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समाज

यदि धर्म का पहला पाठ इंसानियत है, तो धर्म फेल है

    • प्रीति अज्ञात
    • Updated: 05 फरवरी, 2018 06:29 PM
  • 05 फरवरी, 2018 06:19 PM
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अपराधी, अपराधी ही है. बहस, उसके जघन्य कृत्य पर ही होना चाहिए. उसके नाम के पीछे क्या लगा है, वो उसे परिभाषित नहीं करता. पर इस सुशिक्षित, सभ्य समाज का सर्वाधिक दुखद पक्ष यही रहा है कि लोग अपराधी की जात पर पहले गौर करते हैं और उसकी बर्बरता की चर्चा बाद में होती है.

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना....

फिर ये मज़हब है ही क्यों? क्योंकि ये जो नहीं सिखाता, वही तो सब सीखते आए हैं!

इतिहास गवाह है, धार्मिकता की आड़ में सबसे ज़्यादा पाप और अत्याचार होते रहे हैं. 'धर्म' न होता तो लड़ने के लिए और कौन सा मुद्दा शेष रहता? देश में जितने भी दंगे-फ़साद, आगजनी, हत्याएं और असंख्य अमानवीय कृत्य होते रहे हैं; आखिर इनका जिम्मेदार कौन है? क्या सचमुच धर्म ही इसका मूल कारण है या उन असामाजिक तत्वों की मानसिकता, जिन्हें घृणा से प्रेम है? ये अपने अपराधों का ठीकरा धर्म पर फोड़ आसानी से हाथ झाड़ आगे बढ़ जाते हैं, पर फिर भी आम जनता बेवकूफ बनती आ रही है. क्या जनता सचमुच ही इतनी भोली है या चंद सिक्कों के लिए अपना ईमान बेचना सीख गई है? यह भी संभव है कि राजनीतिक भट्ठियों की धीमी आंच में, इनकी अपनी रोटियों की व्यवस्था की उम्मीद इन्हें विवश कर देती हो. इन लोगों को होश तभी आता है, जब स्वयं पर बीतती है और इनके ही धर्म की आड़ में इन पर प्रहार होता है.

इंसान पहले हैं, धर्म तो बोनस में मिलता है

धर्म का इंसान से कोई भी सीधा संबंध नहीं, सिवाय इसके कि ये जन्म के साथ हमें बोनस में मिलता है. बात इसके सही इस्तेमाल की है. इंसानियत पैदाइशी नहीं होती, ये आपको सीखनी होती है. आप इंसान बने रहें, धर्म कहीं नहीं जाने वाला. एक इंसान, अच्छा या बुरा हो सकता है, धर्म का उसकी सोच से क्या और कैसा संबंध? क्या किसी धर्म ने बुरा व्यक्ति बनने के रास्ते दिखाए हैं? संवेदनहीनता, हिंसा, अमानवीय और पाश्विक व्यवहार का समर्थन कौन सा धर्म करता है? और यदि धर्म के कारण ऐसा हो रहा है, तो फिर ये धर्म ही हर परेशानी की जड़ है. इसे हटाने की हिम्मत जुटानी होगी!

विचारणीय है कि यदि सारे धर्मों के लोगों के अपराधों का हिसाब-क़िताब लगाया जाए, तो...

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना....

फिर ये मज़हब है ही क्यों? क्योंकि ये जो नहीं सिखाता, वही तो सब सीखते आए हैं!

इतिहास गवाह है, धार्मिकता की आड़ में सबसे ज़्यादा पाप और अत्याचार होते रहे हैं. 'धर्म' न होता तो लड़ने के लिए और कौन सा मुद्दा शेष रहता? देश में जितने भी दंगे-फ़साद, आगजनी, हत्याएं और असंख्य अमानवीय कृत्य होते रहे हैं; आखिर इनका जिम्मेदार कौन है? क्या सचमुच धर्म ही इसका मूल कारण है या उन असामाजिक तत्वों की मानसिकता, जिन्हें घृणा से प्रेम है? ये अपने अपराधों का ठीकरा धर्म पर फोड़ आसानी से हाथ झाड़ आगे बढ़ जाते हैं, पर फिर भी आम जनता बेवकूफ बनती आ रही है. क्या जनता सचमुच ही इतनी भोली है या चंद सिक्कों के लिए अपना ईमान बेचना सीख गई है? यह भी संभव है कि राजनीतिक भट्ठियों की धीमी आंच में, इनकी अपनी रोटियों की व्यवस्था की उम्मीद इन्हें विवश कर देती हो. इन लोगों को होश तभी आता है, जब स्वयं पर बीतती है और इनके ही धर्म की आड़ में इन पर प्रहार होता है.

इंसान पहले हैं, धर्म तो बोनस में मिलता है

धर्म का इंसान से कोई भी सीधा संबंध नहीं, सिवाय इसके कि ये जन्म के साथ हमें बोनस में मिलता है. बात इसके सही इस्तेमाल की है. इंसानियत पैदाइशी नहीं होती, ये आपको सीखनी होती है. आप इंसान बने रहें, धर्म कहीं नहीं जाने वाला. एक इंसान, अच्छा या बुरा हो सकता है, धर्म का उसकी सोच से क्या और कैसा संबंध? क्या किसी धर्म ने बुरा व्यक्ति बनने के रास्ते दिखाए हैं? संवेदनहीनता, हिंसा, अमानवीय और पाश्विक व्यवहार का समर्थन कौन सा धर्म करता है? और यदि धर्म के कारण ऐसा हो रहा है, तो फिर ये धर्म ही हर परेशानी की जड़ है. इसे हटाने की हिम्मत जुटानी होगी!

विचारणीय है कि यदि सारे धर्मों के लोगों के अपराधों का हिसाब-क़िताब लगाया जाए, तो हरेक के हिस्से में हर तरह का अपराध आएगा ही. क्या इसका तात्पर्य यह समझा जाए कि सारे ही धर्म, अत्याचार के समर्थक हैं? जो धर्म जितना बड़ा, उसका हिस्सा उतना ही ज़्यादा? ये भी संभव है कि जो धर्म छोटा, उस पर अत्याचार ज़्यादा? दुनिया की रीत है, पलटवार करने वाले से सब भयभीत रहते हैं और दुर्बल को सताने में सबको अपार आनंद की अनुभूति होती है. लेकिन जब दुर्बल की सहनशक्ति टूट जाती है, तो उसके सामने कोई नहीं टिक पाता. ये इंसानी स्वभाव है. पुनश्च, इसका आपके धर्म से कोई ताल्लुक़ नहीं!

अपराधी, अपराधी ही है. बहस, उसके जघन्य कृत्य पर ही होना चाहिए. उसके नाम के पीछे क्या लगा है, वो उसे परिभाषित नहीं करता. पर इस सुशिक्षित, सभ्य समाज का सर्वाधिक दुखद पक्ष यही रहा है कि लोग अपराधी की जात पर पहले गौर करते हैं और उसकी बर्बरता की चर्चा बाद में होती है. दुर्भाग्य की बात है कि अपराध के विरोध और समर्थन में दो गुटों का निर्माण उसी वक़्त हो जाता है.

अगर समाज में परिवर्तन चाहते हैं, तो उपनाम के मोह से बचें! अधिकांश लोग धर्म के नाम पर मरने-मारने को उतारू हो जाते हैं. आपका सम्मान, आपकी शान, आपके प्रति लोगों का नजरिया, उनकी सोच... ये सब आपके व्यवहार पर निर्भर करता है. दूसरे के बुरे व्यवहार को अपनी क़ौम पर हमला क्यों समझना? वो बुरा है, इसलिए उसने ऐसा किया. वो आपको मारना चाहता है, इंसानियत का विरोधी है, आप उसका विरोध अवश्य करें, पर अपने धर्म की महानता का बखान करे बिना. क्योंकि जब गिनाने की बात आएगी, तो हो सकता है आप भी बगलें झांकते नज़र आएं. लेकिन भय है कि इस आरोप-प्रत्यारोप की अंधी दौड़ में मानवता कहीं कुचलकर समाप्त ही न हो जाए.

पता नहीं कब सीखेंगे हम इंसानियत

सबका हृदय जानता है, धर्म हमें सही राह दिखाते हैं और सभी धर्म अपने आप में सर्वश्रेष्ठ हैं. लेकिन इसके बावजूद भी आतंक का इतना गहरा साया क्यूं है? बाहरी ताक़तों की बात तो समझ आती है, पर जो घर में होता आ रहा है उसका क्या? ये सब, कौन करवा रहा है? कहीं राजनीतिक पार्टियां, वोट बैंक की लालसा में आम जनता को ही बलि का बकरा तो नहीं बना रहीं?

दुःखद है कि गरीबी-भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी और आम भारतीय के जीवन से जुड़ी अनगिनत समस्याओं पर चर्चा आउटडेटेड है और जिसे मस्तक पर धारण कर हमें गर्व होना चाहिए, उस धर्म का अस्तित्व अब हृदय में संशय के भाव उत्पन्न करने लगा है. इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण आप लोगों ने भी अवश्य देखे होंगे कि कई घरों में ऐसी घटनाओं की निंदा करते समय इस तरह के वाक्य सुनने को मिलते हैं.... "इनकी तो ज़ात ही ऐसी है", "ये लोग बहुत कट्टर होते हैं, किसी को नहीं छोड़ते", "इनके साथ तो ऐसा ही होना चाहिए" इत्यादि. अगले दिन, बिना किसी प्रामाणिक तथ्य के उन घरों के बच्चे यही बात अपने साथियों से कह रहे होते हैं.

ये आगामी पीढ़ी के सोच के पतन की प्रारंभिक अवस्था है. हमें इन्हें यहीं से रोकना होगा. अन्यथा ये समस्या जस-की-तस रहेगी. शर्मनाक है कि सत्ता के मद में चूर कुछ धर्मांध नेता भी गर्दन काटकर लाने का कह, लाखों के पुरस्कार की घोषणा कर, अपनी निकृष्ट मानसिकता दर्शाने में एक क्षण भी नहीं गंवाते. यदि आप ईश्वर में सचमुच विश्वास रखते हैं तो अपने-अपने घरों में, अपने बच्चों को सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाएं. यदि नास्तिक हैं तो यह आपकी स्वतंत्रता है पर किसी और को उसकी सोच बदलने के लिए बाध्य न करें. हर इंसान को धर्म, जाति से ऊपर उठकर अपनी एक पहचान बनाने का अवसर दें. यही एकमात्र तरीका है आने वाली नस्लों को हैवानियत से बचाने का. एक सवाल, स्वयं से भी करें. आप कौन हैं? आप किस रूप में याद किये जाना पसंद करेंगे या अपने धर्म से ही अपनी पहचान बनाकर संतुष्ट हैं आप? वो पहचान जो पहले से ही तय की जा चुकी है, तो फिर आपके होने-न-होने का मतलब ही क्या? क्या धर्म, इंसानियत से भी बड़ा होता है?

हमारा अपना देश, आखिर कब तक अपने ही लोगों के स्वार्थ की अग्नि से झुलसता रहेगा? क्या हर धर्म का पहला पाठ इंसानियत नहीं होता?

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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