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Updated: 25 जनवरी, 2017 07:17 PM
अखिलेश द्विवेदी
अखिलेश द्विवेदी
  @akhilesh9009
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उत्तर प्रदेश की चुनावी रणभेरी बज चुकी है. सभी दल अपने सेनापति और सेनानायकों की सूचियां जारी कर रहे हैं. एक ओर जहां प्रबल दावेदार सत्तासीन पार्टी सपा कांग्रेस के साथ गठबंधन और मायावती अपनी सोशल इंजीनियरिंग की नीति के साथ ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित गठजोड़ के संग मैदान में हैं, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने अपनी तीसरी सूची भी मंगलवार को जरी कर दी है.

जिन्हें टिकट मिल गया है वह 2014 के लोकसभा चुनाव की लहर को मन में लिए अतिउत्साही नजर आ रहा हैं और जिन्हें टिकट नहीं मिला है वह बदहवास हैं. लेकिन 2014 के बाद ऐसा पहली बार देखने को मिल रहा है कि भाजपा के कार्यकर्ता खुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं और मुखर भी हो रहे हैं. जबकि उत्तर प्रदेश में इसके पहले के सभी चुनावों में भाजपा के ही एक मात्र कार्यकर्ता रहे हैं जो जी जान से पार्टी प्रत्याशियों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़े रहे हैं, चाहे वो हार रही हो या जीत.

वर्तमान में कमोबेश पूरे उत्तर प्रदेश में आप किसी भी विधानसभा से होकर गुजर जाइये और किसी पुराने कार्यकर्ता से पूछ लीजिये भाजपा की क्या स्थित है तो कार्यकर्ता का एक ही जवाब मिलता है कि भाजपा ये चुनाव हारने के लिए ही लड़ रही है. यह बात एक पत्रकार या दिल्ली से गए किसी भी व्यक्ति को तर्कहीन लग सकती है लेकिन अगर आप केवल पूर्वांचल में बनारस से लेकर इलाहाबाद के घोषित उम्मीदवारों के नामों पर नजर डालेंगे तो विस्मय करने वाली बातें सामने आएंगी.

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इलाहाबाद में टिकट का खेल

इलाहाबाद शहर में लोगों को जो सबसे आश्चर्य करने वाला फैसला लगता है, वो है शहर की उत्तरी विधानसभा जहां से भाजपा ने अशोक वाजपेयी के बेटे हर्षवर्धन को उम्मीदवार बनाया है. अशोक वाजपेयी अपने राजनीतिक जीवन में विभिन्न दलों से 9 चुनाव लड़ चुके हैं जिसमें वह एक चुनाव के आलावा सभी चुनाव हार गए थे, वहीं उनके पुत्र मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी से 2 बार चुनाव हार चुके हैं. हर्ष व उनके पारिवार के बारे में बात करें तो जनता उनके चाल-चरित्र पर कई तोहमतें लगा देती है.

वहीं शहर दक्षिण से पूर्व में बसपा से मंत्री रहे व लोकसभा 2014 के चुनाव में कांग्रेस से चुनाव लड़ चुके नंदगोपाल गुप्ता पर दांव लगाया है, जहां कार्यकर्ताओं का पूरा धड़ा नाराज बैठा है. तो वहीं जनता उनकी पत्नी अभिलाषा गुप्ता से खार खाए बैठी है, जो वर्तमान में इलाहाबाद शहर की मेयर हैं. जनता कहती है जब से अभिलाषा नंदी मेयर बनी हैं, शहर को कूड़ाघर बनाकर रख दिया है.

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शहर पश्चिम से लालबहादुर शास्त्री की बेटी के पुत्र सिद्धार्थनाथ सिहं को उम्मीदवार बनाया है जिनका आम कार्यकर्ताओं से और मतदाताओं में कोई पहचान नहीं है. उनका मुकाबला शोषितों वंचितों की पहचान पूजापाल से है, जिनसे इलाहाबाद को अपनी मुट्ठी में बंद रखने की बात करने वाले अतीक अहमद जैसे लोग मुंह की खा चुके हैं. लोग कहते हैं यहां तो नारा चलता है ‘झंडा बैनर भाई का वोट पड़े भौजाई का.’

शहर को छोड़कर जब आप देहात की सीटों पर नजर घुमाएं तो इलाहाबाद की मेजा विधानसभा से अपराधिक छवि के नेता उदयभान करवरिया की पत्नी को टिकट दिया गया है, जिनको राजनीति का ‘क ख ग’ नहीं पता लेकिन सपा के पूर्व विधायक की हत्या के आरोप में जेल में बंद होने के नाते वह बाहुबली की पत्नी हैं इसलिए भाजपा ने टिकट दे दिया, जबकि वहां के कार्यकर्ताओं ने एक मुहीम चला रखी है कि "मेजा की धरती बांझ नहीं-बाहरी व अपराधी बर्दाश्त नहीं".  

कमोबेश यही हाल बारा विधानसभा का है जहां पर पार्टी ने बसपा विधायक को पार्टी में शामिल करके टिकट दे दिया है. कार्यकर्ता विस्मित व दिग्भ्रमित हैं कि अब वह क्या करें. जिस विधायक ने हमें दूसरी पार्टी के लोग कहकर दुत्कारा उसके लिए लोगों से वोट कैसे मांगे और खुद भी कैसे दें, जमीर गवाही नहीं देता. इलाहाबाद के कार्यकर्ताओं और पार्टी सूत्रों की मानें तो टिकट उन्हीं को दिया गया है जिनकी या तो अमित शाह से डील हुई हो या केशव का बहुत नजदीकी रहा हो.

पार्टी ने अब तक 70 से ज्यादा दलबदलुओं को टिकट दिया है, जबकी उत्तर प्रदेश का इतिहास रहा है कि यहां पर दलबदलुओं के लिए चुनाव जितना हमेशा से मुश्किल रहा है. नाम न छापने की शर्त पर इलाहाबाद शहर के एक कार्यकर्ता कहते हैं कि हमारी पार्टी समर्पित लोगों की उपेक्षा करके पाप कर रही है. इसके नतीजे अच्छे नहीं होंगे.

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उत्तर प्रदेश का चुनावी इतिहास बताता है कि 1993 के बाद से भाजपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आई है 1996 में भाजपा ने 174 सीटें थी 2002 में 88 और 2007 में कम होते-होते 50 पर पहुंच गई. 2012 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में केवल 47 सीटें जीती थीं. यही हाल वोट प्रतिशत के मामले में रहा पार्टी को 1996 के 32.52 फीसदी से घटकर 2012 में 16 फीसदी पर जा पहुंचा. निस्संदेह वोट प्रतिशत में आई इस कमी के पीछे स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा एक बड़ी वजह रही.

राम मंदिर आन्दोलन के दौरान भाजपा के संगठन में निचले स्तर पर जो धार पैदा हुई थी वह निरंतर कुंद होती चली गई. अंतर सिर्फ इतना था कि भाजपा के कार्यकर्ताओं ने अन्य दलों की ओर पलायन नहीं किया क्योंकि विकल्प कम थे. पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक जिलाध्यक्ष कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद भाजपा के पास यह पहला मौका था कि वह जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा न करते हुए मतदाताओं के मन को भांपते हुए उम्मीदवार तय करे लेकिन पार्टी इसमें पूरी तरह से असफल रही.

लेखक

अखिलेश द्विवेदी अखिलेश द्विवेदी @akhilesh9009

स्वतंत्र पत्रकार

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