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Updated: 14 सितम्बर, 2015 01:37 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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जनवरी, 1975 में नागपुर में पहला हिंदी सम्मेलन हुआ था. उस वक्त इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. उस सम्मेलन में जानीमानी कवयित्री महादेवी वर्मा भी शामिल हुई थीं. तीस साल में इतना फर्क आ गया कि भोपाल हिंदी सम्मेलन से ज्यादातर साहित्यकार दूरी बनाए हुए हैं. वैसे ये दूरी सरकार की तरह से ही तय कर दी गई है.

उद्घाटन के वक्त मंच पर पूरा सरकारी अमला नजर आया. अगर कोई नहीं था तो बस हिंदी का कोई कवि या साहित्यकार. सरकारी दलील ये थी कि ये भाषा सम्मेलन है, साहित्य का नहीं.

ये बीजेपी अधिवेशन है या...

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं, "भोपाल पहुंच कर देखा - हवाई अड्डे से शहर तक चप्पे-चप्पे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों वाले विशाल पोस्टर लगे हैं, खम्भों पर भी मोदीजी के पोस्टर हैं. इनकी तादाद सैकड़ों में होगी. यह विश्व हिंदी सम्मलेन हो रहा है या भाजपा का कोई अधिवेशन? अधिकांश पोस्टर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर से हैं - शहर में मोदीजी के स्वागत वाले. अनेक में चौहान की अपनी छवि भी अंकित है. आयोजन की धुरी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज एक भी पोस्टर में मौजूद नहीं हैं. उनका स्वागत क्यों नहीं?"

विज्ञापन में बिग बी

सुबह अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन भी देखने को मिला. इसमें गौर किए जाने लायक अगर कोई चेहरा रहा तो वो था सुपरस्टार अमिताभ बच्चन का.

विज्ञापन में सबसे ऊपर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बगल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तस्वीर है. फिर उनके नीचे तीन तस्वीरें हैं - गृह मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और अमिताभ बच्चन की.

सबसे नीचे चार तस्वीरें और हैं, जो हिंदी के पुरोधाओं की हैं - ये माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, प्रदीप और भवानी प्रसाद मिश्र के फोटो हैं. इसके साथ ही अब तक जहां जहां हिंदी सम्मेलन हुए हैं - उसकी भी सूची दी गई है. ये विज्ञापन मध्य प्रदेश हिंदी प्रेमी संगठन के सौजन्य से जारी हुए हैं.

बस चाय बेचते बेचते...

हिंदी सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने खास तौर पर दो-तीन बातें बताईं. पहला, विशेषज्ञों के हवाले से प्रधानमंत्री ने बताया कि भविष्य में तीन भाषाओं - अंग्रेजी, चाईनीज और हिंदी का ही दबदबा रहेगा. दूसरा, अच्छी हिंदी जानने की वजह से ही वो प्रधानमंत्री बन पाए. तीसरी बात बताने के लिए प्रधानमंत्री ने एक किस्सा सुनाया. उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि चाय बेचते बेचते उन्होंने हिंदी सीख ली. मोदी ने कहा, "गुजरात में यूपी से लोग दूध लेकर ट्रेन से आते थे. मैं उनके लिए चाय लेकर जाता था. उन्हें गुजराती नहीं आती थी. मेरे पास हिंदी सीखने के अलावा कोई चारा नहीं था. इसी तरह मैंने हिंदी सीख ली."

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मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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