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आखिरकार... देवी-देवताओं का असली रंग दिख ही गया..

    • रिम्मी कुमारी
    • Updated: 09 जनवरी, 2018 05:56 PM
  • 09 जनवरी, 2018 05:56 PM
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सुंदरता का मतलब गोरा ही क्यों? भगवान गोरे और राक्षस काले ही क्यों होते हैं? क्या हो अगर हमारे देवी देवता काले रंग के होते? श्रद्धा, निष्ठा और प्रेम को त्वचा के रंग से बाहर लेकर आए इन दो लोगों ने सोच ही बदल दी.

रंग का हमारे यहां बहुत महत्व है. हमारे तिरंगे के रंगों में भी एक मैसेज होता है. रंग का महत्व इतना है कि गर्भवती औरतों को गोरा बच्चा पैदा करने की खातिर नारियल पानी पीने और अंडा खाने जैसे तरह तरह के नुस्खे बताए जाते हैं. टीवी पर आने वाले एड में भी गोरापन के क्रीमों की भरमार दिखती है. यहां तक की शादियों में काला रंग अपशकुन माना जाता है. गोरेपन के प्रति हमारी दिवानगी का आलम ये है कि एक स्टडी के मुताबिक 2035 तक देश का कॉस्मेटिक बाजार 35 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा.

मां दुर्गा का ये रंग कैसा है?

काला रंग हमारे लिए एक कलंक की तरह है. काला हमें किसी रुप में स्वीकार्य नहीं. फिर चाहे वो त्वचा का रंग हो या फिर धर्म. हिंदु धर्म में भगवान को काले रंग में नहीं देखा जाता. भगवान काले हो सकते हैं ये शायद हम सोच ही नहीं सकते. जबकि असलियत में चाहे भगवान राम हों, कृष्ण या फिर शिव सभी सांवले रंग के थे. लेकिन अपने इस रंग को सिर्फ कृष्ण ने ही स्वीकार किया. लेकिन अपने इस रंग के लिए वो भी हीन भावना में रहते थे. तभी तो बचपन में वो अपनी यशोदा से पूछा करते थे कि मां आखिर राधा गोरी क्यों है और मैं काला क्यों हूं?

कृष्ण ने ही अपने असली रंग को स्वीकार किया

शिव का असली रंग तो काला ही है

गोरेपन से हमारे लगाव का आलम ये है कि हाथी का रंग हमने सांवला या फिर काला देखा है....

रंग का हमारे यहां बहुत महत्व है. हमारे तिरंगे के रंगों में भी एक मैसेज होता है. रंग का महत्व इतना है कि गर्भवती औरतों को गोरा बच्चा पैदा करने की खातिर नारियल पानी पीने और अंडा खाने जैसे तरह तरह के नुस्खे बताए जाते हैं. टीवी पर आने वाले एड में भी गोरापन के क्रीमों की भरमार दिखती है. यहां तक की शादियों में काला रंग अपशकुन माना जाता है. गोरेपन के प्रति हमारी दिवानगी का आलम ये है कि एक स्टडी के मुताबिक 2035 तक देश का कॉस्मेटिक बाजार 35 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा.

मां दुर्गा का ये रंग कैसा है?

काला रंग हमारे लिए एक कलंक की तरह है. काला हमें किसी रुप में स्वीकार्य नहीं. फिर चाहे वो त्वचा का रंग हो या फिर धर्म. हिंदु धर्म में भगवान को काले रंग में नहीं देखा जाता. भगवान काले हो सकते हैं ये शायद हम सोच ही नहीं सकते. जबकि असलियत में चाहे भगवान राम हों, कृष्ण या फिर शिव सभी सांवले रंग के थे. लेकिन अपने इस रंग को सिर्फ कृष्ण ने ही स्वीकार किया. लेकिन अपने इस रंग के लिए वो भी हीन भावना में रहते थे. तभी तो बचपन में वो अपनी यशोदा से पूछा करते थे कि मां आखिर राधा गोरी क्यों है और मैं काला क्यों हूं?

कृष्ण ने ही अपने असली रंग को स्वीकार किया

शिव का असली रंग तो काला ही है

गोरेपन से हमारे लगाव का आलम ये है कि हाथी का रंग हमने सांवला या फिर काला देखा है. लेकिन हमारे भगवान गणपति, जिनका सिर खुद हाथी का है उनको भी हम गोरे रंग का ही दिखाते हैं. देवताओं को तो फिर भी हमने काले रंग में थोड़ा बहुत स्वीकार कर लिया लेकिन हमारी देवियां सारी गोरी ही हैं. सौम्य, शांत और गोरी. सिर्फ मां काली ही काले रंग में दिखाई देती हैं. वो भी इसलिए क्योंकि उनको रौद्र रूप में दिखाया जाता है. प्यार, दुलार, ममता और दया का रंग गोरा ही होगा. काला नहीं. हमारे लिए ज्ञान गोरा ही होगा. काला रंग अज्ञानता का ही प्रतीक माना जाता है. हमारे भगवान काले नहीं होते, सिर्फ राक्षस ही काले होते हैं.

धन की देवी का ये रंग सुंदर है न?

विद्या की देवी सरस्वती का ये रुप सोचा था?

साफ शब्दों में कहें तो अच्छाई का मतलब सफेद और बुराई का मतलब काला. लेकिन आजकल सोशल मीडिया पर हिंदु देवी देवताओं की कुछ तस्वीरें बड़ी वायरल हो रही हैं. इन तस्वीरों में खास ये है कि चित्रकारों ने सारे भगवान को काले रंग का दिखाया है. चेन्नई के दो फिल्मकारों नरेश निल और भारद्वाज सुंदर ने हमारे गोरे चिट्टे, सजीले भगवानों के चेहरे को काला दिखाया. अपने फेसबुक पेज पर ये फोटो शेयर करते हुए निल ने लिखा है-

भगवानों को काले रंग का दिखाकर हम उनकी दिव्यता, सौम्यता, सरलता को कल्पना से परे रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं. हम बताना चाहते हैं कि काला रंग सिर्फ सुंदर ही नहीं है बल्कि अलौकिक और दिव्य है.

लव कुश पर ये रंग फब रहा है ना?

भगवान मुरुगन

काले रंग को इस नए कलेवर में पेश करके इन दोनों ने हमारी सोच को एक नया रंग देने की कोशिश की है जिसकी तारीफ की जानी चाहिए. क्योंकि काले रंग के प्रति हमारी संकुचित सोच ने कई बच्चों को हीन भावना से भर दिया है. उनके अंदर के आत्मविश्वास को तोड़ दिया है.

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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