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Updated: 06 जनवरी, 2020 10:21 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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CAA विरोध प्रदर्शनों (Protest against CAA) में पर्दे के पीछे से आंदोलन का समर्थन करने वाला जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यायल, परिसर में हुई हिंसा (JNU violence) के कारण सुर्खियों में है. बता दें कि यूनिवर्सिटी में फीस बढ़ोतरी ( Student protesting against JNU fee hike) को लेकर पिछले दो महीनों से प्रदर्शन चल रहा है. "बीते दिन भी छात्र अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद कर रहे थे. इसी दौरान मारपीट की घटना हुई. जेएनयू छात्र संघ (JNUSU blaming ABVP for violence) ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद(एबीवीपी) और यूनिवर्सिटी प्रबंधन पर इस घटना में शामिल होने का आरोप लगाया है. वहीं ख़ुद पर लगे आरोपों के बाद एबीवीपी (ABVP blaming left for violence in campus) ने तर्क दिया है कि परिसर में जो इस सबके पीछे लेफ्ट से जुड़े छात्रों का हाथ है. बीते दिन परिसर का माहौल कैसा था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लाठी डंडों और धारदार हथियारों से लैस नकाबपोश अराजक तत्व परिसर में घुसे और उन्होंने महिला छात्रों पर हमला किया. हमला कितना सुनियोजित था इसका अंदाजा विश्व विद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्ष को देखकर लगाया जा सकता है जिनके सर पर काफी चोट आई है. इसके अलावा भी तमाम छात्र ऐसे हैं जिन्हें गंभीर चोट आई हैं और जिनका इलाज चल रहा है. परिसर में जिस तरह की गुंडागर्दी हुई उसके बाद बीते कई दिनों से अपनी कार्यप्रणाली को लेकर विवादों में रहने वाली दिल्ली पुलिस एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं.

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ध्यान रहे कि जिस समय जेएनयू कैम्पस में उपद्रव हुआ, पुलिस वहां मौजूद थी. लेकिन किसी तरह का एक्शन लेने के बजाए दिल्ली पुलिस मूकदर्शक बनी रही. पुलिस पर गम्भीर आरोप लग रहे हैं. लेफ्ट और कांग्रेस का पूरे मामले को लेकर यही कहना है कि परिसर में जो कुछ भी हुआ वो दिल्ली पुलिस की शह पर हुआ.

जेएनयू में हुई हिंसा पर जैसा पुलिस का रवैया रहा खुद ब खुद साफ़ हो जाता है कि, Delhi police को 'जामिया' के लिए  तो माफ किया जा सकता है, लेकिन JNU के लिए नहीं. तमाम ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर दिख रहे हैं जो ये साफ़ कर देते हैं कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आई दिल्ली पुलिस दंगाइयों के सामने बेबस और लाचार थी. इस बात को समझने के लिए हम  जेएनयू के वीसी एम जगदीश कुमार का वो बयान देख सकते हैं जो विश्व विद्यालय के रजिस्ट्रार के माध्यम से आया है.

वीसी का बयान साफ़ बता रहा है कि जिस समय यूनिवर्सिटी में लेफ्ट और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र एक दूसरे से मोर्चा ले रहे थे पुलिस परिसर में मौजूद थी. परिसर में चल रही हिंसा के दौरान कोने में खड़ी दिल्ली पुलिस पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि अगर उसने तत्परता दिखाई होती या बल का प्रयोग करते हुए भीड़ को तितर बितर किया होता तो हालात इतने न बिगड़ते और परिसर का माहौल हिंसक रूप न लेता.

बात पुलिस के बल का इस्तेमाल करने पर हुई है साथ ही उसकी कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगे हैं तो बता दें कि बीते दिनों जब CAA को लेकर दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रदर्शन हुआ और जब उसने उग्र रूप लिया तो यही दिल्ली पुलिस थी जो हरकत में आई थी. पुलिस ने तब न सिर्फ लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़े थे बल्कि दिल्ली पुलिस जामिया कैम्पस में भी घुसी थी और हालात संभालने के नाम पर ऐसा बहुत कुछ कर दिया था जिसके बाद  विपक्ष ने दिल्ली पुलिस पर केंद्र सरकार के दबाव में काम करने का आरोप लगाया था.

सवाल ये उठता है कि जिस दिल्ली पुलिस ने कुछ ही घंटों में CAA प्रोटेस्ट के दौरान उपजी हिंसा को जामिया में काबू कर लिया. आखिर वो तब क्यों चुप थी जब गुंडे, गुंडई करते हुए जेएनयू के रूप में एक शिक्षण संस्थान की पवित्रता को धूमिल कर रहे थे. चूंकि वीसी कह रहे हैं कि समय रहते परिसर की शांति व्यवस्था को बरक़रार रखने के लिए पुलिस बुला ली गई थी. तो आखिर पुलिस ने अपना वो रूप यहां क्यों नहीं दिखाया जिस कारण उसने जामिया में किसी भी तरह की आलोचना की परवाह न करते हुए दंगाइयों को नियंत्रित किया था?

क्या कह रही है दिल्ली पुलिस

मामले के बाद दिल्ली पुलिस के पीआरओ एमएस रंधावा सामने आए हैं और उन्होंने वही जवाब दिए हैं जो उम्मीद उनसे जताई जा रही थी. एम एस रंधावा ने घटना के बैक ग्राउंड पर बात की है और कहा है कि बेक ग्राउंड - पिछले कुछ दिनों से ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन चल रहा है जिसमें स्टूडेंट्स के बीच कुछ मतभेद थे जिसमें पहले कहासुनी भी हुई थी. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि JNU एक closed कैंपस है. इसमें जो सिक्योरिटी स्टाफ होता है वो JNU प्रशासन का होता है और वही चेक करते हैं किसको परिसर में प्रवेश देना है और किसे नहीं देना है.

पीआरओ के अनुसार वहां दिल्ली पुलिस की डिप्लॉयमेंट नहीं होती. लेकिन कोर्ट के आर्डर से प्रशासनिक भवन पर दिल्ली पुलिस की डिप्लॉयमेंट होती है. पीआरओ के मुताबिक जो कॉल्स आई थीं बीते दिन वो हॉस्टल की कॉल थीं और उनमें यही कहा गया था कि स्टूडेंट्स का आपस में झगड़ा हुआ है. उसी समय पुलिस ने एक्शन लिया और स्थिति नियंत्रित की.साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि दिल्ली पुलिस की डिप्लॉयमेंट सिर्फ एडमिनिस्ट्रेशन ब्लाक तक होती है. जहां हिंसा हुई वहां पुलिस की तैनाती नहीं होती.

एमएस रंधावा ने ये भी बताया कि बीते दिन शाम 7.45 पर JNU एडमिनिस्ट्रेशन से रिक्वेस्ट की गई और उसके बाद दिल्ली पुलिस यूनिवर्सिटी में गई और फ्लैग मार्च किया और स्थिति नियंत्रित की.

अब तक क्या एक्शन लिया गया ?

मामले पर अब तक क्या एक्शन हुआ इसके बारे में बताते हुए दिल्ली पुलिस के पीआरओ ने कहा कि, इस मामले में एक एफआईआर हुई है जिसमें पूरे इंसिडेंट को रिकॉर्ड किया गया है और इसकी जांच क्राइम ब्रांच करेगा. सारी cctv फुटेज जमा हो रही हैं और जांच शुरू कर दी गई है. उन्होंने ये भी कहा कि JNU में हुए उपद्रव में 34 लोग घायल हुए थे जिन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया है.

खुद की पीठ थपथपाते हुए उन्होंने ये भी कहा है कि जिस समय घटना हुई पुलिस की प्राथमिकता थी कि मेडिकल एड दी जाए. छात्रों को उसी समय ट्रामा सेंटर ले जाया गया. उन्होंने ये भी बताया कि मामले की MLC बन गई है जिसकी जांच की जा रही है. साथ ही दिल्ली पुलिस के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा है कि इसके लिए दिल्ली पुलिस ने जॉइंट CP रैंक के अधिकारी को नियुक्त किया है जिसकी निगरानी में जांच होगी.

बहरहाल, अब जबकि दिल्ली पुलिस के दो चेहरे हमारे सामने हैं. फैसला जनता को ही करना चाहिए. जनता बताए दिल्ली पुलिस निर्दोष है या फिर उसकी नीयत में खोट है. सवाल देश की जनता से है. जनता ही हमें बताए कि क्या जिस दिल्ली पुलिस को हमने जामिया में हुई अराजकता के लिए माफ़ कर दिया था. क्या उसी दिल्ली पुलिस को हमें जेएनयू में हुई गुंडई के लिए क्षमा कर देना चाहिए? फैसला अब यूनिवर्सिटी से निकल कर जनता की कोर्ट में आ चुका है उसे जवाब देना है और हर हाल में देना है.

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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