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Updated: 26 जनवरी, 2019 03:52 PM
अरविंद मिश्रा
अरविंद मिश्रा
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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी में कहा कि 'हम बैकफुट पर नहीं फ्रंटफुट पर खेलेंगे' यह व्यक्तव्य उन्होंने प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तरप्रदेश का प्रभारी बनाने पर कहा था. सपा-बसपा और रालोद के गठबंधन में कांग्रेस को जगह ना मिलने से कांग्रेस को मजबूर होकर 2019 के महत्वपूर्ण लोकसभा चुनाव से पहले प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में लाने को मजबूर किया.

बात शुरू तो हुई उत्तर प्रदेश से जहां कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था लेकिन अब दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस 'एकला चलो' की नीति अपनाती दिख रही है. अब आंध्रप्रदेश में भी कांग्रेस तेलगु देशम पार्टी यानी टीडीपी से चुनावी गठबंधन नहीं करेगी. इससे पहले टीडीपी के साथ मिलकर कांग्रेस ने तेलंगाना में विधानसभा चुनाव लड़ा था. दिल्ली में भी आप के साथ गठबंधन की संभावना समाप्त ही हो गई है. और अब पश्चिम बंगाल में भी मामला बनता नहीं दिख रहा है. बिहार में भी महागठबंधन में कांग्रेस की स्थिति ठीक नहीं है.

जो पार्टी लोकसभा चुनाव में भाजपा को मात देने के लिए महागठबंधन की पक्षधर थी अब एकदम से 'फ्रंटफुट' पे आ गई है. यानी अपनी रणनीति बदलते हुए एक से अधिक राज्यों में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला क्यों? टीडीपी नेता एन चंद्रबाबू नायडू जो कभी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे थे उनसे भी राज्य में दूरी क्यों बना ली?

rahul gandhiसिर्फ उत्तरप्रदेश ही नहीं दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस 'एकला चलो' की नीति अपनाती दिख रही है

बात आंध्रप्रदेश की. कांग्रेस महासचिव ओमन चांडी ने साफ कर दिया कि आंध्र प्रदेश में टीडीपी के साथ कांग्रेस का कोई गठबंधन नहीं होगा. यानी राज्य की सभी 175 विधानसभा और 25 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस अकेले ही चुनाव लड़ेगी. इसका कारण साफ था- जब इन दोनों पार्टियों ने तेलंगाना में गठबंधन कर विधानसभा चुनाव लड़ा तो कांग्रेस की संख्या 21 से घटकर 19 सीटों पर आ गई और टीडीपी की सीटें 15 से 2 रह गईं. इसका मतलब ये कि दोनों पार्टियों के लिए अलग चुनाव लड़ना ही फायदेमंद होगा.

पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस 'एकला चलो' की रणनीति पर है कारण वहां की नेता ममता बनर्जी तृणमूल के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं. इसका अंदाज़ा भी तब ही लग गया था जब ममता के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं की महारैली में ना तो राहुल गांधी दिखे और न ही सोनिया गांधी. वैसे भी ममता बनर्जी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर ज़्यादा उत्सुक नहीं दिखी हैं. और तो और यहां ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ गठबंधन करने में इच्छुक भी नहीं है. कारण ये कि इसे कुछ सीटों का बलिदान देना पड़ सकता है. तृणमूल कांग्रेस यहां 2011 से ही सत्ता में है और लगातार इसका प्रभाव बढ़ता ही गया है. वहीं कांग्रेस विधानसभा में 50 की संख्या तक पहुंचने में भी लगातार विफल रही है. ऐसे में कांग्रेस को अकेले लड़ने से कम से कम इसके कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा तथा इसका कैडर तैयार हो पायेगा.

दिल्ली में भी एक समय दोनों पार्टियां- कांग्रेस और आप साथ चुनाव लड़ने पर विचार कर रही थीं लेकिन 1984 के सिख दंगो के दोषी सज्जन कुमार को लेकर हुए विवाद ने संशय कायम कर दिया था. बची खुची उम्मीद भी उस समय खत्म हो गई जब प्रदेश में अध्यक्ष शीला दीक्षित की नियुक्ति हो गई. इसके बाद आम आदमी पार्टी ने घोषणा कर दी कि कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं होगा. अब यहां भी कांग्रेस अकेले दम पर चुनाव में उतरेगी. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कोई भी सीट नहीं मिली थी साथ ही विधानसभा चुनाव में भी खाता नहीं खुला था.

बिहार में भी कांग्रेस को महागठबंधन में कितनी सीटें मिलेगी यह तय नहीं हुआ है, ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि यहां भी कांग्रेस चुनाव मैदान में अकेले ही अपनी किस्मत आज़मा सकती है. यहां कांग्रेस को 2015 के विधानसभा में 27 तथा 2014 के लोकसभा चुनाव में 2 सीटें प्राप्त हुई थीं.

लेकिन कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां कांग्रेस वहां के क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर सकती है. मसलन कर्नाटक में जेडीएस के साथ, झारखण्ड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ, महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ और तमिलनाडु में डीएमके के साथ.

हालांकि भाजपा के खिलाफ लोकसभा से पहले विपक्षी पार्टियों का महागठबंधन बनाने का कोशिश अभी भी जारी है लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इससे अलग-थलग पड़ती प्रतीत हो रही है. और इस तरह कांग्रेस के विपक्षी महागठबंधन से दूर होने से दूरगामी राजनीतिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं.

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लेखक

अरविंद मिश्रा अरविंद मिश्रा @arvind.mishra.505523

लेखक आज तक में सीनियर प्रोड्यूसर हैं.

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