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Updated: 09 अगस्त, 2018 12:57 PM
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तामिलनाडु की राजनीति के दो सबसे मजबूत स्तम्भ जयललिता और करूणानिधि के निधन के बाद राज्य में राजनीतिक शून्यता की स्थिति बनती दिख रही है.राज्य की दो प्रमुख पार्टियां नेतृत्व के स्तर पर असहाय महसूस कर रहीं हैं. तमिल अस्मिता को नई पहचान देने के लिए राज्य में नई क्षेत्रीय पार्टियों का लगातार आगमन हुआ है. कमल हासन और रजनीकांत पहले ही अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जगजाहिर कर चुके हैं. सभी पार्टियां राज्य में फिर से अपने राजनीतिक भविष्य की तलाश में जूट गईं हैं और राज्य की राजनीति में कोलाहल की स्थिति बनी हुई है.

करुणानिधि, जयललिता, राजनीतिक शून्यता, तमिलनाडु  करूणानिधि और जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु का राजनीतिक नेतृत्व असहाय दिख रहा है.

देश में होने वाले अगले लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के लिए 39 सांसदों वाले इस राज्य में अपनी मौजूदगी को बढ़ाने का सबसे उत्तम समय यही है. लेकिन तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति और तमिल अस्मिता का कॉकटेल राज्य में राष्ट्रीय पार्टियों के राजनीतिक सफलता में सबसे बड़ी बाधा दिखती है जिसका तोड़ निकाले बिना कांग्रेस या बीजेपी के लिए राजनीतिक घुसपैठ मुश्किल लगता है.

तमिलनाडु की राजनीति में पिछले पांच दशकों से डीएमके और एआईडीएमके का ही राज रहा है. हिंदी विरोधी आंदोलन में जलने के बाद राज्य के लोगों ने कभी भी राष्ट्रीय पार्टियों के ऊपर भरोसा नहीं किया. क्षेत्रीय अस्मिता का उफान पैदा कर क्षेत्रीय पार्टियों ने राज्य की राजनीति को हमेशा के लिए क्षेत्रीय पहचान तक ही सीमित कर दिया. डीएमके और एआईडीएमके की आपसी राजनीतिक रंजिश ने क्षेत्रीय राजनीति में कड़वाहट के नई आयाम जोड़े. तमिलनाडु में कभी के.कामराज जैसे कद्दावर कांग्रेसी नेता के होने के बावजूद कांग्रेस पार्टी पिछले कई दशकों से राज्य की राजनीति में हाशिये पर ही है. डीएमके यूपीए में कांग्रेस की सहयोगी रह चुकी है और कांग्रेस भी तामिलनाडु में अपने राजनीतिक खालीपन को डीएमके के सहारे ही पूरी करती आयी है.

भाजपा की अगर बात करें तो वाजपेयी के ज़माने से ही इनका झुकाव जयललिता की पार्टी एआईडीएमके की तरफ रहा है. नरेंद्र मोदी और जयललिता के आपसी सम्बन्ध भी मधुर थे. जिसके कारण एआईडीएमके और भाजपा में नजदीकियां हाल- फिलहाल में और बढ़ी हैं. लोकसभा में विपक्षी एकता को मात देने के लिए नरेंद्र मोदी ने हमेशा जयललिता की पार्टी का तुरुप के पत्ते के रूप में इस्तेमाल किया. 2016 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का वोट प्रतिशत 3% के आसपास था. वही अगर 2014 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा गठबंधन को राज्य में 18.6% वोट मिले थे जो कि 2009 के लोकसभा चुनाव में प्राप्त वोट प्रतिशत से भी कम था. जब पूरे देश में मोदी लहर ने हड़कंप मचा दिया उस दौर में भी तमिलनाडु कि राजनीति अभेद साबित हुई.

क्षेत्रीय पार्टियों में आपसी कलह

करूणानिधि के निधन के बाद डीएमके दो धड़ों में बंट सकती है. उनके दोनों बेटे की आपसी कलह सतह पर आ सकती है. 2014 में ही करूणानिधि ने अपने बड़े बेटे एम.के.अलागिरी को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण बाहर का रास्ता दिखा दिया था. अब इनकी मृत्यु के बाद अलागिरी भी पार्टी पर अपना दावा ठोक सकते हैं. राज्य के दक्षिणी हिस्से में अलागिरी एक लोकप्रिय नेता हैं. एम.के.स्टालिन पार्टी पर अपना दावा किसी भी सूरत में खोना नहीं चाहेंगे. वहीँ अगर सत्ताधारी पार्टी की बात की जाये तो वहां भी मुख्यमंत्री पलानीस्वामी और उपमुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम के बीच का रिश्ता जरुरत से ज्यादा मजबूरी का लगता है.

कमल हासन और रजनीकांत किस करवट बैठेंगे

कमल हासन और रजनीकांत का साथ आना आसान नहीं है.राजनीति को लेकर इन्होंने जो नज़रिया पेश किया है, उसमें भारी अंतर है. कमल हासन का ज़ोर द्रविड़ राजनीति पर है. कमल हासन कहते हैं कि वो द्रविड़ विचारधारा के मुताबिक चलेंगे. वहीँ रजनीकांत खुलकर कह चुके हैं कि वो 'आध्यात्मिक राजनीति' करेंगे.रजनीकांत और भारतीय जनता पार्टी के बीच एक स्वाभाविक गठजोड़ हो सकता है. भारतीय जनता पार्टी की कोशिश ऐसी ही दिखती है. रजनीतिकांत के राजनीति में आने के एलान के पहले तक भारतीय जनता पार्टी ने एआईएडीएमके के साथ जाने की कोशिश की. रजनीकांत के एलान के बाद भारतीय जनता पार्टी एआईएडीएमके से दूरी बढ़ाने की कोशिश में है.

खैर राजनीति में राजनीतिक शून्यता ज्यादा समय तक रहता नहीं है. तमाम समीकरणों को साधते हुए राजनेता सबका साथ और सबका विकास के मंत्र का जाप करते हुए आगे बढ़ ही जाते हैं. अब देखना ये होगा कि इन समीकरणों का पैटर्न क्या तामिलनाडु की राजनीति में राष्ट्रीय राजनीति का मिश्रण कर पायेगी या तामिलनाडु की जनता क्षेत्रीय राजनीति का ही अमृत पान करना पसंद करेगी.

कंटेंट- विकास कुमार (इंटर्न- आईचौक)

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