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Updated: 19 जुलाई, 2019 02:02 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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राहुल गांधी से शुरू हुआ इस्तीफों का दौर कांग्रेस में थम गया है. हो सकता है इसलिए भी क्योंकि प्रियंका गांधी वाड्रा ने कम से कम इस मामले में सबसे साहसी अपने भाई को फॉलो नहीं किया. यूपी में उनके सहयोगी महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया के त्यागपत्र के बाद सूबे का आधा बाकी हिस्सा भी प्रियंका वाड्रा को ही दे दिया गया.

अब मालूम हुआ है कि प्रियंका वाड्रा को ही कांग्रेस की कमान सौंपे जाने को लेकर दबी जबान चर्चा शुरू हो गयी है. वैसे एक धड़ा ऐसा भी है जो प्रियंका वाड्रा में राहुल गांधी जैसी स्वीकार्यता नहीं देखता. ऐसे नेताओं की अपनी ठोस दलील भी है.

चर्चाओं में प्रियंका वाड्रा का नाम अकेला तो नहीं है, लेकिन जो दूसरे या तीसरे नाम भी हैं वे भी परिवारवाद से मुक्त तो नहीं ही लगते. वैसे भी जब प्रियंका वाड्रा के पक्ष में एक अंदरूनी लहर शुरू हो जाये और राहुल गांधी अनापत्ति प्रमाण पत्र देने के राजी हो जायें तो बाकी कोई टिक भी पाएगा, ऐसा तो नहीं बिलकुल लगता.

तो क्या कांग्रेस को गांधी परिवार मुक्त करने की राहुल गांधी की ख्वाहिश अधूरी ही रह जाएगी?

राहुल गांधी के न चाहते हुए भी कांग्रेस गांधी के आगे थोड़ी दूर चलकर वाड्रा परिवार की हो जाएगी?

कांग्रेस अध्यक्ष की रेस में प्रियंका आगे

25 मई, 2018 को CWC की बैठक में राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद, कोर कमेटी की एक मीटिंग हुई थी जिसमें उसे अस्वीकार करने की रस्म निभाई गयी थी. जब राहुल गांधी ने इस्तीफे का लेटर सार्वजनिक कर दिया तो उसे स्वीकार करने के लिए फिर से बैठक होनी है. दो महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी अब तक ऐसी कोई कोई औपचारिक बैठक नहीं बुलायी जा सकी है. बैठक की बात तो छोड़िये, अभी तक वो तारीख भी नहीं तय हो पायी है जब बैठक बुलायी जा सके. कहा जा रहा है कि इसे संसद सत्र के खत्म होने तक होल्ड रखा गया है. सुनने में आया है कि 22 जुलाई तक तो सवाल ही नहीं उठता. संसद सत्र 25 जुलाई को खत्म हो रहा है.

स्थाई कांग्रेस अध्यक्ष तो चुनावी प्रक्रिया पूरा होने के बाद ही आ सकेगा, इसलिए तब काम चलाने के लिए अंतरिम अध्यक्ष की नियुक्ति होनी है. इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी को लेकर भी विचार हो रहा है, बशर्ते वो इसके लिए तैयार हों. अगर ऐसा कुछ नहीं हुआ तो CWC के वरिष्ठ सदस्यों में से किसी एक पर आम राय बनाने की कोशिश होगी, मसलन - मोतीलाल वोरा, मुकुल वासनिक और गुलाम नबी आजाद. ये तीनों ही कार्यसमिति में वरिष्ठतम सदस्य हैं.

अंतरिम नामों में महाराष्ट्र और कर्नाटक से आने वाले दलित नेता भी चर्चाओं में शामिल हैं - सुशील कुमार शिंदे और मल्लिकार्जुन खड्गे. साथ ही, हिंदी पट्टी से अशोक गहलोत और आनंद शर्मा भी कई नेताओं की पसंद बताये जा रहे हैं.

after rahul gandhi, now priyanka for congressगांधी नहीं तो वाड्रा लाओ कांग्रेस बचाओ

राहुल गांधी लाख कोशिश करें, लेकिन कांग्रेस नेताओं के लिए गांधी परिवार से थोड़ा भी आगे हट कर सोचना मुश्किल हो रहा है. अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर कांग्रेस नेताओं की नंबर वन पसंद सोनिया गांधी हैं तो स्थाई तौर पर प्रियंका गांधी वाड्रा के नाम का जादू छाया हुआ है. नाम तो और भी हैं लेकिन उनका नंबर प्रियंका वाड्रा से काफी पीछे है. डॉ. कर्ण सिंह की ओर से सलाह दी गयी थी कि कोई युवा कांग्रेस की अगुवाई करे - कोई युवा करिश्माई नेतृत्व. कैप्टन अमरिंदर सिंह भी कुछ ऐसी ही राय रखते हैं. ऐसे नामों में ज्योतिरादित्य सिंधिया पहली पायदान पर हैं तो मेहनतकश युवा नेताओं में सचिन पायलट का नाम सबकी जबान पर पहले आता है.

इंडियन एक्सप्रेस ने दो सीनियर कांग्रेस नेताओं से बात कर कांग्रेस में चल रहे प्रियंका वाड्रा विमर्श को समझने की कोशिश की है. श्रीप्रकाश जायसवाल और भक्त चरण दास का मानना है कि राहुल गांधी की गैरमौजूदगी में कांग्रेस अध्यक्ष का पद प्रियंका गांधी वाड्रा को ही संभालना चाहिये. श्रीप्रकाश जायसवाल के पास स्वाभाविक तर्क है - वो गांधी परिवार से ताल्लुक रखती हैं, बेहद सक्रिय रहती हैं और नेतृत्व संभालने की अपार क्षमता है. भक्त चरण दास के पास भी अलग से कहने को कुछ ठोस नहीं है, श्रीप्रकाश जायसवाल की ही बात को आगे बढ़ाते हुए सलाह देते हैं, प्रियंका गांधी के साथ एक भरोसेमंद टीम भी होनी जरूरी और 'हम इसके लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं.'

बहुत ज्यादा समझने की जरूरत नहीं है, जैसे कांग्रेस नेताओं से तंग आकर राहुल गांधी इस्तीफा देने जैसा आखिरी कदम उठाया है, वैसे ही नेता एक बार फिर एकजुट होकर उनकी मंशा पर पानी फेरने को आतुर दिखते हैं.

आखिर राहुल गांधी भी तो ऐसे ही नेताओं से परेशान रहे हैं जो अपने लिए जिद करते हैं. गांधी-गांधी नाम भी जपते हैं और अपनों को टिकट दिलाने के लिए दबाव भी बनाते हैं. राहुल गांधी ने तो भरी सभा में अशोक गहलोत और कमलनाथ के नाम भी ले डाले थे.

अब वही चापलूस ब्रिगेड प्रियंका वाड्रा को अध्यक्ष बनवाने के लिए लामबंद हो रहा है - ताकि उनकी भी दुकान चलती रहे और आने वाले दिनों में बाल-बच्चों का भी भविष्य उज्ज्वल बना रहे.

राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा में कितना फर्क

जैसे सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहते कैप्टन अमरिंदर सिंह से लेकर संदीप दीक्षित जैसे नेता राहुल गांधी के नाम पर विरोध प्रकट किया करते रहे, वैसे ही प्रियंका गांधी के मामले में भी कानाफूसी जारी है. ऐसे कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी के नाम पर आपत्ति जताने के लिए राहुल गांधी की खूबियां बताने लगे हैं.

वैसे प्रियंका गांधी ने खुद ही ऐसे नेताओं को मौका भी दिया है. इंडियन एक्सप्रेस से ही बातचीत में एक गुमनाम नेता CWC मीटिंग में ही प्रियंका गांधी की एक बात की ओर ध्यान दिलाया है. भरी सभा में प्रियंका गांधी ने कहा था कि 'हत्यारा' इसी कमरे में बैठा है. प्रियंका का आशय वैसे नेताओं से रहा जो आम चुनाव में कांग्रेस की हार के लिए उनकी नजर में जिम्मेदार रहे. वैसे भी जब सोनिया गांधी के साथ प्रियंका वाड्रा हार की समीक्षा के लिए रायबरेली पहुंची थीं तो काफी हद तक वैसा ही रंग देखने को मिला था. उत्तर प्रदेश खासकर अमेठी में राहुल गांधी की हार के लिए प्रियंका गांधी ने कांग्रेस नेताओं को और स्थानीय कार्यकर्ताओं को गुनहगार करार दिया था. प्रियंका गांधी के इस बयान से कांग्रेस में भी एक खेमा काफी सकते में रहा.

क्या अमेठी में राहुल गांधी की हार के लिए प्रियंका गांधी से भी ज्यादा जिम्मेदार कोई लगता है? पूरे देश में भले ही कांग्रेस हार जाये, लेकिन अमेठी और रायबरेली में अगर ऐसे नतीजे आने लगें तो आखिर क्या समझा जा सकता है? वैसे भी अमेठी और रायबरेली में तो प्रियंका गांधी एक एक कार्यकर्ता और उसके परिवार तक से जुड़ी होंगी - अमेठी के लोग प्रियंका गांधी को भैयाजी यूं ही तो कहते नहीं हैं.

कांग्रेस का एक धड़ा प्रियंका गांधी के ऐसे व्यवहार के लिए ही राहुल के मुकाबले सबकी पसंद मानने से इंकार कर रहा है. इस बात को वैसे भी समझा जा सकता है कि ये राहुल गांधी ही थे जो अशोक गहलोत और कमलनाथ की बात मान कर दोनों नेताओं के बेटों को टिकट दे दिये - अगर राहुल गांधी की जगह प्रियंका वाड्रा होतीं तो शायद ये नामुमकिन होता.

'प्रियंका लाओ, कांग्रेस बचाओ' जैसे स्लोगन लिखे पोस्टर तो कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता बरसों से लगाते रहे हैं, चुनावों के दौरान भी राहुल गांधी के बाद उम्मीदवारों की पसंद प्रियंका वाड्रा ही हुआ करती रहीं. हालांकि, जब नतीजे आये तो मालूम हुआ की कांग्रेस उम्मीदवारों को जीत दिलाने के मामले में प्रियंका वाड्रा, राहुल गांधी से काफी पीछे रहीं.

ये तो हुई कांग्रेस के अंदर की बात - अगर प्रियंका को कांग्रेस की कमान मिल भी जाती है तो पार्टी से बाहर विपक्षी खेमे में क्या हाल होगा?

ऐसे सवालों के जवाब अभी खोजना जल्दबाजी होगी. वैसे कुछ मामलों में तो प्रियंका गांधी वाड्रा राहुल गांधी से बीस ही नजर आयी हैं.

विपक्षी खेमे में कुछ ही नेता ऐसे दिखे हैं जो राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नजर आते हैं, लेकिन ये वे ही नेता हैं जिनकी पहुंच से दिल्ली दूर है या अपना कोई खास वजूद नहीं है. ममता बनर्जी और एचडी देवगौड़ा जैसे नेता तो अब भी राहुल गांधी से बात करना तक पसंद नहीं करते. प्रियंका गांधी को लेकर उन सभी का क्या रवैया रहेगा, अभी देखना होगा.

वैसे 2017 के यूपी चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन कराने का श्रेय प्रियंका गांधी को ही दिया जा रहा था. बताया गया कि प्रियंका गांधी के देर रात डिंपल यादव को गये एक कॉल ने ही मामला पक्का करा दिया था. बाद में राहुल गांधी तो मायावती के साथ चाह कर भी गठबंधन नहीं कर पाये - न 2018 के विधानसभा चुनावों में न 2019 के आम चुनाव में. राहुल गांधी, मायावती और अखिलेश यादव के प्रति लगातार सम्मान प्रकट करते रहे, लेकिन सपा-बसपा गठबंधन के आस पास कांग्रेस को फटकने तक नहीं दिया गया.

ये तो कहा ही जा सकता है कि राहुल गांधी के पास फील्ड और संगठन की राजनीति अनुभव प्रियंका वाड्रा से ज्यादा है, लेकिन गठबंधन की राजनीति में प्रियंका वाड्रा को सोनिया गांधी की तरह स्वीकार भी किया जा सकता है.

बाकी बातें अपनी अपनी जगह हैं, लेकिन लब्बोलुआब तो अब तक यही निकल कर आ रहा है कि कांग्रेस में गांधी परिवार से बाहर झांकने की फितरत विकसित होना मुश्किल ही नहीं नामुकिन है. राहुल गांधी चाहे जिस तरीके से भी कांग्रेस नेताओं को सबक सिखाने की कोशिश करें लेकिन सब बेअसर ही लगता है - कांग्रेस की गाड़ी अगर गांधी परिवार से आगे बढ़ेगी तो ज्यादा से ज्यादा वाड्रा परिवार के अहाते में पहुंच कर पार्क हो जाएगी. बाद की बात जो भी हो अभी तो ऐसा ही लगता है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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