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Updated: 11 जनवरी, 2020 06:12 PM
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi West Bengal visit) दो दिन के पश्चिम बंगाल के दौरे पर हैं. PM मोदी के दौरे में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee boycotts Sonia Gandhi meet) से मुलाकात तो होगी ही. लेकिन उससे आगे?

सिर्फ मुलाकात भर होगी या बात भी होगी? बात से आशय महज औपचारिकता भर या उससे आगे भी? मसलन, कुछ राजनीतिक विमर्श भी मुमकिन है क्या?

ये सवाल इसलिए उभर रहे हैं क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी का ये दौरा नागरिकता कानून (CAA) पर अधिसूचना जारी होने के ठीक एक दिन बाद हो रहा है - और फिलहाल मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के साथ ममता बनर्जी के टकराव की वजह भी ये मुद्दा ही है. ममता बनर्जी ने CAA और NRC लागू नहीं करने की घोषणा कर रखी है.

मोदी के दौरे की टाइमिंग ऐसी है कि वो सोनिया गांधी की तरफ से बुलायी गयी विपक्षी दलों की मीटिंग के ठीक पहले तय की गयी है - और उसमें भी खास ये है कि ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों की उस मीटिंग का बहिष्कार कर दिया है.

मोदी और ममता की मुलाकात से फिलहाल कुछ भले ही निकल कर न आये, लेकिन ये वाकया नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की याद तो दिला ही रहा है. मई, 2017 में ठीक ऐसे ही नीतीश कुमार ने सोनिया गांधी का लंच ठुकराया और अगले दिन मोदी के डिनर में शामिल हुए - आगे की कहानी तो जगजाहिर है ही.

क्या ममता भी चल पड़ी हैं नीतीश की राह?

ये कतई जरूरी नहीं है कि प्रधानमंत्री के दौरे में राज्य के मुख्यमंत्री से मुलाकात में कोई राजनीतिक संदेश हो ही, वो तो एक प्रोटोकॉल है. ऐसे में पहली नजर में तो ममता बनर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात वैसी ही समझी जानी चाहिये जैसे कुछ दिन पहले महाराष्ट्र में देखने को मिला था. जब प्रधानमंत्री मोदी महाराष्ट्र पहुंचे तो स्वागत करने वालों में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी थे जो एयरपोर्ट पर पहुंचे थे. उससे कुछ ही पहले ही उद्धव ठाकरे ने बीजेपी के साथ बरसों पुराना गठबंधन तोड़ कर महाविकास अघाड़ी की सरकार में मुख्यमंत्री बने थे.

लेकिन थोड़ा गौर करें तो ममता बनर्जी और मोदी की मुलाकात काफी अलग नजर आती है. ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे के ठीक पहले विपक्ष की उस मीटिंग के बहिष्कार का ऐलान किया है जिसे कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने बुलायी है.

ममता बनर्जी ने मीटिंग के बहिष्कार के फैसले के पीछे जो तर्क दिये हैं, वही उद्धव ठाकरे और ममता की मुलाकात का फर्क भी समझा रहे हैं. ममता बनर्जी का कहना है कि वो कांग्रेस की किसी भी मीटिंग में शामिल नहीं होंगी क्योंकि वो लेफ्ट के नेताओं के साथ पश्चिम बंगाल में बवाल कर रहे हैं. बवाल भी जिस बात पर हो रहा है वो भी राजनीतिक हिसाब से काफी दिलचस्प है. दरअसल, वो बवाल भी 8 जनवरी को बुलाये गये भारत बंद के दौरान हुआ है. बंद की कॉल और विरोध प्रदर्शन भी पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि केंद्र की मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ.

ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी की मीटिंग के बहिष्कार की सूचना भी फोन कर के शरद पवार को दी है. उसके भी कुछ मायने जरूर ही होंगे - क्या ममता बनर्जी एक तरीके से विपक्षी खेमे से दूरी बनाने के संकेत दे रही हैं?

जो वजह बता कर ममता बनर्जी विपक्षी नेताओं की मीटिंग के दूरी बना रही हैं, उसमें भी सीधा फायदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को होता नजर आ रहा है.

mamata banerjee and narendra modiममता बनर्जी तो नीतीश कुमार वाले रोल में नजर आ रही हैं, लेकिन मोदी-शाह को भी मंजूर है क्या?

सबसे बड़ी बात ममता बनर्जी की ये स्टाइल बिलकुल वैसी ही है जैसी 2017 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनायी थी - सोनिया के न्योते को लेकर!

तब भी सोनिया गांधी ने विपक्षी दलों के नेताओं को ऐसे ही मोदी सरकार के खिलाफ लामबंद करने के लिए बुलाया था. नीतीश कुमार ने सोनिया गांधी का लंच तो ठुकरा दिया, लेकिन ठीक अगले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी के साथ डिनर करने पहुंच गये. लंच और डिनर दोनों ही दिल्ली में ही हुए थे, बस तारीख का फर्क था. ये उस वक्त की बात है जब प्रधानमंत्री ने मारीशस के प्रधानमंत्री पी. जगन्नाथ के सम्मान में डिनर दिया था. ये मई की बात है और जुलाई में ही नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़ कर बीजेपी के सपोर्ट से फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ले लिया था. कुछ दिन बाद जेडीयू की मीटिंग हुई और पार्टी के NDA का हिस्सा बन जाने की औपचारिक घोषणा भी कर दी गयी.

ममता बनर्जी उस वाकये को थोड़ा एडवांस कर दिया है. ममता बनर्जी, सोनिया की मीटिंग से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात कर रही हैं.

सवाल वही है ये सिर्फ मुलाकात ही होगी या कुछ बातें भी होंगी? बातें जो औपचारिकताओं से दो कदम आगे की हों - मसलन, कुछ राजनीतिक विमर्श भी मुमकिन है क्या?

ममता बनर्जी की भी तैयारी नीतीश कुमार जैसी ही है क्या?

क्या ममता को NDA की जरूरत है?

कोई भी राजनीतिक समीकरण या चुनाव गठबंधन तभी बनते या बिगड़ते हैं जब दो पक्षों की जरूरत पूरी होती दिखे या फिर खत्म हो चुकी हो - ममता बनर्जी और बीजेपी के बीच भी अगर कोई डील होने की संभावना बन रही हो तो उसका भी आधार वही होगा. जैसे राजनीति में कोई दोस्त या दुश्मन नहीं होता वैसे ही गठबंधन के पीछे भी सिर्फ और सिर्फ फायदा ही होता है.

बीजेपी के साथ बंगाल में भी बिहार जैसी ही समस्या है - कोई कद्दावर या भरोसेमंद चेहरा नहीं है. ऐसा चेहरा जो अपने राजनीतिक विरोधी के सामने डट कर खड़ा भी हो और उसे टक्कर देने की स्थिति में हो. दिल्ली में बीजेपी के सामने किसी के साथ गठबंधन का मौका भी नहीं है. फिर तो दिल्ली की ही तरह बंगाल में भी अमित शाह को कहना पड़ेगा कि 'मोदी जी के नेतृत्व में' बंगाल में भी बीजेपी की सरकार बनेगी.

ममता बनर्जी के हिसाब से देखें तो वो अपने बूते 2016 में सत्ता में वापसी कर चुकी हैं, लेकिन 2019 के आम चुनाव में प्रदर्शन के आधार पर 2021 में नतीजे दोहराये जाने की संभावना काफी कम है और लड़ाई काफी मुश्किल लग रही है.

सवाल है कि अगर ममता बनर्जी नीतीश कुमार की तरह बीजेपी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने का फैसला करती हैं तो क्या होगा? जो कुछ भी संभव है वो बिहार मॉडल पर ही आधारित लगता है. जैसे बिहार में एनडीए के नेता नीतीश कुमार होंगे, वैसे बंगाल में ममता बनर्जी भी तो हो सकती हैं - और किसी इंटरव्यू में अमित शाह ऐसा बयान दे सकते हैं. ऐसा एक बयान ही काफी है.

वैसे ये सब निर्भर तो इस बात पर भी करता है कि बीजेपी इस बारे में क्या सोच रही है. अगर ममता बनर्जी अपने फायदे की बात सोचती हैं, फिर तो बीजेपी को भी वही हक हासिल है. कुछ भी संभव तभी है जब बीजेपी को भी इस तरह के राजनीतिक समीकरण में कोई फायदा नजर आये.

वस्तुस्थिति का एक फलक ये भी है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हालत भी काफी हद तक वैसी ही हो चली है, जैसी स्थिति नीतीश कुमार के सामने बिहार में बनती प्रतीत हो रही है - फर्क भले ही कुछ हो, लेकिन दोनों ही के सामने सत्ता विरोधी फैक्टर बड़ा चैलेंज है. फिर तो ऐसी भी संभावना है कि बीजेपी मान कर चल रही हो कि जब वो बगैर ममता बनर्जी के ही बंगाल में सरकार बनाने की स्थिति में है तो गठबंधन की जरूरत क्या है? यही बात बिहार पर भी लागू होती है. ऊपर से जोखिम ये है कि गठबंधन चुनाव जीत कर बहुमत भी हासिल कर ले और मालूम हुआ ममता बनर्जी भी कहीं, उद्धव ठाकरे की तरह पलट गयीं. ममता बनर्जी के साथ तो ऐसा ट्रैक रिकॉर्ड भी जुड़ा हुआ है.

जरूरी ये भी नहीं है कि मुलाकात की बातें अभी ही सामने आ जायें. हो सकता है ममता बनर्जी की तरफ से फिलहाल बोल दिया जाये कि जो भी रहा वो सब शिष्टाचार वश था - जैसे शरद पवार ने बताया था कि किसानों के मुद्दे पर मुलाकात हुई. बाद में पता चला कि सुप्रिया सुले के लिए कृषि मंत्रालय और देवेंद्र फडणवीस की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की मांग भी रखी गयी थी.

वैसे भी खुद ममता बनर्जी ही तो कहती हैं - राजनीति के दो लोग मिलेंगे तो बातें तो राजनीतिक ही होंगी ना. सही बात है. कयास भी तो इसीलिए लगाये जाते हैं.

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