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Updated: 21 अक्टूबर, 2015 06:11 PM
डॉ. कपिल शर्मा
डॉ. कपिल शर्मा
  @delhi.kapilsharma
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“जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान” कबीर ने सैंकड़ों साल पहले ये बात कही थी, लेकिन मौजूदा चुनावों के संदर्भ में देखें, तो चुनाव लड़ने वालों में कोई साधु (यहां साधु को भगवा से जोड़कर विवादित बनाने की कोशिश न की जाए, साधु का मतलब सज्जन व्यक्ति से है) तो आजकल होता नहीं है और रही बात ज्ञान की तो चुनाव लड़ने वाले ज्यादातर लोग इस हालत में होते नहीं है कि वो कुछ ज्ञान की बातें कर पाएं. बिहार चुनाव में भाषणों की भाषा से इसका भी अंदाज़ा लग जाएगा. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि नेताओँ ने मुद्दे-मसलों से अलग जात-बिरादरी के नाम पर अपने अपने वोट बैंक बना लिए हैं और बेफिक्र हो गए हैं.

अगड़े, पिछड़े, यादव, दलित, भूमिहार, कुर्मी, कुशवाहा, हिंदू, मुस्लिम. बिहार चुनाव में राजनीतिक पार्टीयां हों या चुनावी पंडित इन्हीं शब्दों को बड़बड़ाने में लगे हैं. शायद इसलिए कि चुनावों में जीत का मंत्र भी इन्हीं शब्दों से थोड़ा-इधर उधर करके बना लिया जाता है. और फिर यह तो बड़ी तगड़ी मान्यता है कि बिहार की सियासत को जाति से अलग करके नहीं समझा जा सकता, तो फिर चुनाव कैसे जीता जा सकता है. इसका मतलब हुआ कि विकास और सुशासन का ढोल पीटना तो सिर्फ मजबूरी है, असली मशक्कत तो जातियों के समीकरणों को जोड़ने-तोड़ने के लिए है. हो भी यही रहा है.

उम्मीदवारों के चयन से लेकर नेताओं की सभाओं तक में जात-बिरादरी का ध्यान रखा जाता है, तो फिर किस बिना पर नेता कहते है कि हम तो जात-पांत, ऊंच-नीच से ऊपर उठकर सोचते हैं. ज़ाहिर है ऐसा कहने वाले ढोंग करते हैं, क्योंकि जो जात-बिरादरी-मजहब के आगे जब सोच ही नहीं पाते तो काम क्या करेंगे. गौर कीजिए लालू के उस भाषण पर जिसमें वो अगड़ों और पिछड़ों के बीच चुनावी लड़ाई का ऐलान कर सामाजिक ध्रुवीकरण की खुल्लमखुल्ला कोशिश करते हैं. इसे समझने के लिए किसी तरह की मशक्कत भी नहीं करनी है. क्योंकि लालू को जिस सुशासन बाबू ने जंगलराज का तमगा पहनाया था, वही अपने चुनावी समीकरणों को मजबूत बनाने के लिए जातिवाद की ज़मीन पर खड़ा है. पीएम मोदी तो घोषित विकास पुरुष हैं, जिस पर लोकसभा चुनाव की जीत की मुहर लगी है. फिर क्यों बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को उनकी जाति की दुहाई दे रही है. क्यों गिरिराज सिंह को कहना पड़ रहा है कि एनडीए की तरफ से कोई सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं होगा. क्योंकि आर्थिक पैकेजों पर सामाजिक ताना बाना ज्यादा भारी है.

जातिवाद भारत के सिस्टम की जड़ों तक घुसा हुआ है. आज़ादी के बाद से अब तक जातियों के फायदे के नाम पर सियासी लोग जातियों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते आये हैं. भारत में आरक्षण जातिगत आधार पर है. इसका मकसद सदियों से दबाए और पीछे धकेले जा रहे लोगों को मुख्यधारा में लाने का था, लेकिन अब जातियां वोट बैंक बन गई हैं. किसी को आरक्षण के लॉलीपॉप से लुभाया गया, तो किसी को भयाक्रांत करके वोट बैंक में तब्दील किया गया. कहीं असुरक्षा की भावना एक ही जाति के लोगों को जोड़ती है, जैसा कई दलितों की बस्तियों को उजाडने और जलाने के बाद हुआ, तो कहीं यह वर्चस्व के लिए भी है. कई खाप पंचायतें इसकी बानगी हैं. मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद तो जाति की सियासत खुल्लमखुल्ला हुई, बल्कि कई राज्यों में क्षत्रप भी पैदा किए. यूपी में यादवों के नेता मुलायम हो गए, कांशीराम के दलित आंदोलन से मायावती जैसी मजबूत नेता सामने आयीं. बिहार में पिछड़ों की सियासत के लालू महारथी बन गए. दक्षिण में जयललिता से लेकर करुणानिधि तक का आधार पर भी जातिगत ही रहा है. कांग्रेस-बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियों में भी राज्य स्तर पर जातिवादी नेताओं का दबदबा रहा है.

पूरा देश जाति के मकड़जाल से अछूता नहीं है, तो फिर बिहार में जाति की सियासत की इतनी चर्चा क्यों. क्योकि बिहार राजनीतिक तौर पर जितना जागरुक है, उतना ही जातिगत रूप से संवेदनशील भी. दूसरी सबसे बडी बात है कि बिहार में जातिगत वर्ग साफ साफ पहचाने जा सकते है और बहुत सारी सीटों पर जाति विशेष की तादाद इतनी है कि उसके एकजुट होने से फैसला बदल जाता है. ऐसा होना लोकतंत्र के फायदेमंद होता है, क्योंकि लोकतंत्र में दबाब समूहों की अपनी उपयोगिता और फायदे हैं लेकिन होता यह है कि वोटर जातिवाद के मोहरे बन जाते हैं और नेता अपनी जाति को अपना वोट बैंक बनाकर विकास को ठेंगे पर रखते हैं. जाति का ये चक्रव्यूह कब टूटेगा, शायद ऑनलाइन दुनिया में बड़ी हो रही युवा पीढ़ी से यह उम्मीद की जा सकती है.

 

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लेखक

डॉ. कपिल शर्मा डॉ. कपिल शर्मा @delhi.kapilsharma

लेखक टीवी टुडे में एंकर और पत्रकार हैं.

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