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Updated: 13 मई, 2019 07:09 PM
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23 मई का इंतजार हर किसी को है और अपनी अपनी जिम्मेदारियों को लेकर सभी सचेत हैं. चुनाव का जिम्मा तो निर्वाचन आयोग का ही है, लेकिन बाकी संस्थाएं भी पहले से ही मुस्तैद हो गयी हैं, ताकि लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व के आयोजन की सफलता में कोई मुश्किल आड़े न आ पाये.

लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन खुद चुनाव भले न लड़ रही हों, लेकिन नये सदस्यों के लिए हर जरूरी इंतजाम पहले से ही कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई भी सुप्रीम कोर्ट में हर तरह की विशेष परिस्थिति की तैयारी कर चुके हैं - और इस बार तो खुद भी मौजूद रहने का इंतजाम कर चुके हैं.

चुनाव विवाद सुलझाने वास्ते सुप्रीम कोर्ट में ऐतिहासिक इंतजाम

वैसे तो गर्मी की छुट्टियों में सुप्रीम कोर्ट की वेकेशन बेंच हर साल काम करती है, लेकिन पहले कभी भी चीफ जस्टिस इसका हिस्सा नहीं रहे हैं. वेकेशन बेंच के नोटिफिकेशन के मुताबिक CJI रंजन गोगोई और जस्टिस एमआर शाह भी इस बेंच का हिस्सा होंगे. इस दौरान त्वरित मामलों के साथ साथ नियमित केसों पर भी सुनवाई होगी.

आम चुनाव के नतीजे आने के बाद 25 से 30 मई तक चीफ जस्टिस रंजन गोगोई का अवकाश पीठ का हिस्सा बनने का फैसला ऐतिहासिक है. ये इंतजाम नयी सरकार बनने के दौरान किसी भी तरह की विवाद की स्थिति सुलझाने के लिए है. सुप्रीम कोर्ट में 13 मई से लेकर 30 जून तक गर्मियों की सालाना छुट्टी रहेगी. अवकाश पीठ की अधिसूचना के मुताबिक, चीफ जस्टिस गोगोई, जस्टिस एमआर शाह 25 मई से 30 मई तक अवकाश पीठ में शामिल रहेंगे. ये पीठ जरूरी केस के अलावा नियमित मामलों की भी सुनवाई करेगी.

cji justice ranjan gogoiजरूरत पड़ी तो आधी रात को भी होगी सुनवाई!

अब तक चीफ जस्टिस अगर वेकेशन बेंच में बैठते थे, तो सिर्फ किसी खास मामले की सुनवाई के लिए. पहली बार कोई चीफ जस्टिस नियमित मामलों की सुनवाई के लिए वेकेशन बेंच में बैठेंगे. इस दौरान चुनाव से जुड़े केस के साथ साथ दूसरे विवादित मामले आने पर भी वो सुनवाई करेंगे.

फिर तो आधी रात को भी हो सकती है सुनवाई

चीफ जस्टिस की कुर्सी संभालते ही जस्टिस रंजन गोगोई ने साफ कर दिया था कि जिंदगी और मौत के मामलों में ही त्वरित सुनवाई होगी, बाकी केस प्राथमिकता के आधार पर ही अदालत में सुने जाएंगे. जस्टिस गोगोई के ये साफ कर देने के बाद भी जल्द सुनवाई के लिए कई अर्जियां पड़ीं. अयोध्या केस में सुनवाई को लेकर तो हद से ज्यादा ही बवाल हुआ. फैसले की उम्मीद लगाये सुप्रीम कोर्ट के बाहर खड़े लोगों को जब मालूम हुआ कि नयी तारीख मिल गयी है, तो विरोध प्रदर्शन करने लगे. एक नेता का बयान तो ये भी रहा कि अगर अयोध्या मामले में जल्द फैसला नहीं सुनाया जाता तो लोग जजों के घरों का घेराव करें. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से अयोध्या मसले पर मध्यस्थता की पहल की और अब उसके लिए 15 तक का समय दिया गया है.

मतलब साफ था. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई चाहते थे कि महज अतिमहत्वपूर्ण मामलों में ही इमरजेंसी सुनवाई के इंतजाम हों. अगर केस बहुत ज्यादा जरूरी न हो तो आधी रात की सुनवाई से बचा जाये. जब भी चर्चा होती है आधी रात की सुनवाई के दो मामले जरूर याद किये जाते हैं - एक, आतंकवादी याकूम मेमन की फांसी की सजा के खिलाफ अपील पर सुनवाई और दूसरा, कर्नाटक विधानसभा को लेकर हुई सुनवाई. इसी तरह पुणे पुलिस की कार्रवाई के दौरान भी हाईकोर्ट में सुनवाई हुई थी और कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी तो पुलिस को घर तक छोड़ना पड़ा था.

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे आये तो मालूम हुआ किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला. तभी राज्यपाल ने बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दे दिया. राज्यपाल के फैसले के खिलाफ कांग्रेस और जेडीएस के नेता सुप्रीम कोर्ट पहुंच गये. आधी रात को अदालत लगी और सुनवाई हुई. सर्वोच्च अदालत ने बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने पर रोक नहीं लगायी, लेकिन बहुमत साबित करने के लिए राज्यपाल के 15 दिन के वक्त को कम कर दिया. कोई रास्ता नहीं नजर आने पर येदियुरप्पा ने इस्तीफा दे दिया और एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने.

विपक्षी नेताओं को एक बार फिर लगने लगा है कि एनडीए को बहुमत न मिलने की सूरत में कर्नाटक जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. इस मसले पर मंथन और उसके हिसाब से आगे की रणनीति तैयार करने के लिए विपक्ष के 21 दलों के नेताओं की एक मीटिंग भी प्रस्तावित है. मीटिंग की तारीख अब तक फाइनल नहीं हो पायी है. पहले एक तारीख 21 मई बतायी गयी थी, लेकिन अब ये 19 मई को आखिरी दौर की वोटिंग और 23 मई को नतीजों के दिन के बीच या नतीजे आने के बाद भी हो सकती है.

मीटिंग जब भी हो मुद्दा ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है. विपक्षी खेमे से खबर आयी है कि नेताओं को सत्ताधारी एनडीए को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में कर्नाटक जैसे हालात भी पैदा हो सकते हैं. विपक्ष की ये आशंका भी यूं ही नहीं लगती. परिस्थितियां काफी हद तक मिलती जुलती ही हैं.

विपक्ष राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को एक पत्र सौंपने वाला है. ये पत्र 21 दलों के नेताओं की ओर से होगा और उस पर सभी के हस्ताक्षर होंगे. पत्र में राष्ट्रपति से गुजारिश होगी कि खंडित जनादेश की हालत में वो सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का न्योता देने की जगह विपक्षी गठबंधन को मौका दें. विपक्ष की दलील होगी कि बहुमत न होने की स्थिति में सबसे बड़े दल की कोशिश नंबर अपने पक्ष में करने की होगी - और ऐसा होने पर खरीद फरोख्त की कोशिश हो सकती है.

चूंकि हर तरफ चुनाव नतीजों को लेकर किसी भी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने की आशंका जतायी जा रही है, इसलिए देश की सबसे बड़ी अदालत भी अपनी तरफ से तैयार है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई का ये प्रयास और जरूरत पड़ने पर सुनवाई के लिए खुद भी मौजूद रहने का फैसला सराहनीय और स्वागत योग्य है.

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