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Updated: 10 अक्टूबर, 2019 08:12 PM
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वुहान की मीठी यादें मन में संजोये शी जिनपिंग महाबलिपुरम के लिए मन ही मन पैकिंग कर ही रहे होंगे कि इमरान खान बीजिंग जा धमके. फिर शी जिनपिंग ने भी पाकिस्तानी राष्ट्रपति की आवभगत वैसे ही की जैसे अमेरिका में हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने किया था. चीन से ठीक पहले इमरान खान का अमेरिका दौरा वाया सउदी अरब भी खूब चर्चित रहा. अमेरिका हो या चीन इमरान की कोशिश यही होती है कि विदेश यात्राओं से पहले सउदी अरब का कोई न कोई कनेक्शन जरूर बने.

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे से पहले ही इमरान खान ने ट्रंप वाला रिकॉर्डेड टेप फिर से चला कर अपनी दुखभरी कहानी सुनायी. शी ने गौर से सुना भी और मेहमाननवाजी पर सवाल न उठे ये सोच कर यकीन दिलाने की भी भरपूर कोशिश की. ऐसा चीन की ओर से आये बयानों से मालूम होता है.

बड़ा सवाल ये है कि क्या शी जिनपिंग महाबलिपुरम पहुंचने तक इमरान खान को दिलासा देने वाली यकीनी बातें याद रख पाएंगे?

'माई नेम इज खान, लेकिन मैं शी जैसा बनना चाहता हूं'

पाकिस्तान में आम चुनाव में जीत के बाद राष्ट्र के नाम इमरान खान के संबोधन से तो ऐसा लगा था कि वो बाहर निकलेंगे तो रूख चीन की ओर ही होगा. इमरान खान ने रूख किया तो चीन का ही लेकिन ऐन पहले सउदी अरब भी घूम आये थे.

अगर इमरान खान को पाकिस्तान में किसी लोक लाज का डर नहीं होता तो प्रधानमंत्री पद की शपथ भी अलग ही अंदाज में लेते - 'माई नेम इज खान लेकिन मैं शी बनना चाहता हूं.'

कभी क्रिकेट की दुनिया के चैंपियन रहे इमरान खान की एक पुरानी ख्वाहिश अब तक अधूरी है, दरअसल, वो शी जिनपिंग जैसा बनना चाहते हैं. पाकिस्तानी अवाम को पहली बार संबोधित करते हुए भी इमरान खान बात बात पर चीन की ही बात करते नजर आये. चीन के दो दिन के ताजा दौरे में भी इमरान खान के इकबालिया बयान वही बातें दोहराते रहे.

imran khan wooing xi jinpingआखिर शी जिनपिंग जैसा क्यों बनना चाहते हैं इमरान खान?

इमरान खान ने कहा, 'हमारे लिए ये सबसे अहम चीज ये है कि किस तरह चीन ने 30 साल में 70 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर किया.' पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनते हुए इमरान खान पैसे बचाने में जुट गये थे. कई तरकीबें भी अपनायी, कोई खास नतीजा नहीं निकला उसकी भी वजह इमरान खान खुद ही बताते हैं - भ्रष्टाचार. ये भ्रष्टाचार ही है जिसके खिलाफ इमरान खान नया पाकिस्तान बनाना चाहते थे, लेकिन भारत में घुसपैठ कराने के चक्कर में सारी कवायद सिफर तक ही सिमटी रही.

इमरान खान बार बार कबूल भी करते हैं कि किसी देश में निवेश के लिए भ्रष्टाचार सबसे बड़ी बाधा होती है - और कैसे निबटें ये भी चीन से ही सीखना है.

जैसे ही बात शुरू होती है शी तलक यूं ही चली जाती है. तारीफों की चाशनी से सराबोर लफ्जों में इमरान खान कहते हैं, 'चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का सबसे बड़ा धर्मयुद्ध भ्रष्टाचार के खिलाफ है... मैंने सुना था कि पांच साल में चीन के करीब 400 मंत्री स्तर के लोगों को भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराया गया - और जेल में डाल दिया गया. मैं चाहता हूं कि राष्ट्रपति शी की ही तरह पाकिस्तान के 500 भ्रष्ट लोगों को जेल में डाल दूं.'

क्रिकेटर रहते इमरान खान ऑस्ट्रेलिया के डेनिस लिली के जबरदस्त फैन थे और हमेशा उनके जैसी ही बॉलिंग करना चाहते थे - राजनीति में आने के बाद वैसे ही इमरान खान लगता है शी जिनपिंग के फैन बन चुके हैं - जाहिर है वैसा ही बनना चाहते हैं.

खान से दोस्ती भूल कहीं शी या 'हाउडी मोदी' न करने लगें!

इमरान खान के दौरे के वक्त चीन का भी रवैया कुछ कुछ ट्रंप जैसा ही लग रहा था. आखिर ट्रंप ने भी तो एक से ज्यादा बार कश्मीर पर मध्यस्थता की बात की थी - और भारत ने भी उसी अंदाज में अब चीन को भी समझा दिया है.

कहने को तो चीन ने भी कहा ही है कि वो पाकिस्तान की संप्रभुता, स्वतंत्रता और सुरक्षा में साथ खड़ा है. बदले में पाकिस्तान ने भी कह दिया है कि वो हांगकांग को चीन का आंतरिक मुद्दा मानता है और दुनिया के सभी देशों को चाहिए कि उस अंतरराष्ट्रीय नियम का पालन करे जिसमें कहा गया है कि कोई किसी दूसरे देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा - और अगले ही पल इमरान खान चीन के सामने जम्मू-कश्मीर का मुद्दा भी उठाये.

चीन ने भी भरोसा दिलाया कि जम्मू-कश्मीर पर उसकी नजर बनी हुई है. फिर इमरान खान पाकिस्तान को चीन से मिलने वाले 'मजबूत सपोर्ट और बगैर किसी स्वार्थ के मदद' के लिए आभार भी जताया. इमरान खान कहते रहे - चीन ने हर मुश्किल में पाकिस्तान का साथ दिया है और बदले में कभी कुछ नहीं मांगा.

बड़ा सवाल ये है कि क्या चीन वास्तव में पाकिस्तान के मुश्किल वक्त में सच में साथ देगा? अगर साथ देगा तो किस हद तक? इमरान खान के अमेरिकी दौरे के वक्त ही एक अधिकारी ने कहा था कि चीन सिर्फ एक हद तक ही सपोर्ट करेगा - अगर दोनों मुल्कों के बीच जंग हुई तो चीन पाकिस्तान का साथ नहीं देने वाला.

मसूद अजहर के मामले में तो ये बात पहले ही साबित हो चुकी है. मसूद अजहर के केस में पाकिस्तान के कहने पर चीन बार बार अड़ंगा डालता रहा, लेकिन जब देखा कि दुनिया भर में उसका स्टैंड अकेला पड़ रहा है और मैसेज ये जा रहा है कि वो आतंकवाद का सपोर्ट कर रहा है तो फौरन ही पीछे हट गया - और संयुक्त राष्ट्र की ओर से मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर दिया गया.

चीन को अपना कारोबार नहीं खत्म करना और भारत जैसा बड़ा बाजार भी उसे नहीं मिलने वाला, फिर पाकिस्तान के चक्कर में चीन अपना बिजनेस तो गंवाने से रहा. चीन ये भी देख रहा है कि भारत के बाजार पर अमेरिका की भी नजर टिकी हुई है. जैसे मामला गड़बड़ हुआ अमेरिका लपक लेगा और चीन पिछड़ जाएगा. चीन ने भारत को बुलेट ट्रेन बेचने की भी पूरी कोशिश की थी, लेकिन जापान बाजी मार ले गया. जाहिर है कोई भी कदम उठाने से पहले चीन ये बातें भूलेगा तो नहीं ही.

इमरान खान भले ही कश्मीर पर चीन को साधने की जितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन चीन एक हद तक ही पाकिस्तान के साथ खड़ा रह सकेगा. वहीं तक जहां तक चीन को पाकिस्तान से स्वार्थ सिद्ध हो पाता है, भले ही इमरान इसे निःस्वार्थ रिश्ता कितना ही क्यों न समझाते रहें. कहने को तो वो भी पाकिस्तान को करीबी दोस्त से भी बढ़ कर दोस्त बता ही देता है. जब इमरान खान के कश्मीर-कश्मीर करने पर बिलावल भुट्टो कराची और सिंध पर धमकाने लगे हैं तो भला चीन को हांग-कांग से क्या कभी डर नहीं लगेगा. आखिर चीन में उइगर मुसलमानों की हालत पर भी सवाल तो उठने ही लगे हैं.

इमरान खान की चीन यात्रा भी काफी हद तक अमेरिकी दौरे जैसा ही है. वैसे तो इमरान खान को भी संयुक्त राष्ट्र में भाषण देना था, लेकिन उससे पहले उनकी कोशिश अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलकर कश्मीर मसले पर समझाने बुझाने की हर मुमकिन कोशिश ही रही. इमरान ने कोशिशें भी कीं, लेकिन पूरी तरह नाकाम रहे. हालत ये हो चली कि UNGA से पहले ही हथियार डाल दिये - कोई फायदा नहीं है. कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है. फिर UNGA में पैंतरा बदला और इस्लाम कार्ड चलाने की कोशिश की. बाद में तो मालूम ये भी हुआ कि इमरान खान के इस्लामोफोबिया प्रलाप से सउदी अरब इस कदर खफा हुआ कि मेहमानवाजी के लिए भेजा विमान ही बीच रास्ते से वापस मंगा लिया.

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे से पहले भी इमरान खान बीजिंग पहुंचे और ट्रंप वाला रिकॉर्डेड टेप फिर से चला कर दुखभरी कहानी सुनायी. शी ने गौर से सुना भी और मेहमाननवाजी पर सवाल न उठे ये सोच कर यकीन दिलाने की भी भरपूर कोशिश की. सब कुछ वैसे ही चल रहा था जैसे अमेरिका में ट्रंप-इमरान मुलाकातों में. सिर्फ जगह और पार्टनर बदले हुए थे.

सबसे बड़ा सवाल है कि क्या शी जिनपिंग महाबलिपुरम पहुंचने तक इमरान खान को दिलासा देने वाली यकीनी बातें याद रख पाएंगे - या फिर वुहान जैसे 'हाउडी मोदी' के माहौल में भूल जाएंगे? फिर तो इमरान खान की 'शी-साधना' भी तकरीबन 'ट्रंप-कार्ड' के लुट जाने जैसी ही मानी जाएगी.

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