लेने के मौके पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर केरल के पिनराई विजयन तक - और यूपी के दोनों क्षत्रप मायावती और अखिलेश यादव भी शामिल हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आंध्रप्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू भी विपक्षी एकता की डोर पकड़ रहे हैं. तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव भी होते, लेकिन उन्हें कुछ जरूरी काम आ गया है. मंच की शोभा बढ़ाने वालों में सीताराम येचुरी, तेजस्वी यादव और कमल हासन के भी नाम हैं.

अगर 2017 के राष्ट्रपति चुनाव के वक्त से देखें तो सोनिया गांधी के लंच में अखिलेश यादव और मायावती तो मौजूद रहे लेकिन अरविंद केजरीवाल न्योता न मिलने के चलते नदारद रहे. कुछ वैसा ही हाल चेन्नई में एम करुणानिधि के जन्मदिन और फिर आरजेडी की पटना रैली में रहा - कोई न कोई किसी न किसी कारण रैली से दूर रहा.

कुमारस्वामी के शपथग्रहण का मौका विपक्ष का सबसे बड़ा जमावड़ा है जो हाल फिलहाल किसी भी मंच पर देखने को नहीं मिला है. हर मंच पर कोई न कोई गैरहाजिर रह ही गया है, वहज भले ही हर बार अलग अलग रही हो. 2015 में महागठबंधन के बैनर तले चुनाव लड़े नीतीश कुमार का शपथग्रणह और 2016 में ममता के दोबारा सत्ता में लौटने का मौका भी इतना शानदार नहीं बन सका था. वैसे तब से अब तक सियासी समीकरण काफी बदल भी चुके हैं.

शपथ से पहले श्रृंगेरी पहुंचे कुमारस्वामी का कहना रहा, "केवल मुझे नहीं, लोगों को भी संदेह है, राज्य के लोगों को भी संदेह है कि ये सरकार सुचारू ढंग से काम कर पाएगी या नहीं लेकिन मुझे भरोसा है..." हालांकि, ये भरोसा कुमारस्वामी को भगवान भरोसे ही है, ऐसा उनका ही कहना है.

2019 के लिए 'कर्नाटक मॉडल'

2014 का चुनाव बीजेपी ने 'गुजरात मॉडल' के साथ लड़ा था और दिल्ली की कुर्सी पर कब्जा कर लिया. उसके बाद से ही बीजेपी को चैलेंज करने के लिए विपक्ष एकजुट होने की लगातार कोशिश कर रहा है, लेकिन बार बार बिखर जा रहा है.

2019 के लिए विपक्ष के हाथ 'कर्नाटक मॉडल' लगा है. इस 'कर्नाटक मॉडल' पहले सिर्फ कांग्रेस का मालिकाना हक रहा. कांग्रेस अपने कर्नाटक मैनिफेस्टो को भी 2019 का ब्लू प्रिंट बता रही थी. कांग्रेस के हिसाब से देखें तो ये 'विकास' का मॉडल रहा, लेकिन अब वो 'गठबंधन' का मॉडल बन चुका है.

'कर्नाटक मॉडल' अब गठबंधन का वो रूप ले चुका है जिसमें कांग्रेस कुर्बानी देती है. अगर 2019 में यही मॉडल कायम रहता है तो कांग्रेस को कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद की तरह ही प्रधानमंत्री पद की भी कुर्बानी देनी पड़ सकती है.

rahul, mamata'कर्नाटक मॉडल' मंजूर होगा क्या?

लाख चटे का सवाल भी यही है कि क्या कांग्रेस प्रधानमंत्री पद की कुर्बानी दे पाएगी? वैसे कांग्रेस में देखा जाये तो सोनिया गांधी की ही तरह राहुल गांधी भी प्रधानमंत्री पद के अनिच्छुक रहे हैं. 2004 में सोनिया गांधी के पास प्रधानमंत्री बनने का मौका था, लेकिन उन्होंने बड़ी संजीदगी से ठुकरा दिया और मनमोहन सिंह को कुर्सी पर बिठा दिया. ये बात अलग है कि मनमोहन सिंह को 'एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' का तमगा हासिल रहा. अगर राहुल गांधी चाहते तो मनमोहन की दूसरी पारी खुद संभाल सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वैसे भी मनमोहन सिंह तो जब तब राहुल गांधी के लिए कुर्सी खाली करने की बात करते ही रहे. हालांकि, ये बीती बातें हैं. अब तो राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा भी जता चुके हैं. एक बार गुजरात चुनाव से पहले और दूसरी बार कर्नाटक चुनाव के दौरान.अगर 'कर्नाटक मॉडल' पर कांग्रेस, मजबूरन ही सही, राजी हो गयी तो राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का क्या होगा? वैसे राहुल गांधी ने कंडीशन तो लगा ही दी है, अगर कांग्रेस को बहुमत मिला. अगर पहले से ही ये बात दिमाग में रही तो क्या कार्यकर्ताओं के उत्साह पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा?

सीपीएम नेता सीताराम येचुरी कर्नाटक के कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को यूपी के एसपी-बीएसपी गठबंधन जैसा मान कर चल रहे हैं. येचुरी की सलाह समझें या फिर ख्वाहिश कहें, उनका कहना है 'लेफ्ट का विश्वास है कि पहले राज्य में बीजेपी के विरोध में गठबंधन सरकार बने और फिर ऐसी ही गठबंधन एकता की कोशिश 2019 लोकसभा चुनावों के लिए की जाये.'

आम चुनाव में संभावित स्थिति

ममता बनर्जी, पी. विजयन और अरविंद केजरीवाल का मंच शेयर करना देश की मौजूदा राजनीति में कोई मामूली संयोग तो कहा नहीं जा सकता. कांग्रेस केजरीवाल को अपने आयोजनों से दूर रखती आयी है. ममती की सलाह को भी कांग्रेस नेतृत्व ने नजरअंदाज ही किया है. कर्नाटक में भी मुख्य कर्ताधर्ता कांग्रेस ही है लेकिन आयोजन पूरी तरह उसका नहीं है. कर्नाटक चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने कांग्रेस को 2019 के लिए न्योता दिया था, लेकिन कांग्रेस नेताओं ने उनके कोलकाता पहुंचने तक नामंजूर कर दिया.

विपक्षी एकजुटता का सवाल वहीं आकर अटक जाता है - क्या कांग्रेस या राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद की कुर्बानी देने को तैयार होंगे? वस्तुस्थिति तो यही है कि बंटा विपक्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता. कांग्रेस और बाकी विपक्ष के पास एक ही मजबूत कड़ी है और वही कमजोर कड़ी भी है - प्रधानमंत्री पद. चाहे विपक्ष राहुल गांधी के नाम पर राजी हो जाये, चाहे राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी छोड़ दें. देखा जाये तो दोनों ही पक्षों के लिए ये बराबर ही मुश्किल है.

एक आखिरी रास्ता ये जरूर बचता है कि सीटों की संख्या के हिसाब से प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी तय हो. विपक्षी नेताओं को ये शायद ही मंजूर हो क्योंकि अभी तक कोई ऐसी पार्टी नहीं दिखती जो कांग्रेस से ज्यादा सीटें लाने की कुव्वत रखती हो. विपक्ष में भी कई नेताओं को राहुल गांधी का नेतृत्व कतई मंजूर नहीं होगा. ऐसे नेता सोनिया के नाम पर तो तैयार हो सकते हैं, लेकिन लेकिन राहुल के नाम से उन्हें हद से ज्यादा परहेज है.

ऐसे में जबकि मोदी सरकार चार साल के जश्न की तैयारियों में जुटी है, पहले कर्नाटक का हाथ से निकल जाना और फिर विपक्षी एकता की नींव पड़ते दिखायी देना बीजेपी के लिए टेंशन बढ़ाने वाला है. बीजेपी के लिए राहत की एक ही बात है जो हर तरफ चर्चा का विषय बना हुआ है.

क्या कुमारस्वामी की सरकार 2019 तक चल पाएगी? तब भी जब बीजेपी सरकार को गिराने में कोई कसर बाकी न रखे? अगर ऐसा मुमकिन है तो 2019 के लिए 'कर्नाटक मॉडल' के कामयाबी की भविष्यवाणी करने में कोई रिस्क फैक्टर नहीं है.

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