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Updated: 04 अगस्त, 2019 05:25 PM
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6 अगस्त, 2019 से अयोध्या मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने जा रही है. रोजाना. RSS विचारक और BJP के नेता रहे केएन गोविंदाचार्य ने सुनवाई की LIVE स्ट्रीमिंग के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है.

केएन गोविंदाचार्य की ओर से ये गुजारिश विशेष मामलों के सजीव प्रसारण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के करीब साल भर बाद आयी है. सितंबर, 2018 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने इस बारे में फैसला सुनाया था. फैसला सुनाने वाली बेंच में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ शामिल थे.

गोविंदाचार्य ने सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग के लिए भी वही दलील दी है जो अब तक अयोध्या में मंदिर निर्माण को लेकर दी जाती रही है - 'ये विषय लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है.'

अयोध्या केस में लाइव स्ट्रीमिंग से क्या होगा?

'तारीख पर तारीख...' पाने वालों को छोड़ दें तो बाकी सारे लोग अदालती कार्यवाही सिर्फ फिल्मों के जरिये या सुरेंद्र मोहन पाठक जैसे लेखकों की आंखों देखी सी किस्सागोई से ही रूबरू हुए होंगे. कोर्ट रूम ड्रामा हमेशा ही बॉलीवुड का हिट फॉर्मूला रहा है और इसका सबसे ज्यादा श्रेय बीआर चोपड़ा को जाता है. 1960 में बनी फिल्म 'क़ानून' हो या फिर अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी और रजनीकांत के साथ 1983 में आई 'अंधा कानून' हो सिने प्रेमियों ने खूब पसंद किया. दस साल बाद 1993 में राजकुमार संतोषी की दामिनी में सन्नी देओल का डायलॉग तो जैसे किमवदंदी ही बन गया - 'तारीख पे तारीख... तारीख पे तारीख… तारीख पे तारीख और तारीख पे तारीख मिलती रही है… लेकिन इंसाफ नही मिला मिलॉर्ड... मिली है तो सिर्फ ये तारीख.'

ये तो सुभाष कपूर की 'जॉली एलएलबी' रही जिसने लोगों को बताया कि असली अदालतों में कोई कठघरा नहीं होता - जज जहां खड़ा कर सवाल पूछे वही कठघरा होता है.

मुख्यधारा की राजनीति छोड़ कर सामाजिक सरोकारों से जुड़े गोविंदाचार्य ने अपनी याचिका में मुख्य तौर पर तीन बिंदुओं पर फोकस किया है - और उसके पीछे तर्क पेश किया है:

1. अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद की सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग की जाए - क्योंकि ये विषय लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है. ध्यान रहे मंदिर निर्माण को लेकर यही दलील देते हुए मंदिर समर्थक अपने पक्ष में फैसला चाहते हैं.

2. चूंकि करोड़ों लोगों की आस्था इस मसले से जुड़ी है, लेकिन संभव नहीं है कि सभी लोग कोर्ट में मौजूद होकर सुनवाई के गवाह बनें - लिहाजा लाइव स्ट्रीमिंग के इंतजाम हों ताकि सभी के पास फर्स्ट-हैंड सूचना पहुंच सके.

3. संविधान के अनुच्छेद 19(1)A का हवाला देते हुए गोविंदाचार्य का कहना है - लोगों को जानने का अधिकार मिला हुआ है. लोगों को ये जानने का भी अधिकार है कि अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद की सुनवाई में क्या हो रहा है. ये तो रही गोविंदाचार्य की लाइव स्ट्रीमिंग के पक्ष में दलीलें.

अब जरा ये समझने की कोशिश की जाये कि अगर लाइव स्ट्रीमिंग हुई तो फायदा क्या होगा -

1. सबसे पहला फायदा तो ये होगा कि नेताओं और मंदिर समर्थकों की भड़काऊ बयानबाजी पर लगाम लग सकेगी. 2019 के आम चुनाव से पहले RSS और बीजेपी नेता किस तरह से आक्रामक बयानबाजी करते रहे, आप को याद ही होगा.

2. फिर तो कोई ये समझाने की कोशिश नहीं ही कर सकेगा कि केस को कोर्ट जानबूझ कर लंबा खींच रहा है - जो भी होगा लोगों की आंखों के सामने हो रहा होगा.

3. ऐसा भी होता है कि कुछ नेता कोर्ट की अवमानना की भी परवाह नहीं करते और बातों को अपने फायदे के हिसाब से तोड़ मरोड़ कर लोगों को सुनाते और समझाते रहते हैं - चूंकि लोग सब कुछ लाइव सुन चुके होंगे तो किसी के बहकावे में नहीं आएंगे.

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ये मीडिया रिपोर्ट ही हैं जिनकी बदौलत मालूम होता है कि अदालतों में सिर्फ गंभीर बहस ही नहीं कई बार जजों और सीनियर वकीलों में हल्के फुल्के अंदाज में बातचीत भी होती है और वो बड़ी ही दिलचस्प होती है. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग से पारदर्शिता के साथ साथ जवाबदेही भी बढ़ेगी, जिसे लेकर चार जजों ने प्रेस कांप्रेंस कर लोकतंत्र के लिए खतरे की आशंका जतायी थी.

फैसला सुनाते वक्त जस्टिस डीवाई चंद्रचूड का कहना रहा - 'हम खुली अदालत को लागू कर रहे हैं... ये तकनीक का दौर है... हमें सकारात्मक होकर सोचना चाहिये और देखना चाहिये कि दुनिया कहां जा रही है..."

हालांकि, तब ये भी बताया गया कि कोर्ट ने आरक्षण और अयोध्‍या जैसे संवेदनशील मामलों की सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग करने की इजाजत नहीं दी है. देखना होगा गोविंदाचार्य की अर्जी को सुप्रीम कोर्ट किस तरह से लेता है और क्या फैसला सुनाता है.

मध्यस्थता के दौरान तो रिपोर्टिंग पर पाबंदी लगी रही

2019 के आम चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने से पहले अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने या ऑर्डिनेंस लाने की मांग खूब जोर पकड़ रखी थी. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जैसे ही ये बात आगे बढ़ाई पूरे देश में बयानबाजी शुरू हो गयी. हालत ये हो गयी थी कि मंदिर निर्माण की मांग करने वाले सुप्रीम कोर्ट पर भी मामले को लटकाने और एक नेता ने तो जजों के घेराव करने तक की समर्थकों से अपील कर डाली थी. फिर अचानक विश्व हिंदू परिषद ने चुनाव तक मामले को होल्ड करने का फैसला किया और फिर संघ भी हामी भरते हुए खामोश हो गया.

हुआ तो ये कि जिस वक्त देश में आम चुनाव हो रहे थे, ऐन उसी समय अयोध्या मसले पर मध्यस्थता की कोशिशें भी जारी रहीं. सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए एक कमेटी बनायी थी. इस कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस खलीफुल्ला, सीनियर वकील श्रीराम पंचू और आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर को शामिल किया गया था. जब कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट दाखिल कर दी उसके बाद मालूम हुआ कि सारी कवायद बेकार गयी - और एक बार फिर कोर्ट में सुनवाई करनी होगी.

गोविंदाचार्य तो अयोध्या पर होने जा रही सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग की मांग कर रहे हैं, लेकिन मध्यस्थता की प्रक्रिया के दौरान तो उससे जुड़ी किसी भी बात के प्रकाशन पर पाबंदी लगी रही. खबरों के रूप में लोगों को सिर्फ ये मालूम होता रहा कि मध्यस्थता के लिए मीटिंग कब शुरू हुई और कब तक चली.

3 अगस्त, 2019 को अयोध्या पहुंचे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो कह दिया कि वो पहले से ही जानते थे कि मध्यस्थता की कोशिश नाकाम हो जाएगी. संत-महात्माओं की एक सभा में योगी आदित्यनाथ ने कहा, ‘हमें मालूम था कि इस मध्यस्थता से कुछ निकलने नहीं जा रहा है, लेकिन ये अच्छा है... यदि प्रयास होते हैं तो अच्छी बात है.’

योगी आदित्यनाथ ने एक बात और भी जोड़ दी - ‘महाभारत से पहले भी मध्यस्थता के प्रयास हुए थे, लेकिन विफल रहे.’

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