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अफ़गानी स्त्री की 5 तस्वीरें, ये दुनिया का कलेजा फट क्यों नहीं जाता?

    • प्रीति अज्ञात
    • Updated: 24 अगस्त, 2021 07:50 PM
  • 24 अगस्त, 2021 07:28 PM
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तालिबान ने आते ही अफगान महिलाओं के साथ जो ज्यादती शुरू की है, उस पर दुनिया क्या सिर्फ अफसोस मनाएगी? उन्हें किस बात के लिए यातना दी जा ही है? न तो वो अमेरिका को अफगानिस्तान बुलाकर लाई थीं. और न ही उन्होंने तालिबान को आने से रोका.

जिस दिन हम अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने में मशगूल थे, ठीक उसी दिन तालिबान, अफ़गानी महिलाओं की गुलामी का नया अध्याय रच रहा था. अपने क्रूर इरादों का महल खड़ा करने का स्वप्न लिए आतंकियों की पलटन जब काबुल पहुंची तो वहां कोहराम मच गया. वहां से आती तस्वीरों ने सबकी आत्मा को झकझोरकर रख दिया है. अब खबर ये है कि इन दिनों वहां बुर्के की क़ीमत और बिक्री दोनों बढ़ गई है. लेकिन मानवता किस रसातल में चली गई है उसे नापने का कोई पैमाना नहीं है. तालिबान के काले इतिहास पर मैं बात नहीं करूंगी. मैं अफगानिस्तान पर उनके कब्जे के कारणों की विवेचना भी नहीं करूंगी, उसके लिए जानकार लोग बैठे हैं. मैं धर्म और राजनीति की भी कोई बात नहीं करना चाहती. लेकिन एक प्रश्न है जो लगातार साल रहा है कि हर मुसीबत की गाज महिलाओं पर ही क्यों गिरती है? देश, चेहरे, नाम बदलते हैं, लेकिन महिलाओं के साथ होने वाला सुलूक नहीं. उनके शोषण और यातना की कहानियां थमने का नाम ही नहीं लेतीं.

अफगान महिलाओं पर जो पाबंदियां, सख्त कानून लादे जा रहे हैं, उसमें उनका क्या दोष है? न तो वो अमेरिका को अफगानिस्तान बुलाकर लाई थीं. और न ही उन्होंने तालिबान को आने से रोका. खैर, अब तालिबान से मुखातिब और कोई बात नहीं होगी. मैं तो दुनिया की तरफ देखना चाहती हूं. हमारे, आपके जैसे मानवतावादी लोगों की तरफ. क्या ये तस्वीरें आपका दिल नहीं झंकझोरतीं?

अफगानिस्तान से आ रही इस एक तस्वीर में कितनी पीड़ा और वेदना छुपी है.

पहली तस्वीर- जान आफत में डाल दुधमुंहे बच्चे को नाटो सैनिक के सुपुर्द करती बेचारी अफगान मां

कितनी पीड़ा और वेदना छुपी है, इस एक तस्वीर में. कैसा अकल्पनीय और रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य है यह. सोचिए, जिस दृश्य को देख हमारा कलेजा हिल गया, तो उस महिला पर जाने क्या-क्या न गुजरी होगी!...

जिस दिन हम अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने में मशगूल थे, ठीक उसी दिन तालिबान, अफ़गानी महिलाओं की गुलामी का नया अध्याय रच रहा था. अपने क्रूर इरादों का महल खड़ा करने का स्वप्न लिए आतंकियों की पलटन जब काबुल पहुंची तो वहां कोहराम मच गया. वहां से आती तस्वीरों ने सबकी आत्मा को झकझोरकर रख दिया है. अब खबर ये है कि इन दिनों वहां बुर्के की क़ीमत और बिक्री दोनों बढ़ गई है. लेकिन मानवता किस रसातल में चली गई है उसे नापने का कोई पैमाना नहीं है. तालिबान के काले इतिहास पर मैं बात नहीं करूंगी. मैं अफगानिस्तान पर उनके कब्जे के कारणों की विवेचना भी नहीं करूंगी, उसके लिए जानकार लोग बैठे हैं. मैं धर्म और राजनीति की भी कोई बात नहीं करना चाहती. लेकिन एक प्रश्न है जो लगातार साल रहा है कि हर मुसीबत की गाज महिलाओं पर ही क्यों गिरती है? देश, चेहरे, नाम बदलते हैं, लेकिन महिलाओं के साथ होने वाला सुलूक नहीं. उनके शोषण और यातना की कहानियां थमने का नाम ही नहीं लेतीं.

अफगान महिलाओं पर जो पाबंदियां, सख्त कानून लादे जा रहे हैं, उसमें उनका क्या दोष है? न तो वो अमेरिका को अफगानिस्तान बुलाकर लाई थीं. और न ही उन्होंने तालिबान को आने से रोका. खैर, अब तालिबान से मुखातिब और कोई बात नहीं होगी. मैं तो दुनिया की तरफ देखना चाहती हूं. हमारे, आपके जैसे मानवतावादी लोगों की तरफ. क्या ये तस्वीरें आपका दिल नहीं झंकझोरतीं?

अफगानिस्तान से आ रही इस एक तस्वीर में कितनी पीड़ा और वेदना छुपी है.

पहली तस्वीर- जान आफत में डाल दुधमुंहे बच्चे को नाटो सैनिक के सुपुर्द करती बेचारी अफगान मां

कितनी पीड़ा और वेदना छुपी है, इस एक तस्वीर में. कैसा अकल्पनीय और रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य है यह. सोचिए, जिस दृश्य को देख हमारा कलेजा हिल गया, तो उस महिला पर जाने क्या-क्या न गुजरी होगी! आखिर कुछ तो मजबूरी रही होगी कि एक मां घर से निकल, अपने दुधमुंहे बच्चे को लेकर काबुल एयरपोर्ट पर आ खड़ी हुई.

इतने मर्दों के बीच तालिबानियों के जबड़े से बचकर वो अपनी, अपने बच्चे की जान जोखिम में डाल क्यों आई होगी? वज़ह साफ़ है, उसको पता है कि यदि इस एयरपोर्ट से उसे हवाई जहाज मिल गया, तो ज़िंदगी की सुबह हो जाएगी. यदि न जा सकी, तो यहां होने वाली ज़िंदगी का अंधेरा मौत से बदतर होगा. उसके लिए भी और उसके बच्चे के भविष्य के लिए भी.

कंटीले तारों से पटी दीवार के इस पार आना उसकी आखिरी उम्मीद के जैसा है. और उसकी ये छटपटाहट सारी दुनिया को दिखती है. आने वाले इन बच्चों का क्या भविष्य होगा? उनके परिवार तक वो कैसे पहुंचेंगे? कभी पहुंचेंगे भी या नहीं? उन बच्चों का क्या होगा, जिन्होंने अपनी आँखों के सामने मौत का नंगा नाच देखा है!

क्या दुनिया का कोई भी मनोवैज्ञानिक, उनके कोमल मन पर हुए इस वीभत्स प्रहार को, उसके दुख को कम करवा पाएगा? क्या ये कभी सामान्य बच्चों की तरह मुस्कुरा पाएंगे? अनगिनत बच्चों के चेहरे भीतर तक उतर मन को बार-बार कचोटने लगते हैं. उनकी आंखों में ये प्रश्न बार-बार नज़र आता है कि उन्हें इस बदसूरत दुनिया में किसलिए लाया गया है? किसकी तरस के सहारे उनकी क़िस्मत में ज़िंदा रह पाना बदा है? ये प्रश्न शर्मिंदा करते हैं लेकिन इनके उत्तर ढूंढे नहीं मिलते!

जीवन-रक्षा की गुहार लगाती, रोती- बिलखती लड़कियां किसी का भी दिल पिघला सकती हैं

दूसरी तस्वीर: एयरपोर्ट के दरवाजे पर गुहार लगाती बिलखती लड़कियां

आपने एयरपोर्ट के दरवाजे पर हेल्प, हेल्प कहकर सैनिकों को पुकारती, जीवन-रक्षा की गुहार लगाती, रोती- बिलखती लड़कियां भी जरूर देखी होंगीं. आखिर वो भयाक्रांत लड़कियां क्या मांग रही हैं? जीने का अधिकार ही न! जब हम ऐसी तस्वीरें देखते हैं तो मानवता के सबसे निकृष्ट दौर में होने का दुख सालने लगता है. जीवन का ऐसा निरीह रूप भी कभी सामने आ खड़ा होगा, ये कहां जानते थे हम!

वो रेलिंग जिसके इस पार आने के लिए ये चीत्कारें भर रहीं हैं तो केवल आना भर ही उनका मक़सद नहीं है. वे परी कथाओं के स्वप्नलोक की इच्छा नहीं कर रहीं. वे तो गुलामी की तमाम बेड़ियों को पार करना चाहती हैं. नारकीय जीवन से मुक्ति की आस लगाए बैठी हैं. एक सामान्य मनुष्य की तरह अपना जीवन जीना चाहती हैं. क्या एक देश की महिलाओं की ये मांग बहुत ज्यादा और नाजायज है?

उनकी इस हृदयविदारक पुकार पर दुनिया भर की महाशक्तियों की चुप्पी असहनीय, अक्षम्य है. अभी तो भीतर की कुछ खबरें बाहर आ भी रही हैं. बाद में जो होगा उसकी रत्ती भर भी भनक तक न लगेगी किसी को.

अन्याय के विरुद्ध सामने डटकर खड़ी एक अफगानी महिला

तीसरी तस्वीर: यदि 20 दिन की मोहलत है तो ये जिंदगी आजादी के नाम होगी

भय और आतंक की तमाम खबरों के बीच एक और दृश्य सामने से गुजरा. एक चेहरा अन्याय के विरुद्ध सामने डटकर खड़ा था. यह लड़की पूरी जीवटता के साथ महिलाओं पर हुए इस अत्याचार का विरोध कर रही है. यह विरोध प्रदर्शन वाले उस जुलूस का हिस्सा थी, जहां दौ सौ के हुजूम में सात महिलाएं भी उपस्थित थीं.

यह कहती है, 'पिछले 19 वर्षों से मैं पढ़ाई कर रही हूं और अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रयास कर रही हूं लेकिन दुर्भाग्य से आज मेरे सारे सपने मर गए.' उसने बताया कि 'एक तालिब ने कहा, मैं जो भी करना चाहती हैं, उसके लिए सिर्फ 20 दिन की ही आजादी है. इससे ये अनुमान सहज ही लग जाता है कि उसके बाद कुछ भी हो सकता है.

वो दृढ़ता से कहती है, 'मैं इन 20 दिनों को अपनी आवाज बुलंद करने के लिए इस्तेमाल करना चाहती हूं. हर कोई तालिबान से डरा हुआ है लेकिन मैं नहीं. जब तक वो लोग मुझे शूट नहीं कर देते, मैं अपने मौलिक अधिकारों के लिए लड़ती रहूंगी. उन्हें वो मुझसे छीन नहीं सकते.'

ये तय है कि भीगी आंखों वाली यह लड़की, 20 दिनो में अपनी जी जान लगा देगी. वो अपने सपनों और बीते वर्षों की पढ़ाई को आसानी से जाया नहीं होने देगी. इसकी आवाज देश के झंडे पर गर्व करने वाली और उसे अपनी पहचान कहने वाली लाखों महिलाओं की आवाज है. इस आवाज का दुख हर अफ़गानी लड़की की प्रतिध्वनि है.

दुनिया भर की सताई महिलाओं की पीड़ा इसके चेहरे पर झलकती है. इसके हौसलों को सलाम. सच है, जब मौत तय है तो बेशक़ काल से जूझते हुए ही क्यों न हो! दुआ कीजिए, कि हर महिला की आंखों में यही जुनून दिखाई दे. आखिर इस दर्द को कभी तो विराम मिले. कोई तो पल आए, जब ये अपने सपनों में अपनी ख्वाहिशों के रंग भर सकें.

एक तरफ़ इनकी जिजीविषा है तो दूसरी तरफ़ घटाटोप अंधेरा छाया हुआ है. इस काले अंधकार का भय तो गले से एक निवाला तक नीचे नहीं उतरने देता. मानवता के दुश्मनों का हमेशा के लिए नाश क्यों नहीं हो जाता!

हर बीतते दिन के साथ अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति बद से बदतर हो रही है

चौथी तस्वीर: अज्ञातवास में जीती आतंक और यातनाओं की दास्तानें

गुलामी में जकड़ी महिलाएं, मौत से बदतर ज़िंदगी जीने को मजबूर कर दी जाती हैं. अफ़गानिस्तान से कुछ वर्ष पहले भारत आई एक महिला बताती हैं कि उनकी दो बेटियां थीं जिनमें से एक की 12 वर्ष की उम्र में ही जबरन शादी करा दी गई. दूसरी को कम उम्र में ही बेच दिया गया. वे दोनों ही भीषण शारीरिक एवं मानसिक यंत्रणा से गुजरती रहीं.

उसके बाद उनकी खबरें मिलना बंद हो गईं. ये जानकर रूह कांप जाती है कि उन दोनों को इस दारुण जीवन में धकेलने वाला जल्लाद उनका पिता ही था. बेटियों के गुजर जाने के बाद ये महिला जैसे-तैसे जान बचाकर यहाँ आई और अब शिक्षा प्राप्त कर जीने की कोशिश कर रही है.

ये किस्सा तो एक बानगी भर है. आदिमकालीन रीति रिवाजों वाले क्रूर, यातनापूर्ण शासन में महिलायें आत्मनिर्भर न होकर, बंधुआ मजदूर बना दी जाती हैं. दोषियों पर कोड़े और पत्थर बरसाए जाते हैं. महिलाओं को घर से बाहर काम नहीं करने दिया जाता. हिजाब पहनकर निकलना होता है.

12 वर्ष से ऊपर का होते ही बच्चियों से शिक्षा का अधिकार छीन लिया जाता है. उस पर दिन-रात आतंक के साये में जीना कितना खौफ़नाक है, उसका तो क्या ही कहा जाए!

अफगानी महिलाओं की पीड़ा का अंदाजा शायद ही कोई लगा पाए

पांचवी तस्वीर: जो दिखाई नहीं देगी, दरिंदे उन्हें नामालूम मौत देंगे.

प्रताड़ना की शिकार असहाय महिलाओं में से कुछ चेहरों के नाम होंगे, कुछ की पुकार हम तक पहुंच सकेगी लेकिन उन महिलाओं की पीड़ा का क्या, जिनकी तस्वीर नहीं है, और न ही आएगी. लेकिन तालिबान शासन में वो रोज नई यातना की शिकार बनेंगी. कम उम्र में उनकी जबरन शादी होगी या उन्हें बेच दिया जाएगा.

उनका बलात्कार होगा और फिर निर्मम हत्या भी. इनकी चीखें जबरन थोपे गए लिबास के भीतर ही टकराकर दम तोड़ देंगी. इनकी घुटन के दर्द का गवाह कोई न रहेगा. इनका वज़ूद और नाम दोनों मिटा दिए जाएंगे. इन लाशों की संख्या इतिहास के पन्नों में दर्ज़ भी न होगी कभी.

अमेरिकी बलों ने शनिवार तक अफ़गानिस्तान से लगभग 12,700 लोगों को निकाला है, राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अफगानिस्तान से सभी अमेरिकियों को अपने देश लाने का दृढ़-निश्चय कर लिया है. एक-एक कर सभी देश, अपने अपनों को निकाल लाएंगे लेकिन उन अफ़गानियों का क्या? उन अफ़गानी महिलाओं का क्या?

क्या उन्हें ज़ुल्म सहने और दोज़ख में तड़प-तड़पकर मरने को यूं ही छोड़ दिया जाएगा? मनुष्य ही मनुष्य को खा रहा है. अब और क्या बचा है, देखने को!

हां, एक बात और, कि यूं तो सारी बातें अफ़गानी महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में ही की जा रहीं हैं लेकिन दुनिया भर के अन्य देशों में भी उन्हें कोई राजकुमारी बनाकर नहीं रखा गया है. उन पर हुए अत्याचार, यौन शोषण एवं मानसिक उत्पीड़न की घटनाएं वैश्विक स्तर पर दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं.

यदि आपका मन चाहे तो आप महिलाओं को मनुष्य प्रजाति के हिस्से के रूप में भी मत देखिए. बल्कि उन्हें एक ऐसी नस्ल ही मान लीजिये, जैसे विलुप्त होने वाला कोई जीव. शायद इसी बहाने उनका कुछ उद्धार हो जाए.

शायद इसी बहाने ही सही, उन पर टूटती मुसीबतों का पहाड़ कुछ थम जाए और उनको इस 'सभ्यता' के इतिहास में जीवाश्म बनने से रोका जा सके! मैं फिर कह रही हूं कि अब ये धर्म और राजनीति का मसला है ही नहीं. जीव दया का मामला है. दुनिया के आगे अब इससे ज्यादा कातर मनुहार और क्या करूं!

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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