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Updated: 16 सितम्बर, 2017 03:36 PM
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'बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो' - दो साल पहले विधानसभा चुनाव में ये महागठबंधन का स्लोगन था. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को ये स्लोगन तब तो बिलकुल नहीं सुहाता रहा, मगर अब भी बहुत कुछ बदल गया हो ऐसा नहीं लगता. नीतीश कुमार के महागठबंधन से एनडीए में शिफ्ट हो जाने के बाद ये स्लोगन भी बदल गया है. अमित शाह चाहते तो हैं बिहार में बहार हो, लेकिन अब सिर्फ 'नीतीशे कुमार' न हो.

क्या चाहते हैं अमित शाह

लोग क्या चर्चा कर रहे है? जनता में क्या मैसेज है? सरकार कैसे काम कर रही है? बिहार बीजेपी के नेताओं से अमित शाह के यही सवाल थे. इस मीटिंग में बिहार बीजेपी के अध्यक्ष नित्यानंद राय और डिप्टी सीएम सुशील मोदी के साथ साथ नंद किशोर यादव, मंगल पांडेय जैसे नीतीश सरकार के मंत्री भी शामिल थे. बिहार से आने वाले केंद्रीय मंत्रियों रविशंकर प्रसाद, राधामोहन सिंह और गिरिराज सिंह के अलावा डॉ. सीपी ठाकुर भी मौजूद थे.

शाह ने नीतीश सरकार में शामिल सभी मंत्रियों को निर्देश दिये कि वो हर सोमवार और मंगलवार को जनता के साथ संवाद करें ताकि उनकी मन की बात सुनी और समझी जा सके.

amit shahजनता से संवाद पर जोर...

बीजेपी कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में लाने के लिए शाह तीन दिन के बिहार दौरे पर जाने वाले हैं. ये दौरा अक्टूबर के आखिरी या नवंबर के पहले हफ्ते में हो सकता है. शाह का ये दौरा भी दूसरे राज्यों की तरह काफी व्यस्त रहने वाला है - पता चला है कि तीन दिन में करीब दो दर्जन बैठकों का दौर चल सकता है.

बड़ी बात तो ये होगी कि शाह के पटना पहुंचने से पहले इस्तीफों का दौर कैसा होगा? लखनऊ जैसा ही होगा या उससे अलग? इसी जुलाई में लखनऊ पहुंचते पहुंचते तो शाह ने विपक्षी नेताओें के इतने इस्तीफे करा दिये की योगी सरकार से वे सारे मंत्री जो किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे, एक एक कर ऐडजस्ट हो गये. उस दिन समाजवादी पार्टी के तीन एमएलसी - बुक्कल नवाब, यशवंत सिंह और मधुकर जेटली के साथ साथ बीएसपी के जयवीर सिंह ने यूपी विधान परिषद से इस्तीफा दे दिया था. देखना होगा पटना में क्या होता है?

चर्चा तो यहां तक है कि 2019 से पहले दूसरे दलों के कई सांसद और विधायक बीजेपी का दामन थाम सकते हैं और इनमें सहयोगी दलों के भी हो सकते हैं. एनडीए सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा के साथी सांसद अरुण कुमार उनका साथ छोड़ चुके हैं. रामविलास पासवान के दो सांसद महबूब अली कैसर और रामकिशोर सिंह का भी वही हाल है. इनके भगवा ओढ़ते ही बीजेपी की सीटों पर दावेदारी अपने आप बढ़ जाएगी. जीतनराम मांझी की ओर से भी बीजेपी में विलय का ऑफर मिल चुका है.

आखिर यही सब तो चाहते हैं अमित शाह - वैसे भी स्वर्णिम काल में पहुंचने के लिए भला और क्या चाहिये.

2009 बनाम 2019

चार साल के गैप को छोड़ दें तो दस साल बाद 2019 में फिर से नीतीश कुमार और बीजेपी चुनाव मैदान में साथ उतरने वाले हैं. दो साल पहले हुई करारी हार और गठबंधन सरकार के सात साल के कड़वे अनुभव के बाद न तो वैसे रिश्ते हैं और न ही हालात. सबसे बड़ा फर्क नीतीश की पोजीशन में हुआ है. तब नीतीश का दबदबा हुआ करता था, अब नीतीश कुमार बीजेपी की कृपा से कुर्सी पर बैठे हैं. नीतीश कब तक बैठे रहेंगे इस बारे में भी कानाफूसी अक्सर ही चला करती है.

दरअसल, पिछली गठबंधन सरकार में बीजेपी की स्थिति दोयम दर्जे की ही रही. कहने को सुशील मोदी डिप्टी सीएम जरूर थे लेकिन देखा जाता रहा कि नीतीश सारे फैसले एकतरफा ही लेते रहे. अब ऐसा नहीं होता. कामकाज और प्रशासनिक मामलों में नीतीश कुमार अब सुशील मोदी की भी सलाह जरूर लेते हैं.

nitish kumar, amit shahहर तीसरे महीने समीक्षा को क्या समझा जाये?

सुना है कि अमित शाह नीतीश सरकार में जूनियर पार्टनर नहीं, बल्कि बराबरी का दर्जा चाहते हैं. अब ये नीतीश की सियासी काबिलियत पर निर्भर करता है कि कब तक बराबरी के दर्जे पर बने रहते हैं, वरना - बीजेपी तो उन्हें जूनियर पार्टनर बनाने के ही सपने देख रही होगी.

मीडिया रिपोर्ट बताती हैं कि शाह ने दो बातें और साफ कर दी हैं. एक, पता चला है कि अब से हर तीसरे महीने अमित शाह नीतीश सरकार के कामकाज की समीक्षा करेंगे. और दो, 2019 के चुनाव में उन सीटों पर भी जिन पर एनडीए के सहयोगी दलों के उम्मीदवार होंगे, वहां भी बूथों पर बीजेपी कार्यकर्ता तैनात रहेंगे. ये नीतीश कुमार के लिए बहुत मायने रखती हैं और इनमें उनके लिए बड़ा संदेश भी छुपा हुआ है.

2009 में नीतीश की जेडीयू 25 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और बीजेपी सिर्फ 15 सीटों पर. साफ है - 2019 में तो मामला पूरी तरह उल्टा होगा. वैसे भी 2014 के आम चुनाव में बीजेपी को बिहार में 22 सीटें हासिल हुईं. साथियों में रामविलास पासवान को छह और उपेंद्र कुशवाहा को तीन.

2019 में बीजेपी खुद 23 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है. फिर तो सहयोगियों के लिए 17 सीटें ही बचेंगी. बिहार में लोक सभा की 40 सीटें हैं. ऐसे में नीतीश की पार्टी को बीजेपी 10-11 से ज्यादा देने के बारे में सोच भी नहीं रही है, ऐसी खबरें आ रही हैं. कोई भी सहज अंदाजा लगा सकता है, महागठबंधन में नीतीश का ये हाल तो नहीं ही होता. वैसे नीतीश के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें तो कहना मुश्किल है. आगे कुछ भी हो सकता है.

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