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सियासत

 |  3-मिनट में पढ़ें  |   09-08-2018
अशरफ वानी
अशरफ वानी
  @ashraf.wani.9
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देश की उच्चतम अदालत सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका पर सुनवाई की तारीख क्या आई, जम्मू कश्मीर में बड़ा बवाल खड़ा हो गया. घाटी में पहले मुख्यधारा के राजनैतिक दलों ने प्रदर्शन शरू किए और बाद में अलगावादी संघठनों ने बंद का आह्वान देकर 2 दिन तक कश्मीर में सामान्य जनजीवन को ही ठप कर दिया.

पहले यह समझना ज़रूरी है कि 35 A है क्या

यह धारा देश के संविधान में जम्मू कश्मीर के नागरिकों को विशेष अधिकार देती है. विशेष अधिकार जैसे-

1. जम्मू कश्मीर में सिर्फ जम्मू कश्मीर के ही नागरिक ज़मीन खरीद और बेच सकते हैं. देश के दूसरे हिस्से का कोई भी नागरिक न ही जम्मू कश्मीर में ज़मीन खरीद सकता है और न ही बेच सकता है.

2. जम्मू कश्मीर में सरकारी नौकरियां सिर्फ जम्मू कश्मीर के ही नागरिक ही कर सकते हैं और देश के दूसरे राज्यों के नागरिकों के लिए यहां कोई जगह नहीं है.

3. जम्मू कश्मीर के शिक्षा संस्थानों में स्कॉलरशिप और सरकारी मदद सिर्फ जम्मू कश्मीर के ही छात्रों को मिलेगी.

jammu kashmir35 A की वजह से जम्मू कश्मीर में जनजीवन अस्त-व्यस्त

यह सब विशेष सुविधाएं जम्मू कश्मीर के उस हर नागरिक को मिलती हैं जिसके पास जम्मू कश्मीर का पुश्तैनी बाशिंदा होने का सर्टिफिकेट हो, जो हर ज़िले का डिप्टी कमिश्नर जांच के बाद जारी करता है. और जम्मू कश्मीर की हर महिला के लिए यह सर्टिफिकेट शादी तक ही मान्यता रखता है. महिला की शादी के बाद उसका सर्टिफिकेट उसके पती के नाम से जोड़कर बनया जाता है.

अगर किसी भी महिला की शादी जम्मू कश्मीर के बाहर किसी दूसरे राज्य में होती है तो उसके पास स्टेट सब्जेक्ट का अधिकार रहता है. लेकिन वह अधिकार न ही उसके पति और न ही उसके बच्चों को मिलता है और बवाल भी इसी पर है और सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी इसी मामले पर है.

लेकिन अदालत में सुनवाई हुई नहीं कि जम्मू कश्मीर में राजनीति शरू हो गयी. जम्मू कश्मीर के राजनेता ख़ास तौर से घाटी के वोट बैंक को साधने में लग गए और अपने कार्यकर्ताओं को सड़कों पर उतार दिया. यहां तक कि जम्मू कश्मीर के राज्यपाल ने केंद्र सरकार को लिखा कि वह इस मामले की सुनवाई को टालने की पहल करें लेकिन जम्मू कश्मीर में धारा 370 को खत्म करने के नारे से आगे न बढ़ने वाली भाजपा सरकार ने कोई सरकार का पक्ष सामने नहीं रखा और मामला सुप्रीम कोर्ट पर ही छोड़ दिया, ताकि मामले को राम मंदिर की ही तरह अदालत में ही लटकाकर रखा जा सके. जिससे न ही लाठी टूटे और न ही भैंस भागे.

लेकिन यह भी हकीकत है कि जम्मू कश्मीर का विलय जो भारत के साथ हुआ है वह कुछ शर्तों पर महराजा हरी सिंह ने किया था और उन शर्तों को हटाने पर जम्मू कश्मीर के भारत के साथ विलय पर ही बड़ी बहस छिड़ जाएगी जो फिलहाल सरकार नहीं चाहेगी.

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लेखक

अशरफ वानी अशरफ वानी @ashraf.wani.9

लेखक आजतक जम्मू-कश्मीर के ब्यूरो चीफ हैं

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