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Updated: 08 जनवरी, 2022 10:11 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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विधानसभा चुनाव के लिए तारीखों (Assembly Poll Dates Announced) का ऐलान कर दिया गया है. चुनाव आयोग ने जो शिड्यूल पेश किया है, वो करीब करीब पिछले चुनाव की तरह ही है - और वोटों की गिनती के साथ नतीजे भी वैसे ही आएंगे. 2017 में चुनाव नतीजे 11 मार्च को आये थे, इस बार 10 को ही आ जाएंगे.

पांच राज्यों में कुल सात चरणों में चुनाव होंगे, लेकिन सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही सभी सात फेज में वोटिंग होगी. शुरुआत यूपी से होगी 10 फरवरी से. यूपी चुनाव के दूसरे चरण के साथ 14 फरवरी को उत्तराखंड, पंजाब और गोवा के भी चुनाव होंगे - और एक ही चरण में खत्म हो जाएंगे. मणिपुर में दो चरणों में वोटिंग होगी 27 फरवरी और 3 मार्च को. आखिरी दौर की वोटिंग 7 मार्च को होगी और उस दिन सिर्फ यूपी में वोट डाले जाएंगे. यूपी में वोटिंग की शुरुआत पश्चिमी उत्तर प्रदेश से होगी और किसान आंदोलन की वजह से ये सभी राजनीतिक दलों के लिए काफी महत्वपूर्ण होगा.

कोविड प्रोटोकॉल पर सख्ती से पेश आते हुए चुनाव आयोग (Election Commission) ने कई सारी पाबंदियां लागू की है. 15 जनवरी तक कोई भी जनसभा या चुनावी रैली नहीं होगी. आयोग के आदेश पर यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) का सवाल है कि जिसके पास वर्चुअल रैलियों के संसाधन कम होंगे भला वे कैसे चुनाव लड़ेंगे.

मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने तारीखों की घोषणा करते हुए कहा कि नियमों का उल्लंघन करनेवाले नेता और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के साथ तो आयोग सख्ती से पेश आएगा ही - आचार संहिता लागू कराने में कोताही बरतने वाले अफसरों की भी खैर नहीं होगी.

पश्चिम यूपी से ही शुरू होंगे चुनाव

चुनाव आयोग ने ऐसे कयासों को गलत साबित कर दिया है जिनमें जिनमें पश्चिम यूपी में आखिर में वोटिंग कराये जाने की चर्चा चल रही थी. मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने बताया शुरुआत पहले की ही तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ही होगी और पूर्वांचल में आखिर में चुनाव होंगे.

sushil chandra, yogi adityanath, akhilesh yadavवर्चुअल रैलियों वाला पहला चुनाव बड़ा चैलेंज तो है ही!

2017 में भी ऐसे ही चुनाव हुए थे और तब बीजेपी के लिए स्थितियां काफी चुनौतीपूर्ण हो गयी थीं. टिकट बंटवारे को लेकर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने काफी बवाल किया था. जिन नेताओं को टिकट नहीं मिला वे नेता तत्कालीन यूपी बीजेपी अध्यक्ष केशव मौर्या की गाड़ी के आगे लेट गये थे. लखनऊ के साथ साथ ऐसा ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी हुआ था.

शहर दक्षिणी से सात बार विधायक रहे श्यामदेव रॉय चौधरी दादा का टिकट काटे जाने को लेकर भी कार्यकर्ताओें में काफी गुस्सा रहा. वोटिंग से ऐन पहले संघ की तरफ से फीडबैक के साथ प्रधानमंत्री मोदी को मोर्चा संभालने की सलाह दी गयी थी. फिर मोदी को वाराणसी में कैंप करना पड़ा और लंबा रोड शो भी. रोड शो के बाद जब मोदी विश्वनाथ मंदिर दर्शन के लिए जाने लगे तो देखा रास्ते में श्यामदेव रॉय चौधरी किनारे खड़े थे. फिर मोदी ने उनका हाथ पकड़ा और साथ खींच कर मंदिर लेते गये. ये वाकया काफी चर्चित रहा और इसे दादा की नाराजगी दूर करने की कवायद के तौर पर लिया गया था. बहरहाल, अंत भला तो सब भला. आखिरकार बीजेपी की सरकार बनी.

पहले चरण की वोटिंग कई हिसाब से महत्वपूर्ण होती है. एक फायदा तो ये होता है कि पहले चरण की वोटिंग का सीधा असर बाद के मतदान पर पड़ता है. ऐसी हालत में इलाके में जो राजनीतिक दल मजबूत होता है वो फायदे में रहता है, ऐसी धारणा है. पिछली बार मुजफ्फरनगर दंगों और कई और वजहों से तब समाजवादी पार्टी की सरकार के प्रति पश्चिम यूपी में लोगों की नाराजगी रही - और वे सीधे बीजेपी के पक्ष में चले गये.

शुरुआत तो 2014 से ही हो चुकी थी. 2017 तो उसके दोहराने जैसा ही रहा - 2022 में स्थितियां अलग हैं. किसान आंदोलन की वजह से हालात काफी बदल चुके हैं. राकेश टिकैत के टीवी पर आंसू निकल जाने के बाद जब मुजफ्फरनगर में महापंचायत हुई तो उनके भाई और भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने कहा भी धा कि आरएलडी नेता अजीत सिंह का साथ न देकर इलाके के किसान गलती कर चुके हैं. आगे से भूल सुधार करेंगे.

देखना है प्रधानमंत्री मोदी के कृषि कानून वापस लेने के बाद पश्चिम यूपी के किसानों का मिजाज बदलता है या नहीं? पंजाब में किसानों का विरोध देख कर तो संदेह की ही स्थिति बन रही है. आखिर पंजाब में प्रधानमंत्री मोदी की सुरक्षा में सेंध की वजह भी तो किसानों का विरोध प्रदर्शन ही रहा है. पहले चरण में 15 जिलों की 73 सीटों पर वोटिंग होनी हैं - शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, हापुड़, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा, हाथरस, आगरा, फिरोजाबाद, एटा और कासगंज में.

पश्चिम यूपी में बीजेपी को अखिलेश यादव और आरएलडी नेता जयंत चौधरी के गठबंधन से कड़ी चुनौती मिल सकती है - अगर वोटिंग की शुरुआत पूर्वांचल से हुआ होता तो योगी आदित्यनाथ पहले से ही दबदबा जरूर कायम रख पाते. योगी आदित्यनाथ के प्रभाव वाले गोरखपुर, महाराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, आजमगढ़, मऊ और बलिया में छठे चरण में 3 मार्च को वोटिंग होनी है.

हो सकता है ये सब देख कर सोचते समझते हुए अखिलेश यादव और बाकी विपक्ष के नेताओं में मन में लड्डू फूट रहे हों, लेकिन जन सभाओं पर चुनावी रैली को लेकर चुनाव आयोग ने जो पाबंदियां लगायी हैं - वे तो अभी से डराने लगी हैं. ये तो अखिलेश यादव की पहली प्रतिक्रिया में ही दिखी है.

रात को कैंपेन कर्फ्यू लागू रहेगा

चुनाव आयोग ने कोविड प्रोटोकॉल के तहत जो पाबंदियां लगायी हैं, वे अभी से 15 जनवरी तक प्रभावी रहेंगी. 15 जनवरी के बाद ओमिक्रॉन के प्रकोप को देखते हुए चुनाव आयोग स्थिति की समीक्षा करेगा और फिर या तो मौजूदा तरीका ही कायम रखा जाएगा या फिर जरूरत के हिसाब से तब्दीली होगी.

अभी चुनाव कैंपेन के लिए आयोग ने जो मानक तय किये हैं उन पर सख्ती के साथ लागू किया जाना है. कोविड प्रोटोकॉल के तहत पहला चुनाव 2020 में बिहार विधानसभा के लिए हुआ था. 2021 की शुरुआत में जब पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे थे तभी कोरोना वायरस की दूसरी लहर आ गयी - और उसका सबसे ज्यादा प्रभाव पश्चिम बंगाल में देखने को मिला था. बंगाल की तरह ही यूपी में भी ज्यादा चरणों में चुनाव होने हैं.

अफसरों पर भी सख्त रहेगा चुनाव आयोग: MCC यानी आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन को लेकर चुनावों के दौरान उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के स्टार प्रचारकों को नोटिस जारी किया जाता रहा है. आयोग के नोटिस के बाद जबाव भी दाखिल कर दिये जाते हैं.

मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि आयोग की तरफ से ये पहले ही सुनिश्चित कर लिया गया है कि पिछले चुनावों के सभी मामलों का निपटारा तार्किक निष्कर्ष तक सुनिश्चित हो जाये. आगे के लिए भी ऐसा ही होने वाला है - और कोशिश होगी कि मामले चुनाव बाद तक के लिए पेंडिंग न रहें.

तभी तो चुनाव प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर भी चुनाव आयोग की कड़ी निगरानी रहेगी. जिलाधिकारी और उनकी टीम के जो भी अफसर जिस चीज के लिए जिम्मेदार होंगे, अगर आचार संहिता के उल्लंघन के लिए उनकी तरफ से कोई लापरवाही सामने आती है तो उन पर भी तत्काल प्रभाव से एक्शन लिया जाएगा.

15 जनवरी तक पाबंदी: मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा के मुताबिक, 15 जनवरी तक सभी राजनीतिक दलों की चुनावी सभाओं, पदयात्राओं, रोड शो - और यहां तक कि बाइक और साइकिल रैलियों पर भी प्रतिबंध लागू रहेगा.

1. रोजाना रात आठ बजे से लेकर सुबह आठ बजे तक कैंपेन कर्फ्यू लागू रहेगा.

2. डोर टू डोर चुनाव प्रचार के दौरान भी सिर्फ पांच लोग ही शामिल हों सकेंगे.

3. हर रैली से पहले उम्मीदवार को अपनी तरफ से शपथ-पत्र दाखिल करना होगा.

4. उम्मीदवारों को ऑनलाइन नॉमिनेशन फाइल करने की सुविधा भी मिलेगी.

5. राजनीतिक दलों की तरफ से और उम्मीदवारों को खुद भी अपना आपराधिक रिकॉर्ड बताना होगा.

6. सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को चुनावी अपराध के संबंध में भी एडवाइजरी जारी की जाएगी.

7. सभी राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को हेट स्पीच, फेक न्यूज और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनकी गतिविधियों की निगरानी भी करनी होगी.

8. कोविड प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ महामारी एक्ट, NDMA और IPC की धाराओं के तहत एक्शन लिया जाएगा.

9. चुनाव जीतने के बाद भी विजय जुलूस निकालने की अनुमति नहीं दी गयी है.

10. ऐसे सभी प्रतिबंध 15 जनवरी तक लागू रहेंगे.

मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने जोर देकर बताया कि अगर पाबंदियों का उल्लंघन किया जाता है तो उसके लिए संबंधित जिले के प्रशासनिक अधिकारियों को भी व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार ठहराया जाएगा - और उनके खिलाफ भी वैसा ही एक्शन होगा.

संसाधनों का कितना असर

यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने ये तो कहा कि चुनाव आयोग के निर्देशों का पूरी तरह पालन होगा, लेकिन कुछ चीजों पर सवाल भी खड़े किये - और सत्ता पक्ष को टारगेट करते हुए आयोग को सलाह भी दे डाली है.

अखिलेश यादव ने कहा, 'जो नियम बने हैं उसके मुताबिक प्रचार करेंगे... लेकिन ये सख्ती सरकार के लिए रखनी चाहिये. सरकार यहां पर मनमानी करेगी. पिछले चुनाव में भी मैंने देखा कि किसी भी नियम को सरकार ने नहीं माना. इसलिए इलेक्शन कमीशन ये निगरानी रखे कि सरकार में बैठे लोग नियमों का पालन करें.'

पिछले चुनाव से अखिलेश यादव का आशय 2019 के आम चुनाव से ही रहा होगा क्योंकि 2017 में विधानसभा चुनाव के दौरान तो वो खुद मुख्यमंत्री थे ही - हां, सरकार में बैठे लोगों से अगर दिल्ली की तरफ इशारा है तो बात अलग है. मतलब, 2014 के बाद वाली दिल्ली वालों की सरकार से.

साथ ही अखिलेश यादव ने संसाधनों को लेकर भी अपनी चिंता जतायी है, खासकर छोटे दलों को लेकर जिनके पास वर्चुअल रैली के लिए जरूरी चीजें कम हो सकती है. अखिलेश यादव ने कहा, 'अगर हम वर्चुअल रैली के लिए जाएंगे तो उन पार्टियों के लिए कहीं ना कहीं इलेक्शन कमिशन को सोचना चाहिए जिन पार्टियों के पास... जिन पार्टियों के कार्यकर्ताओं के पास कोई इंट्रास्ट्रक्चर नहीं है - वर्चुअल रैली के लिए तमाम चीजें नहीं हैं तो वो कैसे करेंगे.'

अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग से सहयोग की भी मांग की और उनका आशय छोटे दलों से ही रहा. बोले, 'चाहे वो चैनल के माध्यम से विपक्ष के लोगों को समय ज्यादा दे... तो वर्चुअल रैली से अपनी बात जनता तक पहुंचाने में कामयाब रहेंगे.'

बीजेपी को लेकर अखिलेश यादव की चिंता काफी हद तक सही भी है, लेकिन ये कहना कि वो सरकार में होने के नाते ही ज्यादा सक्षम है ठीक नहीं होगा. अखिलेश यादव कहते हैं, 'चुनाव आयोग ये सुनिश्चित करे कि सभी पार्टियों को बराबर मौका मिले. बीजेपी के पास पहले से बहुत इंट्रास्ट्रक्चर है... वो सरकार में है. खर्च करने में बीजेपी सबसे आगे है... ऐड पर सरकारी पैसे खर्च किए जा रहे हैं. विपक्षी पार्टियों को भी स्पेस मिलना चाहिये.'

रैलियां रद्द किये जाने के बाद से ही ये तो साफ तौर पर समझ आने लगा था कि चुनाव प्रचार में आईटी सेल का बोलबाला रहने वाला है. जो राजनीतिक दल अब भी सिर्फ ट्विटर को बयान और प्रेस रिलीज जारी करने भर का माध्यम समझते रहे हैं, निश्चित तौर पर उनके लिए मुकाबला बेहद मुश्किल होने वाला है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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