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पैठू प्रथा में कुंवारी मां के लिए तानों की गुंजाईश नहीं, स्नेह-आशीर्वाद ही मिलता है!

    • बिलाल एम जाफ़री
    • Updated: 05 फरवरी, 2022 04:12 PM
  • 05 फरवरी, 2022 04:12 PM
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भारत अलग अलग संस्कृतियों और परंपराओं का देश है. तमाम ऐसी प्रथाएं हैं जो सुनने देखने में अटपटी लगें लेकिन लोगों के बीच उनका चलन आम है. ऐसी ही एक प्रथा है पैठू प्रथा जिसके चलते छत्तीसगढ़ में न केवल एक महिला शादी से पहले गर्भवती हुई. बल्कि उसने बेटे को जन्म भी दिया. दिलचस्प ये कि कोई भी महिला के चरित्र पर अंगुली नहीं उठा रहा और जश्न का माहौल है.

एक ऐसे घर की कल्पना कीजिए जहां किसी लड़की की शादी हो. लोग तैयारियों और शादी से जुड़ी रस्मों में उलझे हों. तभी अचानक लड़की यानी दुल्हन को प्रसव पीड़ा शुरु हो जाए. उसे अस्पताल ले जाया जाए. अस्पताल से ये खबर आए कि दुल्हन को पुत्ररतन की प्राप्ति हुई है. जच्चा और बच्चा दोनों ही सकुशल हैं. खबर के बाद लोग लड़की के चरित्र पर अंगुली न उठाते हुए सिर्फ और सिर्फ जश्न मनाएं... जैसा हमारा समाज है और जैसी अपब्रिंगिंग हमारी है शायद ही कोई इन बातों पर यकीन करे लेकिन ऐसा ही कुछ हुआ है और अपने ही देश भारत के छत्तीसगढ़ में हुआ है. भले ही सुनने में अटपटा लगे लेकीन बस्तर में एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है. एक परिवार में शादी थी हल्दी की रस्म के दौरान दुल्हन को प्रसव पीड़ा हुई और शादी के कार्यक्रम को बीच में ही रोक देना पड़ा. परिजन दुल्हन को तुरंत ही अस्पताल लेकर पहुंच, जहां पर उसने एक बेटे को जन्म दिया.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में पैठू के बाद बच्चे को जन्म देने वाली आदिवासी महिला

तो आखिर बिन ब्याही मां से किसी को कोई परेशानी क्यों नहीं है?

मामले के मद्देनजर किसी और ने नहीं बल्कि खुद दुल्हन की मां ने अपना पक्ष रखा है. मूल रूप से ओडिशा की रहने वाली दुल्हन की मां सरिता मंडावी ने बताया कि उनकी बेटी गर्भवती हुई और उसके बेटा हुआ. इसकी वजह पैठू प्रथा है. दुल्हन की मां के अनुसार उनकी बेटी शिवबती मंडावी अगस्त में कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर अपनी पसंद के लड़के चंदन नेताम जो बांसकोट का रहने वाला है. उसके यहां घर पैठू के लिए गई हुई थी. जहां पर वो 6 माह रही और गर्भवती हुई.

क्या है पैठू प्रथा?

जैसा कि ज्ञात है छत्तीसगढ़ की एक बड़ी आबादी आदिवासी है. छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज में अपनी तरह की एक बेहद अनूठी प्रथा है जिसे पैठू...

एक ऐसे घर की कल्पना कीजिए जहां किसी लड़की की शादी हो. लोग तैयारियों और शादी से जुड़ी रस्मों में उलझे हों. तभी अचानक लड़की यानी दुल्हन को प्रसव पीड़ा शुरु हो जाए. उसे अस्पताल ले जाया जाए. अस्पताल से ये खबर आए कि दुल्हन को पुत्ररतन की प्राप्ति हुई है. जच्चा और बच्चा दोनों ही सकुशल हैं. खबर के बाद लोग लड़की के चरित्र पर अंगुली न उठाते हुए सिर्फ और सिर्फ जश्न मनाएं... जैसा हमारा समाज है और जैसी अपब्रिंगिंग हमारी है शायद ही कोई इन बातों पर यकीन करे लेकिन ऐसा ही कुछ हुआ है और अपने ही देश भारत के छत्तीसगढ़ में हुआ है. भले ही सुनने में अटपटा लगे लेकीन बस्तर में एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है. एक परिवार में शादी थी हल्दी की रस्म के दौरान दुल्हन को प्रसव पीड़ा हुई और शादी के कार्यक्रम को बीच में ही रोक देना पड़ा. परिजन दुल्हन को तुरंत ही अस्पताल लेकर पहुंच, जहां पर उसने एक बेटे को जन्म दिया.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में पैठू के बाद बच्चे को जन्म देने वाली आदिवासी महिला

तो आखिर बिन ब्याही मां से किसी को कोई परेशानी क्यों नहीं है?

मामले के मद्देनजर किसी और ने नहीं बल्कि खुद दुल्हन की मां ने अपना पक्ष रखा है. मूल रूप से ओडिशा की रहने वाली दुल्हन की मां सरिता मंडावी ने बताया कि उनकी बेटी गर्भवती हुई और उसके बेटा हुआ. इसकी वजह पैठू प्रथा है. दुल्हन की मां के अनुसार उनकी बेटी शिवबती मंडावी अगस्त में कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर अपनी पसंद के लड़के चंदन नेताम जो बांसकोट का रहने वाला है. उसके यहां घर पैठू के लिए गई हुई थी. जहां पर वो 6 माह रही और गर्भवती हुई.

क्या है पैठू प्रथा?

जैसा कि ज्ञात है छत्तीसगढ़ की एक बड़ी आबादी आदिवासी है. छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज में अपनी तरह की एक बेहद अनूठी प्रथा है जिसे पैठू के नाम से जाना जाता है. बात अगर बरसों पुरानी इस प्रथा की हो तो इसमें न तो मुहूर्त देखा जाता है और न ही कुंडली का मिलान होता है. इसमें लड़के-लड़कियां एक दूसरे को पसंद कर शादी के लिए स्वतंत्र होते हैं.

इस प्रथा के अनुसार शादी योग्य लड़के-लड़की एक दूसरे को पसंद करते हैं तो लड़की, लड़के के घर में चली जाती है जिसे पैठू प्रथा के नाम से जाना जाता है. मामले में दिलचस्प ये है कि ये प्रथा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में पहले जैसी ही अपनाई जा रही है.

चूंकि इस मामले में रोचक तथ्य ये भी है कि लड़का लड़की न केवल एक दूसरे को पसंद कर चुके थे. वो पहले ही 6 महीने साथ रह चुके थे तो परिजनों ने उनकी शादी कराने का फ़ैसला कर लिया था. बाद में दोनों पक्ष बैठे और बात पक्की हुई. फिर लड़के और लड़की के घरवालों ने बाकायदा शादी के कार्ड छपवाए और इस शादी के लिए अपने रिश्तेदारों के अलावा स्थानीय गांव वालों को भी निमंत्रित किया. 

अभी बीते दिनों ही लड़की की हल्दी की रस्म चल रही थी. घर पर आशीर्वाद समारोह और भोज का आयोजन था. लेकिन हल्दी की रस्म के दौरान ही दुल्हन की तबियत बिगड़ी और उसे प्रसव पीड़ा होने लगी. परिजन उसे तुरंत ही पास के अस्पताल ले गए. जहां उसने एक बेटे को जन्म दिया. घर में लड़का आया इससे न केवल परिजन बल्कि गांव वाले भी खुश हैं और लड़के की लंबी उम्र की कामना कर रहे हैं.

वो तो छत्तीसगढ़ का आदिवासी समाज है. वहां ये प्रथा बरसों बरस से है इसलिए न केवल बात आई गयी हुई बल्कि आम लोगों में भी ख़ुशी की लहर है. एक बार कल्पना करके देखिये यदि ऐसा हमारे आस पास होता तो क्या लोगों का तब भी ऐसा या ये कहें कि मिलता जुलता अंदाज होता? इस सवाल का सबसे बेहतर या ये कहें कि अनुकूल जवाब क्या होगा? इससे हम सभी वाकिफ हैं.

कोई बड़ी बात नहीं कि जिस घर में ऐसा हुआ हो उसके बारे में तरह तरह की बातें हों. हो ये भी सकता है कि ऐसे लोगों का हुक्का पानी बंद हो जाए और वो सोशल बॉयकॉट की भेंट चढ़ जाएं. लेकिन चूंकि ये सब आदिवासी समाज में हो रहा है तो ये कहने में भी कोई गुरेज नहीं है कि वहां आज भी लोगों को इसकी परवाह नहीं है कि कोई क्या कहेगा बल्कि मुद्दा लड़की और लड़के की ख़ुशी है जो उन्हें पैठू प्रथा के जरिये दी जा रही है. जिसमें किसी तरह की न तो कोई जबरदस्ती है और न ही लालच.

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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