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 |  7-मिनट में पढ़ें  |   08-07-2018
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भ्रष्टाचार को लेकर पाकिस्तान से पहले बड़ी खबर मलेशिया से आयी थी. हाल के दिनों में सत्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार का सबसे जोरदार असर मलेशिया में देखने को मिला है. 92 साल के महातिर मोहम्मद ने अपने ही शागिर्द को चुनाव मैदान में चैलेंज कर सत्ता से बेदखल कर दिया. भारत में भी 2014 में भ्रष्टाचार ही सत्ता परिवर्तन की बड़ी वजह बना था.

पाकिस्तान में नवाज शरीफ तो चुनावी मैदान से पहले ही बेदखल हो चुके थे, अब चुनाव आयोग का कहना है कि उनकी बेटी मरियम और दामाद सफदर के नाम भी बैलट पेपर से हटा दिये जाएंगे. देखा जाये तो पाकिस्तानी हुक्मरानों की वो लॉबी जिसके हाथ सत्ता को इशारों पर नचाने वाली चाबी लग गयी है उसने नवाज शरीफ परिवार के राजनीतिक किले को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया है.

nawaz, mariyam sharifनवाज के साथ साथ बेटी मरियम का नाम भी बैलट से बाहर

पाकिस्तान में भ्रष्टाचार का जितना घातक असर नवाज परिवार के खिलाफ देखने को मिला है, भारत में ऐसा कम देखा जाता है. अगर कुछ होता भी है तो चुनावी सीजन में आरोप प्रत्यारोप और कभी कभी निम्न स्तर की बयानबाजी तक ही सीमित रह जाता है. हां, अदालती कार्यवाहियां इन सब से अलग रहती हैं.

अवाम तो नवाज के साथ

इसी साल फरवरी में जारी गैरसरकारी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ग्लोबल करप्शन परर्सेप्शन इंडेक्स 2017 में भारत का रैंक 81 था. पिछले साल भारत 79वें पायदान पर था. पाकिस्तान को इस सूची में 117वां स्थान हासिल हुआ था. कहने का मतलब ये कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही मुल्क भ्रष्टाचार के मामलों में पड़ोसी ही हैं.

पनामा पेपर लीक में पाकिस्तान के साथ साथ भारत के भी कई लोगों के नाम उजागर हुए थे. भारत में भी जांच पड़ताल की मांग उठी और सरकार ने सख्ती से पेश आने की बात दोहरायी. पाकिस्तान में जैसे बेसब्री से इंतजार हो रहा था. मौका मिलते ही लगा पाकिस्तान का पूरा सिस्टम जैसे नवाज को निपटाने में ही जुट गया हो.

जुलाई 2017 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने पनामा पेपर लीक मामले में नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार का दोषी करार दिया और उनके चुनाव लड़ने पर ताउम्र पाबंदी लगा दी गयी. फिर नवाज को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

nawaz, kulsum sharifलाहौर से कुलसुम नवाज की जीत नवाज शरीफ की लोकप्रियता का सबूत है...

नवाज के पक्ष में तब से लेकर अब तक अच्छी बात सिर्फ कुलसुम नवाज की जीत ही रही. नवाज के इस्तीफे के बाद उनकी पत्नी कुलसुम नवाज सामने आयीं. कुलसुम नवाज उस स्थिति में चुनाव जीतने में कामयाब रहीं जब सारी परिस्थितियां नवाज शरीफ के खिलाफ हो चुकी थीं. खुद कुलसुम तब भी लंदन में इलाज करा रही थीं और लाहौर में अकेले उनकी बेटी मरियम ने चुनाव प्रचार किया था. लाहौर की जीत को इस बात का सबूत तो माना ही जा सकता है कि अवाम नवाज शरीफ के खिलाफ नहीं है. अगर अवाम साथ नहीं होती तो जिस तरह के सरकारी माहौल में चुनाव कराया गया उसमें नवाज के पक्ष में नतीजे आने की गुंजाइश तो नहीं के बराबर ही होती.

पाकिस्तानी अदालत द्वारा 10 साल की सजा सुनाये जाने के बाद नवाज ने कहा भी है - 'जनता को सेना के जनरलों और कुछ जजों द्वारा थोपी गयी गुलामी से मुक्त करवाने की कोशिशों में सजा मिली है.' नवाज फिलहाल पत्नी के इलाज के सिलसिले में लंदन में हैं.

कसाब से भी बुरा बर्ताव

लाहौर की जनता की अदालत के फैसले में जो इशारा देखा गया, नवाज शरीफ के बयान का भी वही मतलब है. दरअसल, पाकिस्तान की फौज को ये लगने लगा था कि भारत के प्रति नवाज शरीफ का रूख वैसा नहीं जैसा पाकिस्तान की पुरानी पॉलिसी रही है. हालांकि, ये नवाज शरीफ ही रहे जो संयुक्त राष्ट्र के मंच से जम्मू कश्मीर में एनकाउंटर में मारे गये बुरहान वानी के लिए 'इंतफदा' जैसे लफ्ज का इस्तेमाल किया गया था. हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी 2016 में 8 जुलाई को सुरक्षा बलों के साथ एनकाउंटर में मारा गया था. बुरहान के मारे जाने के बाद से जम्मू कश्मीर में लगातार हिंसा का दौर जारी है, हालांकि, इन दो साल में बुरहान के सभी साथियों को सेना ने एक एक कर ढेर कर दिया है.

सवाल ये है कि क्या नवाज शरीफ को पाकिस्तान में फेयर ट्रायल का मौका नहीं दिया गया?

नवाज शरीफ का बयान तो यही कहता है. वैसे भी जब नवाज को दोषी करार दिया गया था, तब खबर आयी थी कि उनके वकीलों को अपनी बात रखने तक का मौका नहीं दिया गया था. माना जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में भी फौज का हाथ रहा है - और वहां उन्हीं लोगों को बिठाया गया है जो फौज की आइडियोलॉजी से इत्तेफाक रखते हैं.

फिर तो कहा जा सकता है कि नवाज के मुकाबले तो अजमल आमिर कसाब को फेयर ट्रायल का पूरा मौका मिला. कम से कम कसाब के मामले में तो उसे ज्यूडिशियरी की ओर से वकील भी मुहैया कराया गया था - और न्याय के सारे पड़ाव पार करते हुए वो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था.

फिर तो ये भी कहा जा सकता है कि नवाज शरीफ के साथ कसाब से कहीं ज्यादा बुरा बर्ताव पाकिस्तान में ही हुआ. देर से ही सही मुंबई हमले को लेकर नवाज शरीफ पाकिस्तान के हाथ होने की बात भी कबूल कर चुके हैं. जाहिर है ये सब भी पाकिस्तान में उनके खिलाफ ही जाएगा.

भारत-पाक की सियासत और भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार की मार तो भारत में भी कई नेताओं पर पड़ी है, लेकिन नवाज शरीफ का हाल ज्यादा बुरा लगता है. भारत में भी पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ा था, लेकिन कुर्सी छोड़ने के बाद. सुखराम और बंगारू लक्ष्मण जैसे नेताओं का राजनीतिक कॅरियर जरूर भ्रष्टाचार के कारण खत्म हो गया, लेकिन मौजूदा दौर में सबसे बड़ी मिसाल लालू प्रसाद हैं.

चारा घोटाले में लालू प्रसाद और पनामा केस में नवाज शरीफ के मामले थोड़े करीब जरूर लगते हैं. लालू का भी पूरा परिवार भ्रष्टाचार के लपेटे में है. तेजस्वी यादव को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते ही कुर्सी गंवानी पड़ी. जब तेजस्वी इस्तीफा देने को तैयार नहीं हुए तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद इस्तीफा दे दिया - और तेजस्वी सत्ता से अपनेआप बेदखल हो गये.

2G, कोयला घोटाला और कॉमन वेल्थ घोटाले ऐसे छाये कि 2014 में यूपीए की सरकार सत्ता से बेदखल तो हुई ही, कांग्रेस में 44 सीटों पर सिमट गयी. हालत ये हुई कि कांग्रेस के हाथ से विपक्ष का नेता पद भी जाता रहा.

2011 में हुए अन्ना आंदोलन के दौरान पाकिस्तान में भी जहांगीर अख्तर नाम के एक शख्स ने लोकपाल जैसे कानून की मांग उठायी थी. ये अन्ना आंदोलन ही रहा कि भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर अरविंद केजरीवाल राजनीति में आये और दिल्ली के मुख्यमंत्री बने. राजनीति में आने से पहले केजरीवाल के आरोपों का आलम ये रहा कि जो भी सामने मिला भ्रष्टाचार के आरोप लगाते गये. मानहानि का मामला जब अदालत तक पहुंचा तो वो एक एक कर माफी मांगना शुरू कर दिया. बहरहाल, अब तो सभी को वो माफीवाला क्लीन चिट दे चुके हैं.

ये केजरीवाल ही थे जो सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा का नाम सबसे पहले भ्रष्टाचार को लेकर उछाले. बाद बीजेपी ने भी चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ हमलों में वाड्रा का मामला जोर शोर से उठाया. रैलियों में तो जहां कहीं भी जरूरत समझ में आयी बीजेपी नेता सत्ता में आते ही वाड्रा को जेल भेजने के वादे कसमें तक खाते रहे. बाद में क्या हुआ सबको मालूम ही है.

देखा जाये तो भ्रष्टाचार को लेकर सियासी दुश्मनी भारत में भी निकाली जाती रही है, पाकिस्तान में उसका स्तर कहीं ज्यादा घटिया नजर आ रहा है. एक दौर रहा जब आय से अधिक संपत्ति के आरोपों में मायावती और मुलायम सिंह यादव सीबीआई के चाबुक से केंद्र में काबिज पार्टी द्वारा लगातार राजनीतिक हितों के हिसाब से नचाये जाते रहे. मगर, नवाज के विरोधियों ने जो दुश्मनी निभाई है वैसी भारत में देखने को नहीं मिली है.

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