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Updated: 24 अक्टूबर, 2015 12:42 PM
डॉ. कपिल शर्मा
डॉ. कपिल शर्मा
  @delhi.kapilsharma
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इन दिनों एक नई फिल्म आयी है ‘शानदार’...इस फिल्म का गाना बड़ा चर्चित हो रहा है. गाने के बोल हैं ‘रायता फैल गया...’ और लग ऐसा रहा है कि अभिनेताओं के साथ नेता भी इसी के प्रमोशन में लगे हैं. क्योंकि आजकल हमारे देश में भी बड़ा रायता फैला हुआ है. कोई घटना-दुर्घटना-अपराध-हादसा कुछ भी हो जाए, हर बात पर रायता फैलाने के लिए कुछ लोग तैयार हैं.

यूं तो यह कह पाना मुश्किल है कि रायता फैलाने की शुरुआत कहां से हुई या फिर किसने की, लेकिन इतना तय है कि ऐसा करने वाले इस खेल के माहिर खिलाड़ी हैं और वो किसी भी चीज का रायता फैला सकते हैं. एक बात और है कि सारा रायता पीएम नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द ही फैल रहा है.

शुरुआत दादरी से ही करें. उत्तर प्रदेश के दिल्ली से सटे गांव में एक घटना हुई, जो जाहिर तौर पर पहली नजर में ही अपराध था. इस अपराध की कड़ी निंदा होनी चाहिए थी और कानून की तरफ से सख्त कार्रवाई. लेकिन यहां इस अपराध को न सिर्फ महिमा मंडित किया गया, बल्कि दूसरी तरफ इसे सांप्रदायिक रंग भी दे दिया गया. बस राजनीतिक रोटी सेंकने वालों को इससे ज्यादा क्या चाहिए. जो हुआ, देश ने देखा. यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, जिनका फर्ज बनता था गांव जाकर पीड़ित परिवार से मिलने का, उन्होंने पीडितों को मिलने के लिए लखनऊ बुला लिया.

लेकिन जिनका इस घटना से कोई लेना-देना नहीं था, वो असदुद्दीन ओवैसी गांव पहुंच गए. राहुल गांधी भी हो आए. मामला यूपी का था, तो क्या हुआ, लखनऊ के मुकाबले दिल्ली पास थी, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री भी यूपी के इस गांव में पहुंच गए. स्थानीय सांसद महेश शर्मा जो केंद्र में मंत्री भी हैं, अपराध को हादसा बता आए. संगीत सोम जो मुजफ्फरनगर दंगे को लेकर चर्चा में आए, वो भी गांव की सैर कर आए. साध्वी प्राची और योगी आदित्यनाथ भला क्यों पीछे रहते. इन सबके लिए मीडिया राष्ट्र के नाम संदेश देने का जरिया बना. नतीजा ये हुआ कि दादरी के परिवार का दर्द किसी ने समझा हो या नहीं, लेकिन देश में एक माहौल जरूर बन गया. ऐसा रायता फैला कि राष्ट्रपति तक को बोलना पड़ा और पीएम को मौन व्रत रखना पड़ा.

इसके पहले ‘घर वापसी’ का रायता भी फैल चुका है. आगरा की एक घटना से शुरुआत हुई और फिर ‘परिवार’ के लोग बहती गंगा में हाथ धोते रहे. जगह-जगह घर वापसी मुहिम चलने लगी और बात भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग तक पहुंच गई है. कौन कितने बच्चे पैदा करे, इस बात का सुझाव देने वाले लोग भी सामने आ गए. लव जेहाद नाम का रायता भी खूब फैला. लव जेहाद से निपटने के लिए धर्म के ठेकेदारों की फौज भी तैयार हो गई. वैसे इसकी शुरुआत तब हुई थी जब बीजेपी की उत्तर प्रदेश की इकाई ने इस शब्द को अपने एजेंडे में जोड़ा था.( जिसे बाद में हटा लिया गया)

वैसे रायता फैलाने के लिए ज्यादा मशक्कत भी नहीं करनी पड़ती. इंदौर से ऊषा ठाकुर नाम की एक विधायक का बयान आया कि नवरात्रि के दौरान होने वाले गरबों में मुस्लिम युवकों की एंट्री नहीं होनी चाहिए. बस फिर क्या था इस पर भी पूरे देश में रायता फैल गया.

देश में बन रहे माहौल का हवाला देकर साहित्य जगत में भी रायता फैल गया. एक के बाद एक साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की मानो होड़ लग गई. घर, दफ्तर यहां तक कि टीवी चैनल के स्टूडियो तक में पुरस्कार लौटाए गए.

इधर देश की राजधानी में भी एक अलग तरह का रायता फैला हुआ है. जबरदस्त जीत के बाद अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने, लेकिन दिल्ली सरकार का केंद्र से ऐसा टकराव जारी है, जैसा पहले कभी किसी का नहीं हुआ. पीएम और सीएम के बीच खुलेआम पोस्टरबाजी हुई. खुलेआम सरेआम अफसरों और सरकार के नुमाइंदों के बाद बयानबाजी हुई. यह हालात भी चिंताजनक ही हैं, क्योंकि दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच बात कम विवाद ज्यादा हो रहे हैं.

जम्मू कश्मीर के निर्दलीय विधायक इंजीनियर राशिद विधानसभा के बाहर बीफ पार्टी करते हैं, तो दिल्ली में उनके मुंह पर कालिख पोत दी जाती है. पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की किताब की लांचिंग के लिए सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर कालिख पोत दी गई. सबका रायता फैलाने का अपना तरीका है. जिसके मुंह पर कालिख पुत रही है उसे भी आनंद आ रहा है और जो पोत रहा है, उसका भी उल्लू सीधा हो रहा है. लेकिन इन सबके बीच देश के माहौल में खटास आ रही है. ये खटास कहीं सड़ांध न बन जाए, खतरा अब यही है.

इन सारे घटनाक्रमों के बीच दिलचस्प ये है कि सारी घटनाओं के केंद्र में मोदी सरकार है. बीजेपी और मोदी समर्थकों की दलील में दम हो सकता है कि हर बात केंद्र सरकार से संबंध नहीं रखती है, लेकिन याद यह भी रहना चाहिए कि बात का बतंगड़ बनाने में ‘परिवार’ के लोग भी शामिल हैं. बात ये भी है कि लोग पीएम मोदी और गुजरात के सीएम रहे मोदी के बीच के फर्क को सतह पर देखने की चाहत रखते हैं, इसीलिए सभी घटनाओं में एक समानता है कि ये सब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद की हैं. बड़े हादसे भी हैं, जघन्य अपराध भी और छोटी छोटी घटनाएं भी, लेकिन माहौल में बेचैनी है, जिसे खत्म करना जरूरी है.

बार-बार सवाल उठता है कि इन घटनाओं पर पीएम की चुप्पी क्यों होती है, क्या पीएम के बोलने से घटनाएं रुकेंगी. या फिर पीएम जानबूझकर चुप रहना स्वीकार करते हैं. सवाल इसलिए है क्योंक मोदी की छवि बोलने वाले नेताओं की है, वो पीएम बनने के बाद रेडियो पर मन की बात भी करते हैं, तब घटनाओं पर चुप क्यों रहते हैं. जबतक बोलते है, तब तक बात दूर तक जा चुकी होती है. ऐसे में माहौल को बदलने की जरूरत है.

आखिर में रायते के बारे में आपको एक बात बता दें कि रायता खाने के साथ खायी जाने वाली ऐसी चीज है जो मुख्य सब्जी या खाने का मुख्य व्यंजन नहीं होता है, बल्कि एक साइड आइटम है, लेकिन जब ये फैलता है तो पूरे खाने का मजा किरकिरा कर देता है. फिर भले ही खाना कितना ही स्वादिष्ट क्यों न बना हो. एक बात और कि रायता फैलाना तो आसान है, लेकिन इसे समेटना उतना ही मुश्किल.

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लेखक

डॉ. कपिल शर्मा डॉ. कपिल शर्मा @delhi.kapilsharma

लेखक टीवी टुडे में एंकर और पत्रकार हैं.

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