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मां सीता से बड़ा फ़ेमिनिस्ट शायद ही कोई हुआ हो!

    • अनु रॉय
    • Updated: 07 अगस्त, 2020 11:05 PM
  • 07 अगस्त, 2020 11:05 PM
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सोशल मीडिया (Social Media) के इस दौर में लोगों को बेवजह विवाद खड़ा करने की आदत है. अयोध्या (Ayodhya) में भव्य राम मंदिर (Ram Mandir) के लिए हुए भूमि पूजन (Bhumi Pujan) के बाद सोशल मीडिया पर एक वर्ग वो सामने आया है जो देवी सीता (Sita) को लेकर भगवान राम (Lord Ram) की आलोचना कर रहा है.

पहली बात, सीता जी (Sita) ख़ुद ही बड़ी फ़ेमिनिस्ट (Feminist) थी. समझीं न. उनको अबला बताना बंद कीजिए. सीता को राम (Lord Ram) ने त्यागा नहीं था. वो सीता का अपना फ़ैसला था. सीता के सेल्फ़-एस्टीम का सवाल था इसलिए अग्नि-परीक्षा देने के बाद, उन्होंने डिसाइड किया कि अब मुझे नहीं रहना है यहां अयोध्या (Ayodhya) में. राम ने नहीं धक्के दे कर उन्हें घर से निकाला था समझी न. दूसरी बात, ज़रा सोचो कि एक पति जो अपनी पत्नी के लिए दर-दर भटके, उसे ढूंढने के लिए रावण जैसे शक्तिशाली राजा से लड़ाई करने चला जाए, वो क्या अपनी पत्नी को प्यार नहीं करता होगा? फिर उसी राम के पिता की तीन रानियां थी न, राम भी चाहते तो सीता के अपहरण के बाद नहीं जाते ढूंढने, कर लेते दूसरा ब्याह. लेकिन उन्होंने लंका को जलाकर, रावण को मार कर सीता के लिए अपना प्रेम साबित किया.

सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो देवी सीता को लेकर भगवान राम की आलोचना कर रहा है

अब जब वो अयोध्या लौटे तो सिर्फ़ और सिर्फ़ वो सीता के पति नहीं बल्कि एक राजा थे. राजा का क्या धर्म होता है उन्हें दुनिया को ये बताना था. पति के रूप में वो 14 साल ख़ुद को प्रूव कर चुके थे. अब सिया पति राम को राजा राम होना था. एक ऐसा राजा जिसकी प्रजा को हक़ था सवाल करने का. राम चाहते तो उस धोबी को मरवा भी सकते थे लेकिन नहीं उन्होंने अपने राज्य के आख़िरी लाइन पर खड़े उस तुच्छ धोबी का भी मान रखा.

उस मूर्ख की वजह से वो उससे जुदा हो गए जिससे सबसे ज़्यादा मुहब्बत थी. सीता के जाने के बाद राम कभी ख़ुश नहीं हुए. राम तिल-तिल कर मर रहे थे लेकिन ये बात मूर्खों के समझ से परे की है. बिना रामायण पढ़े, बिना राम को जाने राम को गाली देना, कठघरे में उतारना आसान है. मैं भी यही करती रही इतने सालों तक फिर पिछले साल रामायण...

पहली बात, सीता जी (Sita) ख़ुद ही बड़ी फ़ेमिनिस्ट (Feminist) थी. समझीं न. उनको अबला बताना बंद कीजिए. सीता को राम (Lord Ram) ने त्यागा नहीं था. वो सीता का अपना फ़ैसला था. सीता के सेल्फ़-एस्टीम का सवाल था इसलिए अग्नि-परीक्षा देने के बाद, उन्होंने डिसाइड किया कि अब मुझे नहीं रहना है यहां अयोध्या (Ayodhya) में. राम ने नहीं धक्के दे कर उन्हें घर से निकाला था समझी न. दूसरी बात, ज़रा सोचो कि एक पति जो अपनी पत्नी के लिए दर-दर भटके, उसे ढूंढने के लिए रावण जैसे शक्तिशाली राजा से लड़ाई करने चला जाए, वो क्या अपनी पत्नी को प्यार नहीं करता होगा? फिर उसी राम के पिता की तीन रानियां थी न, राम भी चाहते तो सीता के अपहरण के बाद नहीं जाते ढूंढने, कर लेते दूसरा ब्याह. लेकिन उन्होंने लंका को जलाकर, रावण को मार कर सीता के लिए अपना प्रेम साबित किया.

सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो देवी सीता को लेकर भगवान राम की आलोचना कर रहा है

अब जब वो अयोध्या लौटे तो सिर्फ़ और सिर्फ़ वो सीता के पति नहीं बल्कि एक राजा थे. राजा का क्या धर्म होता है उन्हें दुनिया को ये बताना था. पति के रूप में वो 14 साल ख़ुद को प्रूव कर चुके थे. अब सिया पति राम को राजा राम होना था. एक ऐसा राजा जिसकी प्रजा को हक़ था सवाल करने का. राम चाहते तो उस धोबी को मरवा भी सकते थे लेकिन नहीं उन्होंने अपने राज्य के आख़िरी लाइन पर खड़े उस तुच्छ धोबी का भी मान रखा.

उस मूर्ख की वजह से वो उससे जुदा हो गए जिससे सबसे ज़्यादा मुहब्बत थी. सीता के जाने के बाद राम कभी ख़ुश नहीं हुए. राम तिल-तिल कर मर रहे थे लेकिन ये बात मूर्खों के समझ से परे की है. बिना रामायण पढ़े, बिना राम को जाने राम को गाली देना, कठघरे में उतारना आसान है. मैं भी यही करती रही इतने सालों तक फिर पिछले साल रामायण पढ़ना शुरू किया और जाना राम होना आसान नहीं है.

तो, ओ फ़ेमिनिस्ट दीदी, अपना हिस्ट्री का ज्ञान दुरुस्त करो फिर आना ज्ञान उड़ेलने. स्टेट्स में राम को गाली देना और फिर राम का नाम देख कुछ मूर्ख भड़क कर गाली देने आएंगे और फिर तुम्हें पब्लिसिटी मिलेगी ये गेम पुराना हो गया है. कोई नया पैंतरा खोजो.

और राम-भक्त आप अगर राम को मानते हैं तो प्लीज़ किसी भी लड़की/स्त्री को गाली न दीजिए. राम ये नहीं सीखाते. राम के राज्य में धोबी तक को आज़ादी थी अपनी बात रखने की. प्लीज़ जो अंट-शंट बोलते हैं बोलने दीजिए. आप राम के गुण-धर्म का प्रचार कीजिए न कि गाली और बलात्कार की धमकी दीजिए. उनका गेम ही आपको उकसाना है. समझिए ज़रा। प्रेम से बोलिए सिया पति राम की जय.

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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