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Updated: 19 अप्रिल, 2022 06:20 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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हैरत ज़दा हैं रास्ते, हैरान संग-ए-मील

अंधे की रहनुमाई में, लंगड़ा सफ़र में है.

जाहिर है. गुमनाम शायर जब ये शेर लिख रहा होगा तो उसके मन में अनगिनत विचार चल रहे होंगे मगर उसने शायद ही कभी ये सोचा हो कि उसके इस शेर का इस्तेमाल भारतीय राजनीति में होगा और तुष्टिकरण वाली मुस्लिम राजनीति की दशा और दिशा बताएगा. भले ही अभी अंधे की रहनुमाई में, लंगड़ा सफ़र में न हो लेकिन जल्द ही ऐसा हो सकता है. यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही सीतापुर जेल में बंद आजम खान के करीबी समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर गंभीर आरोप लगा रहे थे. एआईएमआईएम को आपदा में अवसर दिखा. जैसे कयास हैं जल्द ही हम आजम खान को 'साइकिल' से उतरकर 'पतंग' की डोर थामे हुए देख सकते हैं. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने आजम खान को अपने पाले में लाने के लिए कयावद तेज कर है. एआईएमआईएम की तरफ से एक खत लिखा गया है और आजम को पार्टी में आने का न्योता दिया गया है. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन अपने इस प्लान के लिए कितना गंभीर है? इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जल्द ही पार्टी के लोग सीतापुर जेल जाएंगे और आजम खान से मुलाकात करेंगे. भले ही एआईएमआईएम को रिझाने में कामयाब हो जाए लेकिन जो बड़ा सवाल हमारे सामने है वो ये कि आजम खान अगर AIMIM में आ भी गए तो मुसलमानों का भला कैसे होगा?

Azam Khan, Samajwadi Party, Akhilesh Yadav, UP Assembly Elections, Muslim, Asaduddin Owaisi, AIMIMओवैसी आजम को अपने साथ जोड़ भी लें लेकिन उससे मुसलमानों की स्थिति शायद ही सुधरे

उपरोक्त सवाल क्यों जरूरी है? इसपर चर्चा होगी. लेकिन क्योंकि जिक्र आजम खान और एआईएमआईएम का हुआ है तो सबसे पहले हमें इस पूरे मामले को समझ लेना चाहिए. दरअसल जो चिट्ठी सीतापुर जेल में बंद आजम खान को लिखी गयी है उसे एआईएमआईएम के प्रवक्ता मोहम्मद फरहान की तरफ से लिखा गया है.

तीन पन्ने की इस चिट्ठी में फरहान ने आजम को बताया है कि समाजवादी पार्टी मुसलमानों की कतई हमदर्द नहीं है. वह मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक की तरह समझती है. पिछले तीन सालों में आजम खान और उनके परिवार के लिए अखिलेश यादव व उनके सिपहसालारों ने कोई ठोस आवाज नहीं उठाई. चिट्ठी में आजम खान से आग्रह किया गया है कि वह .

अपने खत में फरहान ने आजम को ये समझाने की कोशिश भी की है कि वो असदुद्दीन ओवैसी के साथ मिलकर मुसलमानों को सियासी पहचान दिलाएं. आगे तफ्सील से बात करने के लिए यूपी में असदुद्दीन ओवैसी के सिपाह-सालार मोहम्मद फरहान ने आजम खान से जेल में मुलाकात का वक़्त भी मांगा गया है.

बताया जा रहा है कि आजम के राजी होने के बाद ही एआईएमआईएम के नेता जेल जाकर आजम से मुलाकात करेंगे और आगे की रणनीति में चर्चा करेंगे? एआईएमआईएम, आजम को अपने पाले में कितनी कामयाब होती है? जवाब वक़्त देगा लेकिन बात मुसलमानों की हो, उनके फायदे की हो तो क्या उत्तर प्रदेश और क्या सम्पूर्ण देश आजम के कहीं आने या जाने से मुसलमानों की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला.

ये कथन यूं ही बेवजह नहीं है. इसे बात को समझने के लिए हमें 2014 का वो वक़्त देखना होगा जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी पर बड़ा दांव खेला और उन्हें पीएम उम्मीदवार के रूप में उतारा. तब अपनी कई सभाओं में पीएम ने मुस्लिम तुष्टिकरण को एक बड़ी समस्या बताया. अपनी रैलियों में पीएम ने इस मुद्दे को इस हद तक उठाया कि इसने हिंदू मतदाताओं को संगठित किया और हिंदू मतों की एक बड़ी संख्या भाजपा की झोली में आई.

फिर जैसे जैसे दिन बीते दलों को भी इस बात का एहसास हुआ कि अब इस मुद्दें (मुसलमानों के तुष्टिकरण) पर उनकी दाल और नहीं गलने वाली और उन्होंने धीरे धीरे अपने को मुस्लिम तुष्टिकरण से अलग किया. दलों को भी इस बात का एहसास हुआ कि राजनीति तभी संभव है जब वोट एक समुदाय के न होकर सबके हों.

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में मुस्लिम समाज और मुस्लिम राजनीति कहां हैं? इसपर बहुत ज्यादा चर्चा करने की जरूरत नहीं है. कहना गलत नहीं है कि चाहे वो 2014 का लोक सभा चुनाव हो या फिर 2019 का विधानसभा चुनावों से लेकर निकाय चुनावों तक हालिया दौर में हम कई मामले ऐसे देख चुके हैं जहां दलों ने मुसलमानों को उनकी जगह दिखा दी है.

हमें इस बात को भी समझना होगा कि पूर्व की अपेक्षा आज हिंदू वोटर कहीं ज्यादा संगठित है. ऐसे में अगर कोई सिर्फ मुसलमानों की बात, उनको अपने में जोड़ने की बात करेगा तो उसके लिए कोई बहुत ज्यादा स्कोप बचेगा नहीं. इस विषय को यदि किसी उदाहरण के जरिये समझना हो तो हम अभी हाल में बीते यूपी विधानसभा चुनावों का अवलोकन कर सकते हैं.

ज्ञात हो कि चाहे वो सूबे के यादव हों या फिर मुसलमान दोनों ही समुदायों ने अपने वोट समाजवादी पार्टी को दिए लेकिन कहीं भी अखिलेश की तरफ से इस बात का जिक्र नहीं किया गया. न ही खुद समाजवादी पार्टी ने इस बात को तरजीह दी.

बहरहाल बात आजम खान के AIMIM में आने और मुसलमानों के फायदे की हुई है. तो बता दें कि भले ही ये दल बदल आजम खान या ओवैसी के लिए फायदेमंद हो. लेकिन समुदाय का इससे कोई बहुत ज्यादा भला नहीं होने वाला. बल्कि बहुत साफ़ लहजे में कहें तो मौजूदा वक़्त वो समय है जब मुस्लिम तुष्टिकरण का सबसे बड़ा नुकसान खुद देश के मुसलमानों को है.

देश के मुसलमान साइडलाइन हो रहे हैं. आजम खान और ओवैसी जैसे नेताओं द्वारा अपने निजी फायदे के लिए उन्हें तबियत से साइडलाइन कियाजा रहा है. कुल मिलाकर दोराहे पर देश का मुसलमान है जिसे सबसे पहले खुद अपने को मुसलमानों का मसीहा कहने वाले ओवैसी या आजम का बहिष्कार कर एक नजीर बनानी चाहिए. 

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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