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Updated: 17 मई, 2020 12:40 PM
अबयज़ खान
अबयज़ खान
  @abyaz.khan
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सुनो शर्मा जी के लड़के... मुझको ठुकरा के अब मेरा इंतकाम देखना. तुमको क्या लगता था, तुम छोड़कर चले जाओगे और मैं तुम्हारी याद में टेसुए बहाती रहूंगी. अरे सोनम गुप्ता (Sonam Gupta) नाम है मेरा, आज के ज़माने की लड़की हूं, अब मैं भी 'आत्मनिर्भर' हो गयी हूं. तुम्हें याद है वो तारीख, 8 नवंबर 2016. भूले तो नहीं होगे. जब नोटबंदी में तुम मुझे बैंक (Banks) की कतार में छोड़कर चले गये थे. तब से आज तक कुछ भी नहीं बदला है. तुम को क्या लगता था, तुम्हारे बग़ैर जी नहीं पाउंगी? ग़लतफहमी में हो तुम? तुम तो जिस दिन रफ़ू चक्कर हुए थे, उसी दिन से तुम्हें दिल, दिमाग़ दोनों से निकाल दिया था. लॉकडाउन (Lockdown) है तो क्या हुआ, जैसे सब जी रहे हैं, वैसे ही मैं भी जी रही हूं. मगर मां तुमसे फ़रियाद नहीं करूंगी. जैसे नोटबंदी (Demonetization) में कट गयी थी, 'लोगबंदी' में भी कट ही जाएगी. भला हो साहब का जो सबको 'आत्मनिर्भर' (Self Reliant) बना रहे हैं तो मैं भी अब आत्म निर्भर हो गयी हूं.

मगर तुम अब भी 'आत्मनिर्भर' ना हुए. तुम जैसे डरपोक लौंडे इश्क़ की गलियों का नासूर हैं. अबे इत्ते डररू थे तो इश्क़ के फ़ज़ीते में काहे पढ़ गए थे. जब तैरना नहीं आता था तो इश्क़ के दरिया में कूदे काहे थे. तुम तो वही करो दो रुपये ट्वीट वाला काम. बस कभी आत्म निर्भर मत बन जाइयो. तुम जब दस रुपये के नोट पर सोनम आई लव यू लिखकर मेरी तरफ फेंकते थे, छत की मुंढेरो से मेरे घर में पर्चे फेंक कर जाते थे, कसम से तब मैं तुम्हें बहुत दिलदार समझती थी.

मुझे लगता था लौंडा सीरियस है, मगर तुम्हारा इश्क़ और तुम्हारे वादे तो 'स्पेशल पैकेज' की तरह खाली निकले. तुम लड़कों में यही ख़राबी है, ख्वाब बहुत दिखाते हो. और वो शादी के बाद हनीमून पर जाने का वादा भी 15 लाख वाले वादे की तरह जुमला निकला. ना तो शादी हुई और ना हनीमून.

Sonam Gupta, Self Reliant, Lockdown, Coronavirus2016 में बेवफा बनी सोनम जहां भी है सही सलामत है और पूरी तरह सही सलामत है

तुम्हारे साथ इश्क़ की गुटरगूं के चक्कर में कितनी कुटाई हुई थी. मगर सब इसीलिए बर्दाश्त किये थे, कि तुम आओगे ज़रूर. वादा निभाने ना सही, अपना वो दो हज़ार का नोट लेने तो जरूर आओगे, जिस पर नोटबंदी में आई लव यू सोनम लिखकर देकर गए थे. मगर तुम तो ऐसे गायब हो गए जैसे गधे के सिर से सींग.

तुम तो कह रहे थे दो हज़ार के नोट में चिप लगी होती है. सब कुछ बता देगा ये नोट. हम उसको ग़लती से कुर्ते में धो दिये. नोट बेचारा क्या बताता उसका तो खुद ही रंग उड़ गया. शर्म से बेचारा गुलाबी पड़ गया था. तब हम समझे थे ये वाला वादा भी कच्चा निकला. इश्क़ की चाशनी में लिपटे तुम्हारे वादों के चक्कर में जो ज़िल्लत हम उठा रहे हैं, वो आज तक जारी है.

तुमको मालूम है तुम्हारे चक्कर में हमने कित्ते जवान लौंडों के दिल तोड़े हैं. हमको लगता था कि तुम हो तो सब कुछ मुमकिन है. जबसे तुमको देखा था, हमारे मन में बस एक ही बात रहती थी 'आखिरी बार बस तुमसे प्यार' मगर गुरु हम यहीं गच्चा खा गए. ऐसा किया एतबार, फिर ना सोमवार रहा ना इतवार.

गुस्से में हमने वो वाला व्रत भी बंद कर दिया जो तुम्हारे लिये 16 सोमवार की मन्नत माने थे. क़सम से बेवफ़ा तुम निकले और नोट पे हमारा नाम चिपका दिया. तुमसे इश्क़ करके एक ही बात समझ आयी थी कि प्यार कैसे किसी के लिए सज़ा बन जाता है. बाद नफ़रत के फिर एक दर्द का सिलसिला सा शुरू हो जाता है.

मगर कोई नहीं गुरु टाइम पर निकल गये, अगर तुम पर निर्भर रहते तो कसम से आज 'आत्मनिर्भर' नहीं बन पाते. और हां तुम पप्पू थे और पप्पू ही रहोगे. सुनो अपनी आर्थिक हालत थोड़ी कड़की में है, जिस दिन 5 ट्रिलियन इकोनॉमी हो जायेगी उस दिन फिर मैं करारे-करारे डॉलर पर लिखूंगी 'शर्मा जी का लड़का फेंकू है' इससे इश्क़ ना करियो.

सुनो अभी स्टेशन पर खड़ी हूं, कतार में हूं. 'लोकल' के इंतजार में. ना ना वोकल नहीं, लॉकडाउन में फंसी हूं. और हां मैंने वो 'टिकटॉक' भी डिलीट कर दिया है. अब विदेशी कुछ भी नहीं. अब तो स्वदेशी के साथ बस 'आत्मनिर्भर' बनना है. अब तुम्हारे गिफ्ट की मोहताज भी नहीं हूं, कल ही नया स्मार्टफोन लिया है. एकदम इम्पोर्टेड है असली वाला.

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लेखक

अबयज़ खान अबयज़ खान @abyaz.khan

लेखक पत्रकार हैं

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