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Updated: 17 मार्च, 2019 07:30 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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जल्द ही भारत को पहला लोकपाल मिलने वाला है. जी हां ये वही लोकपाल है, जिसकी मांग अन्ना हजारे के नेतृत्व में सबसे पहले 2012 में उठी है और बात में ये मांग एक राजनीतिक आंदोलन बन गया. बताया जा रहा है कि पहले लोकपाल के लिए जल्द ही सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष के नाम पर मुहर लग सकती है. पीएम मोदी, सीजेआई रंजन गोगोई, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और प्रख्यात कानूनविद मुकुल रोहतगी की चयन समिति ने शुक्रवार को उनका नाम तय किया था. अब बताया जा रहा है कि सोमवार को उनके नाम की घोषणा की जा सकती है.

यूं तो इस चयन समिति में कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे को भी शामिल होना था, लेकिन वह शामिल नहीं हुए. खैर, भले ही खड़गे शामिल नहीं हुए, लेकिन बैठक में लोकपाल का नाम तय हो चुका है. जब से पीसी घोष का नाम लोकपाल के लिए सामने आया है, तब से लोग ये जानने के लिए उत्सुक दिख रहे हैं कि ये हैं कौन. आपको बता दें कि जस्टिस पीसी घोष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं, जो मई 2017 में ही रिटायर हुए थे. वर्तमान में वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य हैं. वह अपने कुछ खास फैसलों की वजह से जाने जाते हैं.

पीसी घोष, लोकपाल, सुप्रीम कोर्ट, अन्ना हजारेपीसी घोष कुछ खास फैसलों की वजह से जाने जाते हैं.

इन फैसलों के लिए जाने जाते हैं पीसी घोष

1- जयललिता बेहिसाब प्रॉपर्टी केस

पीसी घोष सबसे अधिक अपने उस फैसले की वजह से हुए, जो उन्होंने जयललिता की बेहिसाब प्रॉप्रटी के मामले में सुनाया था. ये मामला 21 साल से चल रहा था और जयललिता की मौत के बाद इस मामले में फैसला सुनाया गया. जयललिता ने जया पब्लिकेश की पावर ऑफ अटॉर्नी शशिकला के नाम कर दी थी, ताकि कानूनी शिकंजे से बचा जा सके. अब इस मामले में शशिकला को 4 साल की जेल की सजा सुनाई गई. इसके अलावा उन पर 10 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया गया और सजा पूरी होने के बाद 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ने के लिए अयोग्य ठहरा दिया. इस मामले में पीसी घोष ने महज 8 मिनट में फैसला सुना दिया था और कहा था- 'आप समझ सकते हैं कि कितना भारी जजमेंट है. हम काफी भार महसूस कर रहे थे.'

2- जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी रेस पर रोक

इतना ही नहीं, जस्टिस केएस राधाकृष्णन के साथ मिलकर उन्होंने ही यह फैसला भी सुनाया था कि जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी की रेस लगाना गलत है. उन्होंने इसे 'प्रिवेंशन ऑफ क्रूएलिटी टू एनिमल्स एक्ट' का उल्लंघन करार दिया था. जो चीजें सालों से चली आ रही हैं और जिसके पक्ष में लोगों का हुजूम उमड़ पड़े, ऐसे मामलों पर कोई फैसला सुनाना अपने आप में बेहद खास है.

3- अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन

उन्होंने कई ऐसे में भी मामलों में फैसला सुनाया, जिसमें राजनीतिक नेता शामिल थे. अरुणाचल प्रदेश में फरवरी 2016 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वहां लगे राष्ट्रपति शासन को हटाने की गुजारिश की थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसी दिन एक आदेश जारी करके राज्य में यथास्थिति बनाए रखने को कहा था. कोर्ट ने कहा था कि जब तक 14 बागी विधायकों के अयोग्य ठहराए जाने संबंधी आदेश की समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक यथास्थिति बनी रहेगी. आपको बता दें कि इस मामले में फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज और कोई नहीं, बल्कि पीसी घोष ही थे.

4- बाबरी मस्जिद ढहाने का मामला

जस्टिस आरएफ नरीमन के साथ उन्होंने बाबरी मस्जिद ढहाने के मामले में भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह और अन्य लोगों के खिलाफ आपराधिक षडयंत्र के तहत मामला दर्ज कराने का फैसला सुनाया था.

लोकपाल की मांग सबसे पहले 2012 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने उठाई थी. उस समय उनके साथ अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी भी थीं. उस समय लोकपाल नियुक्त करने के लिए पूरे देश में राजनीतिक आंदोलन हुआ था. 2013 में लोकपाल बिल को मंजूरी मिली और अब आखिरकार लोकपाल की नियुक्ति हो रही है. इस लोकपाल के पास ताकत होगी कि वह मौजूदा और पूर्व प्रधानमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों, सरकारी कर्मचारियों और यहां तक कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई तक की जांच कर सकता है.

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