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विकास की राह में पत्थर हैं ये मूंछ के बाल

    • बिलाल एम जाफ़री
    • Updated: 30 सितम्बर, 2017 12:09 PM
  • 30 सितम्बर, 2017 12:09 PM
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इंडिया से न्यू इंडिया बनते भारत में, जब ऐसी घटनाएं जिनका कोई मूल नहीं है. वो जब विकास के मार्ग में बाधक बनती हैं तो किसी भी भारतवासी के लिए तकलीफ अनुभव करना लाजमी है. तो इसी क्रम में जो गुजरात में हुआ वो शर्मनाक है.

स्वतंत्रता दिवस बीते अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं. स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति ने और उसके बाद देश के प्रधानमंत्री ने, इस देश को बताया था कि सरकार प्रयासरत है कि वो इंडिया को न्यू इंडिया बनाए. ताकि हम विकास के द्वारा सफलता के नए आयाम देखें और उन्हें प्राप्त कर सकें. एक आम भारतीय वोटर होने के नाते इस खबर से हमें काफी राहत मिली थी और एहसास हुआ था कि वो दिन दूर नहीं जब विश्व मानचित्र पर भारत का नाम बड़े ही सम्मानित ढंग से लिया जाएगा.

जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं और तरह-तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं. उनको देखकर महसूस हो रहा है कि, हम भारतीय खुद इंडिया का परिवर्तित रूप नहीं देखना चाहते. साथ ही, हम स्वयं ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के सपनों पर मट्ठा डालने का काम कर रहे हैं और अपने देश को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं. हमारे द्वारा कही इस बात को एक खबर से समझिये. खबर है कि गुजरात में कुछ लोग दो दलित युवकों को देखकर सिर्फ इसलिए आहत हो गए और उनकी जम कर पिटाई कर दी क्योंकि उन युवकों के मूछें थीं.

तो क्या ऐसी चीजों को करते हुए हम इंडिया को न्यू इंडिया बनाएंगे

मार खाने वाले दलित थे, मारने वाले ऊंची जात के थे. जाहिर है, ऊंची जाति के लोगों को पिछड़ी जाति की मूछें और मूंछों पर पड़ा ताव क्यों सुखद लगता. जी हां बिल्कुल सही सुन रहे हैं. मामला गुजरात की राजधानी गांधीनगर से 15 किलोमीटर दूर लिम्बोदरा गांव का है. गांव के दो युवक गरबा खेल के गांव वापस लौट रहे थे कि तभी रास्ते में दरबार समुदाय के लोगों ने उनका रास्ता रोका और उनके साथ मारपीट की. बताया जा रहा है कि ऊंची जाति के लोगों ने सिर्फ इस बात के चलते युवकों की पिटाई की क्योंकि दलित होकर उन्होंने मूंछें रखी थीं. फिल्हाल मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने दोषी युवकों के ऊपर केस दर्ज कर...

स्वतंत्रता दिवस बीते अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं. स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति ने और उसके बाद देश के प्रधानमंत्री ने, इस देश को बताया था कि सरकार प्रयासरत है कि वो इंडिया को न्यू इंडिया बनाए. ताकि हम विकास के द्वारा सफलता के नए आयाम देखें और उन्हें प्राप्त कर सकें. एक आम भारतीय वोटर होने के नाते इस खबर से हमें काफी राहत मिली थी और एहसास हुआ था कि वो दिन दूर नहीं जब विश्व मानचित्र पर भारत का नाम बड़े ही सम्मानित ढंग से लिया जाएगा.

जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं और तरह-तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं. उनको देखकर महसूस हो रहा है कि, हम भारतीय खुद इंडिया का परिवर्तित रूप नहीं देखना चाहते. साथ ही, हम स्वयं ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के सपनों पर मट्ठा डालने का काम कर रहे हैं और अपने देश को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं. हमारे द्वारा कही इस बात को एक खबर से समझिये. खबर है कि गुजरात में कुछ लोग दो दलित युवकों को देखकर सिर्फ इसलिए आहत हो गए और उनकी जम कर पिटाई कर दी क्योंकि उन युवकों के मूछें थीं.

तो क्या ऐसी चीजों को करते हुए हम इंडिया को न्यू इंडिया बनाएंगे

मार खाने वाले दलित थे, मारने वाले ऊंची जात के थे. जाहिर है, ऊंची जाति के लोगों को पिछड़ी जाति की मूछें और मूंछों पर पड़ा ताव क्यों सुखद लगता. जी हां बिल्कुल सही सुन रहे हैं. मामला गुजरात की राजधानी गांधीनगर से 15 किलोमीटर दूर लिम्बोदरा गांव का है. गांव के दो युवक गरबा खेल के गांव वापस लौट रहे थे कि तभी रास्ते में दरबार समुदाय के लोगों ने उनका रास्ता रोका और उनके साथ मारपीट की. बताया जा रहा है कि ऊंची जाति के लोगों ने सिर्फ इस बात के चलते युवकों की पिटाई की क्योंकि दलित होकर उन्होंने मूंछें रखी थीं. फिल्हाल मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने दोषी युवकों के ऊपर केस दर्ज कर लिया है.

किसी भी आम भारतीय के लिए ये एक छोटा सा मामला हो सकता है और शायद इसे पढ़कर हँसते हुए वो इसे इग्नोर कर दे. अब अगर आप इस मुद्दे को ध्यान से देखें तो मिलता है कि आजादी के 70 सालों बाद आज भी हालात कुछ वैसे ही हैं जैसे वो आजादी के वक़्त थे. कह सकते हैं कि हम धर्म, जाति, कुल, खानपान, पहनावे से आगे बढ़ ही नहीं पाए हैं. एक ऐसे दौर में जब हम विश्व गुरु बन सम्पूर्ण विश्व में अपनी साख जमाने की बात कर रहे हैं. उस दौर में ऐसी खबरों का आना इस बात की ओर भी इशारा करता है कि, यदि समय रहते लोगों ने अपनी सोच नहीं बदली तो निश्चित तौर पर भविष्य में परिणाम बिल्कुल भी अच्छे नहीं होंगे. ऐसे कृत्य हमें दशकों पीछे ढकेलते चले जाएंगे.

अंत में बस इतना कि, मैं एक ऐसा भारतीय हूं,जिसका सपना इंडिया को न्यू इंडिया बनते हुए देखना और उस खुशी हो महसूस करना है. मैं कभी भी नहीं चाहूंगा कि ऐसी बातें, जिनका कोई मूल नहीं है वो मेरे और देश के विकास में बाधा उत्पन्न करें और मेरे और देश हम दोनों की तरक्की को रोकें.

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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