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Updated: 12 अप्रिल, 2018 08:33 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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बेवक्त की शहनाई का जो आलम होता है, दिन भर बीजेपी के साथ वैसा ही होता रहा. रेप के आरोपी बीजेपी विधायक की गिरफ्तारी को लेकर योगी आदित्यनाथ से जब पूछा गया तो बच कर निकल लिये. ठीक वैसा ही रवैया अमित शाह का भी दिखा जब उन्हें कठुआ और उन्नाव के सवालों से सामना हुआ.

बीजेपी के देशव्यापी उपवास कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब चेन्नई पहुंचे तो काले झंडे लेकर लोग विरोध के लिए पहले से तैयार बैठे हुए थे - यहां तक कि डीएमके नेता एम करुणानिधि भी काले लिबास में जमे हुए थे. बीजेपी नेताओं ने विपक्ष द्वारा संसद की कार्यवाही न होने देने के विरोध में पूरे देश में उपवास रखा था.

'माननीय' हैं तभी तो

बीजेपी जब देश भर में 'लोकतंत्र बचाओ उपवास' की तैयारी कर रही होती है, उसी दौरान उसका एक विधायक रेप पीड़ित को 'निम्न स्तर' का बता रहा है, तो दूसरा ऐसे समझा रहा है कि वो तो बलात्कार के लायक ही नहीं है.

बलिया के बैरिया से बीजेपी विधायक सुरेंद्र की बातें सुनिये - "अब आप ही बताइए, तीन बच्चे की मां के साथ कोई रेप करता है?"

surendra singhगैंग रेप पर बीजेपी विधायक सुरेंद्र सिंह के कुतर्क...

बीजेपी ने दावा है कि ये बात वो मनोवैज्ञानिक आधार पर कह रहे हैं. मानना पड़ेगा बीजेपी के इस विधायक के मनोवैज्ञानिक आधार को. वैसे सुरेंद्र सिंह से पूछा जाना चाहिये कि उन्नाव गैंग रेप के बारे में जिस मनोवैज्ञानिक आधार का अनुशीलन उन्होंने किया है - कठुआ रेप केस को लेकर भी उनके पास कोई एक्सक्लुसिव थ्योरी है क्या?

दरअसल, दोष सिर्फ सुरेंद्र सिंह का नहीं, राजनीति की उस सोच का है जिसमें हर शख्स बलात्कार को एक ही चश्मे से देखता है. अब तक बलात्कार पर राजनीति बयानों की चर्चा होती रही तो सबसे ऊपर नाम मुलायम सिंह का ही आ जाता रहा. वही मुलायम सिंह जो किसी बलात्कारी को भी बेकसूर जैसा ही ट्रीटमेंट देना चाहते हैं - 'बच्चे हैं. बच्चों से गलती हो जाती है. तो क्या फांसी पर चढ़ा दोगे?'

उन्नाव गैंग रेप के आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर को भी योगी आदित्यनाथ की सरकार में वही सुविधाएं हासिल हैं, जो अखिलेश यादव की सरकार में गायत्री प्रजापति को मिली हुई थीं.

और पुलिस का क्या. पुलिस को तो हुक्म की तामील करनी है. हुक्म कोर्ट से आये तो थोड़ा दायें-बायें चल भी जाये जब सीधे सूबे के सरकार की हो तो मजाल क्या कि थोड़ी भी ऊंच नीच हो पाये. भई पुलिस का क्या वो तो हुक्म मिलते ही एनकाउंटर के लिए ट्रिगर दबा देती है - और हिदायत पाकर किसी अधमरे शख्स के खिलाफ भी हमले का एफआईआर दर्ज कर सकती है. उन्नाव गैंग रेप पीड़ित के पिता के मामले में यूपी पुलिस ने तो बिलकुल ऐसा ही किया. ऊपर से कोई गुंजाइश न बचे इसलिए आर्म्स एक्ट लगाकर वैल्यू एडिशन भी कर दिया.

जब ऊपर से लेकर नीचे तक इस कदर इंतजाम हो तो किसी अफसर की मजाल जो रेप के आरोपी का नाम भी बगैर 'माननीय' जोड़े ले पाये. ऐसी गुस्ताखी के लिए यूपी के डीजीपी को कोसने का तो कोई मतलब नहीं बनता.

बलात्कार के लिए योग्यता भी बता देते

करीब दो साल पहले ISIS यानी इस्लामिक स्टेट की 'कमेटी ऑन रिसर्च एंड फतवा' ने ईराक और सीरिया में लड़ रहे अपने आतंकियों के लिए बलात्कार करने की लंबी चौड़ी गाइडलाइन जारी की थी. इस गाइडलाइन में विस्तार से बताया गया था कि गुलाम बनाई गयी महिला के साथ किन परिस्थितियों बलात्कार किया जाना चाहिये. ISIS की गाइडलाइन में जितना मानवीय पहलू तो इन नेताओं की सोच में भी नहीं दिखता.

ज्यादा दिन नहीं हुए, बाबा बने राम रहीम के बलात्कारी साबित होने और सजा के लिए जेल भेजे जाने की घटना को. राम रहीम के अच्छे दिनों में उसके दरबार में हाजिरी लगाने वालों नेताओं की फेहरिस्त में कम ही लोग ऐसे होंगे जिनके नाम नहीं होंगे.

अक्सर चर्चा में आ जाने वाले आसाराम खुद नाबालिग के साथ बलात्कार के मामले में जमानत की तमाम जुगत लगा चुके हैं - लेकिन इंतजार खत्म नहीं हो पाया है. बलात्कार को लेकर उनके भी विचार वैसे ही बीहड़ हैं - 'पीड़िता का भी उतना ही दोष है, जितना बलात्कारियों का. उसे लड़कों को भैया कहकर उनके सामने गिड़गिड़िना चाहिए था.' आसाराम ने ये उद्गार निर्भया केस में व्यक्त किये थे. आसाराम की नजर में बलात्कारी और पीड़ित दोनों ही बराबर के दोषी होते हैं.

बलात्कार के मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का अनुसंधान तो बेजोड़ रहा है, "यह कभी-कभी सही होता है और कभी-कभी गलत." ये कब गलत और कब सही होता है, अपने खास विचार पर विस्तार से प्रकाश तो गौर साहब ही डाल सकते हैं. तब तक बीजेपी विधायक सुरेंद्र सिंह की ओर से 'दुष्कर्म की अनिवार्य अर्हता' जैसे किसी शोध कार्य का इंतजार करते रहिये - और कर भी क्या सकते हैं?

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Bjp Fast, Yogi Adityanath, Amit Shah

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मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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