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Updated: 25 मार्च, 2022 02:47 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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हर फैसले की सफलता और असफलता देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर करती है - क्योंकि कोई भी फैसला वक्त का मोहताज होता है. और अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के लोक सभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर दिल्ली की जगह लखनऊ पर फोकस करने के फैसले को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखना उचित होगा.

मैनपुरी की करहल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतने के बाद अखिलेश यादव ने आजमगढ़ छोड़ दिया है. हो सकता है आजमगढ़ के लोगों ने ये तभी मान लिया हो, जब अखिलेश यादव के करहल से चुनाव लड़ने की समाजवादी पार्टी की तरफ से घोषणा की गयी.

आखिरकार अखिलेश यादव ने भी आजमगढ़ छोड़ दिया है. हो सकता है अखिलेश यादव इस्तीफे से पहले कोई फैसला कर चुके हों, जिसे अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है. वैसे 2014 में मुलायम सिंह यादव ने भी दो सीटों से चुनाव जीतने के बाद करीब करीब वैसा ही फैसला लिया था.

अपने विधानसभा चुनाव लड़ने को लेकर भी अखिलेश यादव कह रहे थे कि आजमगढ़ के लोगों से पूछ कर फैसला करेंगे - और फिर करहल से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी गयी. करहल भी मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) के मैनपुरी इलाके में ही आता है. मुलायम सिंह यादव के 2019 में मैनपुरी लोक सभा सीट चुन लेने पर अखिलेश यादव आजमगढ़ चले गये थे.

नेता का बेटा और नेता बनने में फर्क है: जैसे मुलायम सिंह यादव 2014 में दो-दो सीटों से चुनाव लड़े थे, 2009 में अखिलेश यादव ने भी ऐसा ही किया था - कन्नौज और फिरोजाबाद दो सीटों से चुनाव लड़े थे. मुलायम सिंह की तरह वो भी दोनों जगह से जीत गये और पिता की तरह ही एक सीट परिवार को देने का फैसला किया.

जैसे 2000 में मुलायम सिंह यादव ने अपनी कन्नौज सीट अखिलेश यादव को दे दी थी, डिंपल को 2009 में फिरोजाबाद सीट से मौका तो वैसा ही मिला था लेकिन वो कांग्रेस के राज बब्बर से पहला ही चुनाव हार गयीं. ये हार अखिलेश के लिए बहुत तकलीफदेह रही. फिर तो अखिलेश यादव साइकिल लेकर निकल ही पड़े - और कहते हैं कि समाजवादी पार्टी को सत्ता दिलाकर ही दम लिये थे.

हालांकि, तब अखिलेश यादव लोगों के बीच मुलायम सिंह यादव का बेटा बन कर निकले थे, लेकिन अब उनको खुद ही मुलायम बन कर लोगों के पास पहुंचना होगा - 2022 का चुनाव बता रहा है कि कैसे अखिलेश यादव को मुलायम सिंह की ही तरह मुस्लिम वोट तो मिल गये है, लेकिन ओबीसी में यादवों से आगे कुछ भी हासिल न हुआ.

योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की सत्ता में वापसी से कई बातें साफ हो गयी हैं. बीजेपी के राष्ट्रवाद का एजेंडा यूपी की जातीय राजनीति पर कहर बन कर टूट पड़ा है. अब अगर अखिलेश यादव को सत्ता में वापसी करनी है तो मुलायम जैसा ही पिछड़ों का नेता बनना होगा, न कि सिर्फ यादवों की नुमाइंदगी से आगे काम चलने वाला है!

दिल्ली या लखनऊ नहीं, लोगों के बीच रहना जरूरी

हो सकता है समाजवादी पार्टी में किसी ने अखिलेश यादव को सुझाव दिया हो कि वो 2019 में आजमगढ़ से सांसद बन जाने की वजह से वो लखनऊ से कट गये थे - क्योंकि संसद की राजनीति तो दिल्ली से होती है, लेकिन ये सलाह सिर्फ गुमराह करने वाली बात ही लगती है.

akhilesh yadav, mulayam singh yadavसंसद या विधानसभा नहीं अखिलेश यादव को जनता के दरबार में हाजिरी लगानी होगी, तभी कल्याण होगा.

असल बात तो ये है कि अखिलेश यादव पूरे पांच साल हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे - और कोरोना काल में तो जैसे पॉलिटिकल क्वारंटीन में चले गये थे. तभी तो मायावती के साथ साथ अखिलेश यादव पर भी वर्क फ्रॉम होम पॉलिटिक्स के आरोप लगने लगे थे.

बेशक सरकारी तंत्र के अलावा कोविड महाआपदा के दौरान किसी और के लिए काम करने का कोई स्कोप नहीं बचा था, लेकिन उसी माहौल में बिहार में पप्पू यादव भी तो लोगों की मदद करते देखे गये थे.

जो सवाल यूपी की योगी सरकार से अखिलेश यादव को पूछने चाहिये थे, वही सवाल अमित शाह चुनावों में अखिलेश यादव से बार बार पूछ रहे थे - कहां थे जब लोग कोरोना संकट से जूझ रहे थे?

अगर अखिलेश यादव भी पप्पू यादव की राह पकड़ लिये होते तो यूपी के लोगों का भरोसा जीत सकते थे. हो सकता है समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी पप्पू यादव की तरह जेल जाना पड़ता - अगर तभी जेल चले गये होते तो चुनावों में अखिलेश यादव की पार्टी का ये हाल नहीं होता.

जब कोरोना संकट के दौरान लोग अपने मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराने और सिलिंडर के लिए सड़कों पर भाग रहे थे, अगर समाजवादी पार्टी के लोग भी साथ खड़े हो गये रहते तो लोगों को लगता कि कोई है - सरकार नहीं मदद कर रही तो क्या हुआ कोई और तो है ना.

लेकिन अगर अखिलेश यादव खुद या उनके सलाहकार ये सोचते हैं कि लखनऊ से ज्यादा प्रभावी राजनीति हो सकेगी तो सही नहीं सोच रहे हैं - दिल्ली या लखनऊ में रहने से नहीं, बल्कि लोगों के बीच रहने से ही ज्यादा फर्क पड़ सकता है.

बीजेपी से लड़ने के लिए विपक्ष में मजबूत पैठ जरूरी है

अगर 2024 तक नहीं तो उससे कुछ पहले तक वो चाहते तो लोक सभा में खड़े होकर अपनी बात कह सकते थे. लोक सभा में अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव के मुकाबले ज्यादा मजबूती के साथ अपनी बात रखते. हाल फिलहाल तो ऐसा ही समझा जा सकता है.

2014 के बाद से मुलायम सिंह की मौजूदगी तो सिर्फ दो वाकयों के लिए याद रहती है. एक, जब वो पूरे परिवार के साथ सदन में बैठे रहते थे, जबकि पूरा विपक्ष बहिष्कार कर चुका होता. दूसरा मौका तो 2019 के आम चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी को सत्ता में वापसी के लिए आशीर्वाद देने का याद आता है.

अखिलेश यादव के सांसद होने का मतलब था दिल्ली की राजनीति में सक्रिय रहना. दिल्ली की राजनीति में भी विपक्षी खेमे की राजनीति में सक्रिय भागीदारी जो विपक्ष की राजनीति में मौजूदा दौर में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है. जिस तरीके से बीजेपी विपक्ष के पीछे हाथ धोकर पड़ी है, अखिलेश यादव के लिए फिलहाल लखनऊ से ज्यादा फायदेमंद दिल्ली हो सकती थी. लखनऊ की राजनीति के लिए अखिलेश यादव के पास अभी तो पूरे पांच साल बचे हुए हैं.

अखिलेश के लिए यादव और मुस्लिम गठजोड़ नाकाफी है

यूपी चुनाव में अखिलेश यादव को खूब मुस्लिम वोट मिले हैं. चुनाव नतीजे आने के बाद समझ में आया कि अमित शाह का अंदाजा कितना सही था. अमित शाह ने मायावती और बीएसपी की प्रासंगिकता को लेकर बयान दिया था जिसका मकसद था सारे मुस्लिम वोटों को समाजवादी पार्टी की झोली में जाने से रोकना.

लेकिन अखिलेश यादव को मुस्लिम और यादवों के अलावा कोई और वोट नहीं मिल सका. पूरे चुनाव वो जयंत चौधरी के साथ जगह जगह घूम कर कहते रहे कि समाजवादियों के साथ ही अंबेडकरवादियों को भी आ जाना चाहिये, लेकिन उनकी सुनी किसी ने नहीं.

जिन वोटों की आस में अखिलेश यादव, मायावती के वोटर को नाखुश करने से डरते रहे वो बड़े आराम से बीजेपी की तरफ छिटक गया - डर तो ऐसा लगा कि करहल के अपने गढ़ में भी अखिलेश यादव ने बुजुर्ग मुलायम सिंह को घर से बुलाकर मंच पर खड़ा कर दिया. मुसीबत ये कि वो भी अखिलेश के लिए वोट मांगना भूल गये थे. जब याद दिलाया गया तो बोले जिता देना.

'सबका साथ, सबका विकास' वाला फॉर्मूला अपनायें

ये ठीक है कि विधायक दल का नेता चुने जाते ही योगी आदित्यनाथ याद दिलाने लगे हैं कि कैसे यूपी के लोगों ने जातिवाद और परिवारवाद की राजनीति को नकार दिया है, लेकिन अखिलेश यादव के लिए ऐसे आरोप खुशी खुशी स्वीकार करते हुए राजनीति करना ही फायदेमंद है.

न्यूज एजेंसी एएनआई को दिये इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी याद दिलाने की कोशिश की थी कि कैसे एक दौर में एक ही परिवार के 45 लोगों के पास कोई न कोई पद हुआ करता था - और 25 साल के होते ही वे लोग चुनाव मैदान में कूद पड़ते थे. मोदी के निशाने पर भी मुलायम सिंह यादव ही थे.

अब अगर अखिलेश यादव को भी ऐसे आरोप राहुल गांधी की तरह बहुत बुरे लगते हैं तो बात और है, लेकिन हकीकत यही है कि अखिलेश यादव के लिए भी राजनीति में सफल होने के लिए परिवार का एकजुट बने रहना जरूरी है.

अपर्णा यादव के बीजेपी में चले जाने से बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला, लेकिन शिवपाल सिंह यादव को भी उनका हक और हिस्सा देना ही होगा. एक सीट देकर एहसान करने के बजाय शिवपाल यादव को भी सीटें वैसे ही देनी चाहिये थी, जैसे ओमप्रकाश राजभर या जयंत चौधरी को अखिलेश यादव ने दिये थे - वरना, बीजेपी कब उनको नया अमर सिंह बना लेगी अखिलेश को भनक भी नहीं लगने वाली है.

मुलायम बनना मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन तो नहीं!

निश्चित तौर पर मुलायम सिंह यादव भी यादव-मुस्लिम वाली राजनीति करते रहे. जैसे बिहार में लालू यादव M-Y फैक्टर चला रहे थे, लेकिन अपनी अपनी विरासत संभाल रहे अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव दोनों का प्रदर्शन काफी अलग रहा है.

तेजस्वी यादव जहां चुनावों के दौरान लालू यादव के जेल में रहते हुए भी बहुमत के करीब पहुंच गये थे, वहीं मुलायम सिंह यादव को चुनाव कैंपेन में शामिल करने के बावजूद अखिलेश यादव बहुमत के आंकड़े से काफी दूर रह गये. जिस राह पर अखिलेश यादव पहले से ही सतर्कता बरतते हुए चल रहे थे, तेजस्वी यादव का प्रदर्शन तो बिहार में समाजवादी नेता से बेहतर ही रहा.

मायावती और अखिलेश यादव दोनों की 2022 की हार एक जैसी ही है - क्योंकि मुस्लिम वोट को छोड़ दें तो दोनों ही को अपनी अपनी कम्युनिटी के अलावे किसी और का वोट नहीं मिला. जो थोड़े बहुत लोग बीजेपी से नाराज भी थे, वे भी अखिलेश यादव या मायावती को अपने वोट देने को राजी नहीं थे.

अखिलेश यादव को मालूम होना चाहिये कि सिर्फ यादवों का नेता बनने से काम नहीं चलने वाला पिता की तरह ही पिछड़ों का नेता बनना होगा. मुलायम सिंह से अगर अखिलेश यादव को कुछ सीखना है तो राजनीतिक विरोधियों से हाथ मिलाने के साथ साथ कब और कैसे उनको झटके देने हैं ये भी सीखना होगा - मान लेते हैं अखिलेश के लिए मुलायम बनना बेहद मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन भी तो नहीं है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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