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बिहार और पश्चिम बंगाल चुनाव मॉडल है अखिलेश यादव की तैयारी का सबक़!

    • नवेद शिकोह
    • Updated: 03 जुलाई, 2021 07:07 PM
  • 03 जुलाई, 2021 07:07 PM
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अखिलेश यादव अति आत्मविश्वास में मुस्लिम समाज को एकमुश्त अपना मानकर गैर यादव पिछड़े वर्गों और दलित समाज को रिझाने में लगे हैं. उनकी नजर बसपा के निकाले गए विधायकों और दलित-पिछड़े समाज में पकड़ रखने वाले छोटे दलों पर भी है. वो इस भरोसे मे हैं कि पश्चिम बंगाल की तर्ज़ पर मुस्लिम और अन्य भाजपा विरोधी एकजुट होकर सपा को जिताने के लिए ताकत झोंक देंगे.

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी भाजपा विरोधी मतदाताओं को पश्चिम बंगाल चुनाव मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित करने की रणनीति तैयार कर रही है. भाजपा को टक्कर देने के लिए उसे खासकर मुस्लिम वोट बैंक का बिखराव रोकना और उन्हें एकजुट करना सबसे बड़ी चुनौती है. यदि कांग्रेस, बसपा और असदुद्दीन ओवेसी का एआईएमआईएम जैसे दल मुस्लिम वोटों को अपने-अपने हिस्से में खीचने में सफल हो जाते है़ंं तो बिहार के चुनाव की तरह एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण धराशाही होकर भाजपा के विजय रथ को रोक नहीं सकेगा. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अति आत्मविश्वास में मुस्लिम समाज को एकमुश्त अपना मानकर गैर यादव पिछड़े वर्गों और दलित समाज को रिझाने में लगे हैं. वो बसपा के निकाले गए विधायकों और दलित-पिछड़े समाज में पकड़ रखने वाले छोटे दलों को साथ लेकर चलने की रणनीति तैयार कर रहे हैं. लेकिन शायद वो अपनी कमजोर जमीन पर दीवारें और छत बनाने जैसी भूल कर रहे हैं. वो इस भरोसे मे हैं कि पश्चिम बंगाल की तर्ज़ पर मुस्लिम और अन्य भाजपा विरोधी एकजुट होकर सबसे बड़े विरोधी दल सपा को जिताने के लिए ताकत झोंक देंगे.

पश्चिम बंगाल फार्मूले पर मुसलमानों का बिखराव रोकना अखिलेश की चुनौती है

किंतु सपा अध्यक्ष शायद ये भूल रहे हैं कि उन्हें गैर यादव ओबीसी,दलित और ब्राह्मण वोट बैंक मे सेंध लगाने से पहले अपना घर बचाने की चुनौती में ऊर्जा लगानी होगी. समाजवादी पार्टी की सफलता का मूल मंत्र एम-वाई फैक्टर है. सपा फाउंडर मुलायम सिंह यादव कभी भी मुस्लिम यादव समाज को घर का वोटबैंक मानकर अति आत्मविश्वास मे नहीं रहे. अपने आधार को मुलायम सिंह ने कभी नजरअंदाज नहीं किया.

कांग्रेस और बसपा के हिस्से से मुस्लिम समाज का विश्वास खींच कर इसे एकमुश्त अपने हिस्से मे लेकर उन्होंने निरंतर संघर्ष...

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी भाजपा विरोधी मतदाताओं को पश्चिम बंगाल चुनाव मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित करने की रणनीति तैयार कर रही है. भाजपा को टक्कर देने के लिए उसे खासकर मुस्लिम वोट बैंक का बिखराव रोकना और उन्हें एकजुट करना सबसे बड़ी चुनौती है. यदि कांग्रेस, बसपा और असदुद्दीन ओवेसी का एआईएमआईएम जैसे दल मुस्लिम वोटों को अपने-अपने हिस्से में खीचने में सफल हो जाते है़ंं तो बिहार के चुनाव की तरह एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण धराशाही होकर भाजपा के विजय रथ को रोक नहीं सकेगा. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अति आत्मविश्वास में मुस्लिम समाज को एकमुश्त अपना मानकर गैर यादव पिछड़े वर्गों और दलित समाज को रिझाने में लगे हैं. वो बसपा के निकाले गए विधायकों और दलित-पिछड़े समाज में पकड़ रखने वाले छोटे दलों को साथ लेकर चलने की रणनीति तैयार कर रहे हैं. लेकिन शायद वो अपनी कमजोर जमीन पर दीवारें और छत बनाने जैसी भूल कर रहे हैं. वो इस भरोसे मे हैं कि पश्चिम बंगाल की तर्ज़ पर मुस्लिम और अन्य भाजपा विरोधी एकजुट होकर सबसे बड़े विरोधी दल सपा को जिताने के लिए ताकत झोंक देंगे.

पश्चिम बंगाल फार्मूले पर मुसलमानों का बिखराव रोकना अखिलेश की चुनौती है

किंतु सपा अध्यक्ष शायद ये भूल रहे हैं कि उन्हें गैर यादव ओबीसी,दलित और ब्राह्मण वोट बैंक मे सेंध लगाने से पहले अपना घर बचाने की चुनौती में ऊर्जा लगानी होगी. समाजवादी पार्टी की सफलता का मूल मंत्र एम-वाई फैक्टर है. सपा फाउंडर मुलायम सिंह यादव कभी भी मुस्लिम यादव समाज को घर का वोटबैंक मानकर अति आत्मविश्वास मे नहीं रहे. अपने आधार को मुलायम सिंह ने कभी नजरअंदाज नहीं किया.

कांग्रेस और बसपा के हिस्से से मुस्लिम समाज का विश्वास खींच कर इसे एकमुश्त अपने हिस्से मे लेकर उन्होंने निरंतर संघर्ष जारी रखा था. वो सत्ता मे आने के बाद और पहले मुसलमानों को तरजीह देते रहे. इसी कारण उनपर हमेशां तुष्टिकरण की तोहमत भी लगती रही. यही नहीं वो खुद के यादव समाज को भी एकजुट रखने में निरंतर प्रयास करते रहे. पर अखिलेश यादव ने जब से पार्टी को पूरी तरह से अपने हाथ में लिया तब से सपा में यादव समाज तक छिटक गया.

चाचा शिवपाल यादव का अलग होना भी अखिलेश यादव की सपा को मंहगा पड़ा. मुसलमानों का विश्वास भी फीका पड़ा. मौजूदा हालात में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल यादव के प्रगतिशील समाजवादी पार्टी को सिर्फ एक या दो सीटें देने की बात कही है. अभी ये तय नहीं है कि शिवपाल ऐसे प्रस्ताव को स्वीकार करेंगे या नहीं.

दरअसल सपा को यादव और मुस्लिम वोट को एकजुट करना ही आसान नहीं है. उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को टक्कर देने के लाए समाजवादी पार्टी के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में सपा परिवार के घर की खटपट में घर का कहा जाने वाला मुस्लिम वोट बैंक बिखर गया था. यादव परिवार में टकराव और बसपा द्वारा खूब मुस्लिम उम्मीदवार उतारना सपा के लिए घातक रहा था.

इस चुनाव में भी इस तरह के ख़तरे अभी बने हुए है. ये भी मुमकिन है कि बसपा असदुद्दीन ओवेसी के एआईएमआईएम के साथ समझौता कर ले. यूपी में विधानसभा चुनाव की तैयारी मे कांग्रेस भी मुसलमानों को रिझाने की कुछ कम कोशिश नहीं कर रही. यूपी की प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा निरंतर सक्रिय हैं. राहुल गांधी लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर हो रहे हैं. मुस्लिम समाज अपने पहले प्यार कांग्रेस को बिल्कुल ही नज़रअंदाज़ कर एकमुश्त सपा को समर्पित हो जाए ऐसा मुश्किल है. 

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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