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Updated: 08 मार्च, 2019 10:07 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने 15 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है. इसमें चार उम्मीदवार उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ेंगे, जबकि 11 उम्मीदवारों को गुजरात से मैदान में उतारा गया है. कांग्रेस इस पहली लिस्ट में पार्टी की चेयरमैन सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम तो है, लेकिन नवनिर्वाचित महासचिव प्रियंका गांधी को जगह नहीं मिली है. जहां एक ओर अटकलें लगाई जा रही थीं कि यूपी में सपा-बसपा के गठबंधन में कांग्रेस शामिल हो सकती है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने ये लिस्ट जारी कर के चुनाव से पहले गठबंधन नहीं करने के संकेत दे दिए हैं. वो बात अलग है कि अगर चुनाव के बाद सभी पार्टियां भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए एकजुट हो जाएं.

कांग्रेस की लिस्ट में बहुत से दिग्गज नाम हैं, लेकिन सवाल ये है कि इनमें से कितने जीतेंगे. पिछली बार भी कांग्रेस ने एक से बढ़कर एक धुरंधर नेता मैदान में उतारे थे, लेकिन 80 में से 59 सीटों पर तो कांग्रेस जमानत तक जब्त हो गई. यूपी में भाजपा की ऐसी लहर चली थी कि कांग्रेस के खाते में सिर्फ दो सीटें आईं, वो भी अपने घर की. यानी अमेठी और रायबरेली, जहां से राहुल गांधी और सोनिया गांधी जीतीं. चलिए एक नजर डालते हैं उन 15 सीटों पर, जिन पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा कांग्रेस ने की है और जानने की कोशिश करते हैं कि इस बार कांग्रेस कितनी सीटें जीत पाएगी.

लोकसभा चुनाव 2019, कांग्रेस, भाजपा, यूपी, गुजरातकांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने 15 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है.

गुजरात की चार सीटें

अहमदाबाद पश्चिम

ये सीट अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित है, जिस पर 2009 और 2014 में भाजपा के डॉ. किरीट सोलंकी जीते थे. इस बार कांग्रेस ने राजू परमार को इस सीट से खड़ा किया है, जो दो बार राज्यसभा सदस्य भी रह चुके हैं. पिछला रिकॉर्ड देखकर तो यही लग रहा है कि इस बार भाजपा हैट्रिक लगा सकती है. इस सीट पर 2009 में किरीट ने कांग्रेस के शैलेष मनहरलाल परमार को करीब 91 हजार वोटों से हराया था और 2014 में मोदी लहर के चलते कांग्रेस के मकवाना ईश्वरभाई धानाभाई को 3 लाख से भी अधिक वोटों से हराया था.

आनंद

गुजरात की आनंद सीट पर कांग्रेस ने भरत सिंह एम. सोलंकी को अपना उम्मीदवार बनाकर उतारा है. इस सीट पर 2009 और 2004 में लगातार दो बार भरत सिंह सोलंकी ही जीते थे, लेकिन 2014 में मोदी लहर के सामने वह टिक नहीं पाए और भाजपा के दिलीप पटेल ने उन्हें करीब 63 हजार वोटों से हरा दिया. यहां जानना जरूरी है कि 1999 में भी ये सीट भाजपा के खाते में ही थी. हालांकि, 1991, 1996 और 1998 में ये सीट कांग्रेस के खाते में थी. इस सीट के तहत 7 विधानसभा सीटें आती हैं और 2017 के विधानसभा चुनाव में 5 कांग्रेस ने जीती थीं, जबकि भाजपा सिर्फ दो ही जीत पाई वो भी काफी कम अंतर से. देखा जाए तो इस लोकसभा सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा है और उम्मीद है कि इस बार के चुनाव में ये सीट वापस कांग्रेस के खाते में आ जाए.

वडोदारा

इस बार वडोदरा सीट पर कांग्रेस ने प्रशांत पटेल को खड़ा किया है. 2014 में पीएम मोदी ने इस सीट से चुनाव लड़ा था और बड़ी जीत हासिल की थी और कांग्रेस के मधुसूदन मिस्त्री को 5 लाख 70 हजार वोटों से हराया था. वह वाराणसी से भी सांसद थे, इसलिए उन्होंने बाद में वडोदरा सीट छीड़ दी और दोबारा हुए चुनाव में भाजपा की रंजनबेन भट्ट ने कांग्रेस के नरेंद्र रावत को करीब 3.3 लाख वोटों से हराकर चुनाव जीत लिया. देखा जाए तो 1991 से लेकर अब तक यहां सिर्फ एक बार कांग्रेस जीती (1996) है, बाकी हर बार ये सीट भाजपा के खाते में ही आती है. इस बार भी यहां से कांग्रेस का जीतना मुश्किल है.

छोटा उदरपुर

एसटी के लिए आरक्षित इस सीट पर कांग्रेस ने रंजीत मोहन सिंह राठवा को अपना उम्मीदवार बनाकर उतारा है. यहां के मौजूदा सांसद राम सिंह राठवा हैं, जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नरेनभाई राठवा को करीब 1.80 लाख वोटों से हराया था. 2009 में भी राम सिंह ने नरेनभाई राठवा को करीब 26 हजार वोटों से हराया था. हालांकि, 2004 में ये सीट कांग्रेस के पास थी. यूं तो इस सीट पर 1967 से ही कांग्रेस का कब्जा रहा, लेकिन 1999 में राम सिंह राठवा ने कांग्रेस को हराकर उनकी पारंपरिक सीट छीन ली और उसके बाद भाजपा ने इस सीट पर जीतना शुरू कर दिया. पिछले चुनावों के नतीजे देखकर ये नहीं लगता कि इस बार भी कांग्रेस यहां अपनी जमीन बना पाएगी.

उत्तर प्रदेश की 11 सीटें

सहारनपुर

यहां पहला चुनाव 1952 में हुआ था, जिसके बाद 1977 तक ये सीट कांग्रेस के कब्जे में रही, लेकिन उसके बाद अगर 1984 के चुनाव को छोड़ दिया जाए तो आज तक कांग्रेस इस सीट पर नहीं जीत पाई. इस सीट पर कभी भाजपा जीती, कभी सपा, तो कभी बसपा. इस बार कांग्रेस ने यहां से इमरान मसूद को दोबारा मैदान में उतारा है. 2014 के चुनावों में भाजपा के राघव लखनपाल ने करीब 65 हजार वोटों से इमरान मसूद को हराया था. कांग्रेस ने दोबारा इमरान मसूद को ही मौका दिया है, क्योंकि उन्हें लगता है स्थिति सुधरी है. वैसे भी लोकसभा चुनाव में 65 हजार का अंतर कुछ खास नहीं होता. लेकिन पिछला रिकॉर्ड देखकर ये नहीं लगता जो कांग्रेस 1984 के बाद ये सीट कभी जीत ही नहीं सकी, वह इस बार कुछ कर पाएगी.

बदायूं

शुरुआती दौर पर इस सीट पर कांग्रेस का मिला-जुला असर दिखता था, लेकिन पिछले करीब दो दशक (1996) से ये सीट समाजवादी पार्टी के कब्जे में है. इस बार कांग्रेस ने यहां से सलीम इकबाल शेरवानी को खड़ा किया है. इस सीट पर कांग्रेस आखिरी बार 1984 में चुनाव जीती थी और अब तक वापसी नहीं कर पाई, तो इस बार भी कांग्रेस का चुनाव जीतना मुमकिन नहीं लगता. पिछली बार 2014 के लोकसभा चुनाव में तो यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गई थी. उस समय कांग्रेस और महान दल के गठबंधन से इस सीट पर महान दल के पगलानंद ने चुनाव लड़ा था, जिन्हें महज 5,748 वोट मिले थे. 2009 के चुनाव में भी कांग्रेस के प्रत्याशी सलीम इकबाल शेरवानी बुरी तरह हारे थे और तीसरे नंबर पर थे. ऐसे में ये लग रहा है कि इस बार भी कांग्रेस यहां से जीत नहीं पाएगी.

धौरहरा

2008 में ही ये सीट बनी है, जिसके बाद पहली बार यहां से कांग्रेस नेता जितेंद्र प्रसाद के बेटे जितिन प्रसाद चुनाव जीते थे. इस बार भी कांग्रेस ने उन्हीं पर अपना दाव खेला है. हालांकि, 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर के सामने जितिन प्रसाद टिक नहीं पाए थे और भाजपा की रेखा वर्मा से करीब 1.90 लाख वोटों से हार गए थे. हालात इतनी बुरी थी कि उनकी जमानत तक जब्त हो गई थी. इस लोकसभा में 5 विधानसभा सीटें हैं और सभी पर 2017 में भाजपा जीती थी. इतनी बुरी तरह से हारने के बाद कम से कम इस बार तो कांग्रेस इस सीट पर वापसी नहीं कर पाएगी.

उन्नाव

1952 में इस सीट पर पहली बार चुनाव हुआ था, जिसमें कांग्रेस के विश्वंभर दयाल त्रिपाठी जीते. 6 बार ये सीट लगातार कांग्रेस के खाते में गई, जिसके बाद 1977 में जनता पार्टी ने इस परंपरा को तोड़ दिया. इसके बाद 1980 और 1984 में भी यहां कांग्रेस जीती, लेकिन उसके बाद लगातार हारती रही और 2009 में अन्नू टंडन ने कांग्रेस को जीत दिलाई. इस बार भी कांग्रेस ने अन्नू टंडन को ही टिकट दिया है. शायद कांग्रेस को उम्मीद है कि वह जीत जाएं. यहां आपको बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के साक्षी महाराज ने 3.21 लाख वोटों से अन्नू टंडन को हराया था. सपा और बसपा के उम्मीदवारों को भी कांग्रेस से अधिक वोट मिले थे. कांग्रेस प्रत्याशी अन्नू टंडन की तो जमानत तक जब्त हो गई थी. इस बात का भी कोई इशारा नहीं मिल रहा है कि इस बार भी कांग्रेस इस सीट से जीत सके.

रायबरेली

पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने जो 2 सीटें जीती थीं, उनमें से एक है रायबरेली. अगर 1977, 1996 और 1998 के लोकसभा चुनावों को छोड़ दें तो यहां हमेशा कांग्रेस ही जीती है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भी सोनिया गांधी ने लोकसभा चुनाव में भाजपा के अजय अग्रवाल को करीब 3.50 लाख वोटों से हराया था. ये कांग्रेस की घरेलू सीट है तो उम्मीद है कि इस बार भी इसे कांग्रेस ही जीतेगी. इस बार भी इस सीट पर कांग्रेस की ओर से सोनिया गांधी ही चुनाव लड़ रही है.

अमेठी

यहां से राहुल गांधी चुनाव लड़ते हैं और जीतते भी हैं. इस बार भी राहुल इसी सीट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं. अगर 1977 और 1998 के लोकसभा चुनावों को छोड़ दें तो 1967 से लेकर अब तक यहां हमेशा कांग्रेस ही जीतती रही है. लेकिन इस बार अमेठी में भी कांग्रेस को तगड़ी टक्कर मिल सकती है और हो सकता है कि कांग्रेस का ये सीट बार-बार जीतने का रिकॉर्ड एक बार फिर टूट जाए. पिछली बार भी राहुल गांधी ने भाजपा की स्मृति ईरानी को करीब 1 लाख वोटों से ही हराया था. इसके बाद से लेकर अब तक ईरानी ने अमेठी में खूब काम किया, पीएम मोदी भी वहां का दौरा करते रहे और हाल ही में एक फैक्ट्री तक का उद्घाटन कर चुके हैं. इन सबका फायदा भाजपा को मिल सकता है. इस सीट पर सपा-बसपा की ओर से कोई उम्मीदवार नहीं उतारा जा रहा है. यानी यहां सीधा मुकाबला होगा कांग्रेस और भाजपा के बीच और इस बार पलड़ा भाजपा का भारी है.

फर्रूखाबाद

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की फर्रूखाबाद लोकसभा सीट से सलमान खुर्शीद को उतारने का फैसला किया है. ये सीट ऐसी है, जिस पर किसी एक पार्टी का कब्जा नहीं रहा है. यहां सभी पार्टियों का मिला-जुला असर रहता है. 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां से भाजपा के मुकेश राजपूत जीते थे और सलमान खुर्शीद की तो जमानत तक जब्त हो गई थी. एक बार फिर से कांग्रेस ने सलमान खुर्शीद पर ही दाव खेला है और ये नहीं लगता कि इस बार भी वह फर्रूखाबाद में अपनी जमीन बनाने में सफल हो सकेंगे.

अकबरपुर

2008 में ही ये लोकसभा सीट बनी है. इसके बाद पहला चुनाव कांग्रेस जीती थी, लेकिन 2014 में मोदी लहर के सामने कुछ खास नहीं कर सकी और भाजपा के उम्मीदवार देवेंद्र सिंह से बुरी तरह हार गई. उल्टा यहां से चुनाव लड़ रहे कांग्रेस प्रत्याशी राजाराम पाल की जमानत तक जब्त हो गई. इस बार भी कांग्रेस ने राजाराम पाल पर ही दाव खेला है और देखा जाए तो इस बार उनके जीतने की उम्मीद नहीं है. इसकी एक वजह ये भी है कि इसी सीट पर बसपा ने निशा सचान को उतारा है. आपको बता दें कि 2014 के चुनाव में बसपा दूसरे नंबर की सबसे बड़ी पार्टी थी. यानी यहां टक्कर सपा-बसपा के गठबंधन और भाजपा के बीच है. कांग्रेस तो दूर-दूर तक नहीं दिखती.

जालौन

एससी के लिए आरक्षित इस सीट पर 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के भानु प्रताप सिंह वर्मा इस सीट पर जीते थे, जबकि बसपा दूसरे नंबर पर और सपा तीसरे नंबर पर रही थी. कांग्रेस के उम्मीदवार विजय चौधरी की तो जमानत तक जब्त हो गई थी. इस बार यूपी की जालौन सीट से कांग्रेस के ब्रिज लाल खबरी को टिकट मिला है. कांग्रेस इस सीट पर सिर्फ 1980 और 1984 में जीती है. उसके अलवा अब तक कभी भी ये सीट कांग्रेस के खाते में नहीं गई. इस बार भी ऐसे कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं, जिन्हें देखकर ये कहा जाए कि ये सीट कांग्रेस के खाते में जा सकती है.

फैजाबाद

कांग्रेस ने निर्मल खत्री को इस बार फैजाबाद लोकसभा सीट से चुनाव में उतारा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने खत्री को ही टिकट दिया था और उनकी जमानत तक जब्त हो गई थी. इस सीट पर भाजपा के लल्लू सिंह ने विजय पताका फहराई थी. शुरुआत में तो इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन अब इस पर राजनीतिक पार्टियों का मिला-जुला असर देखने को मिलता है. अयोध्या की वजह से ही फैजाबाद सबसे अधिक चर्चा में रहता है और अयोध्या का यहां की राजनीति पर भी बड़ा असर दिखता है. भाजपा ने राम मंदिर बनवाने की खूब कोशिशें की हैं और इसके लिए अभी तक अपनी ताकत झोंकी हुई है. अगर भाजपा यहां से जीतती है तो उसका काफी श्रेय राम मंदिर बनाने की भाजपा की कोशिशों को जाएगा. हालांकि, कांग्रेस यहां दूर-दूर तक नहीं दिख रही है.

कुशी नगर

यह लोकसभा सीट भी 2008 में ही बनी है. पहली बार तो यहां कांग्रेस जीती, लेकिन दूसरी बार भाजपा के राजेश पांडे ने कांग्रेस के रतनजीत प्रतान नारायण सिंह को करीब 85 हजार वोटों से हरा दिया. हालांकि, ये अंतर कुछ खास बड़ा नहीं है और अगर इस सीट पर दोबारा कांग्रेस वापसी कर ले तो हैरानी की बात नहीं होगी.

कांग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल 545 सीटों में से 464 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. चुनावी नतीजे आए तो पता चला कि सिर्फ 44 सीटों पर ही जीत हासिल हुई. 179 उम्मीदवारों की तो जमानत तक जब्त हो गई. सिर्फ यूपी की अगर बात करें तो कुल 80 में से 67 सीटों पर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 59 की तो जमानत ही जब्त हो गई, सिर्फ 8 उम्मीदवार ही अपनी जमानत बचा सके और सिर्फ दो ही उम्मीदवार (राहुल गांधी और सोनिया गांधी) जीते.

यूपी में इतने बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस के लिए अपनी जमीन बनाना कितना मुश्किल है, ये उनकी पहली 15 लोगों की लिस्ट देखकर ही साफ होता है. जिन 15 सीटों का जिक्र है, उनमें से सिर्फ 2 सीटों (रायबरेली और अमेठी) पर ही कांग्रेस का कब्जा है. इनमें से गुजरात की चारों सीटों पर तो कांग्रेस अपनी जमानत बचाने में कामयाब रही थी, लेकिन यूपी की 11 में से 7 सीटों पर कांग्रेस की जमानत तक जब्त हो गई थी. अब इन आंकड़ों को देखकर ये तो साफ हो रहा है कि कांग्रेस कितनी बुरी हालत में है. 15 सीटों की इस लिस्ट में कांग्रेस गुजरात की आनंद लोकसभा सीट और यूपी की रायबरेली और कुशीनगर सीट पर जीत हासिल कर सकती है. इस बात तो लग रहा है कि कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी भी अमेठी से हार जाएंगे.

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