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Updated: 27 अगस्त, 2020 04:49 PM
प्रीति 'अज्ञात'
प्रीति 'अज्ञात'
  @pjahd
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काहू के मन की कोवु न जाने, लोगन के मन हासी

सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिन, लेहो करवट कासी

अखियाँ हरी दर्शन की प्यासी...

दर्शन की आस किसे नहीं होती! कौन अपने ईश के आगे श्रद्धापूर्वक नमन कर नहीं झुकना चाहता! पर भाग्यशाली कुछ ही लोग होते हैं. लेकिन यह युग ही पृथक है. प्रभु कब किस रूप में दर्शन दे दें, कोई नहीं जानता!

आज का दिन जैसा शुभ हुआ है वैसा योग सदियों बाद आता है. कहते हैं न प्रभु की लीला ही न्यारी है. कहो तो जनम बीत जाएँ पर अँखियाँ दर्शन को प्यासी ही रह जाती हैं. परन्तु सौभाग्यशाली हुए तो एक ही जनम में बार-बार दर्शन का लाभ प्राप्त होता है. माननीय की मनमोहक छवि ने कुछ ऐसा ही दृश्य रच इस अलौकिक जगत को दैदीप्यमान कर दिया है. हम सबके आराध्य की इस दयालुता और सहजता ने भक्तों के मन मंदिर में अद्भुत रस का जो प्रबल संचार किया है वह अवर्णनीय, कल्पनातीत एवं अत्यधिक मनमोहक है.

मैं अभी इसके प्रभाव से निकल भी न सकी हूँ कि रैदास का एक पद मेरी स्मृतियों में तैर, इस छवि को और भी विशाल एवं लुभावना कर देता है-

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। जाकी अंग-अंग बास समानी॥

प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद्र चकोरा॥

प्रभु जी तुम दीपक हम बाती। जाकी जोति बरै दिन राती॥

प्रभु जी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।

प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करै रैदासा॥

अहा! यह मृदु मुस्कान और कोमल भाव से सज्जित मुखमंडल, जैसे प्रभु ने साक्षात् दर्शन देने की ही ठान ली हो. इतनी भव्य उपस्थिति कि दोनों हाथ चमत्कृत भाव में स्वयं ही जुड़ बैठे हैं. हृदय की अपार प्रसन्नता यूँ उमड़ रही है जैसे सागर में लहरें मचलती हैं. नैनों की अविरल, अश्रुधार समेटे सम्पूर्ण देह साष्टांग, नतमस्तक है. शब्द माला कंठ में फंस सी गई है जैसे. परिसंचरण तन्त्र में झूला झूलता कोमल हृदय, अपने दोनों जुड़वां अलिंद और निलय के साथ गुलाबी प्रकोष्ठ में उत्सव मना रहा है. इसके मध्य की कपाटिका की गति में एक लचक है, ज्यों अकस्मात् ही कोई मीठी सी लय, मुरली की धुन पर आन बसी हो.

PM Modi peacock imageप्रधानमंत्री मोदी की मोर के साथ मोहक छवि को भक्तों का मन तो मोहना ही था.

धमनियों और शिराओं में उत्साह की लहर दौड़ गई है. समस्त तंत्रिकाएं एक सुर में यही सरगम छेड़ रही हैं कि "हम धन्य हैं प्रभु जो इस युग में जन्म लिया. आज हमारा जीवन सार्थक हुआ." मन आह्लादित है यद्यपि नैन अब भी हतप्रभ अनुभव करते हुए पुनश्च कुरेद रहे हैं कि "हे देवि! क्या सचमुच हम इन पलों के साक्षी हुए हैं?"

मैं भावविभोर हो श्रद्धा से कह उठती हूँ, "हाँ, हमारे अहोभाग्य कि इस पुनीत, पावन प्रातःकाल की सुमधुर बेला में आज प्रभु ने दिव्य दर्शन दे अंततः हमें अनुगृहीत कर ही डाला है." मेरी वाणी में विकम्पन और कोमलता को दृष्टमान करते हुए, नैन भी सजल हो इस विहंगम दृश्य को पुनः स्मरण करते हुए पलकें मूँद लेते हैं.

मैं भक्ति भाव से ओतप्रोत हो, अनायास ही उस मयूर रुपी काग से ईर्ष्या कर बैठती हूँ. तभी शब्द खोजने में मुझे असमर्थ पा, हौले से रसखान आते हैं और मेरे कर्णपटल पर स्वरचित सवैया रख देते हैं-

धूरि भरे अति शोभित श्‍यामजू तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।

खेलत खात फिरै अँगना पर पैंजनी बाजति पीरी कछोटी।।

वा छबि को रसखानि बिलोकत वारत काम कला निज-कोटी।

काग के भाग बड़े सजनी हरि-हाथ सौं ले गयौ माखन रोटी।।

मैं मुस्कुरा रही हूँ और पुनः दोनों कर- कमल किसी चुम्बकीय प्रभाव से स्वतः ही नमन मुद्रा में जुड़ उठते हैं. हृदय, कचोटता है कि "हे बालिके! एक अपरिचित मयूर तो तुम्हारे पास भी स्नेहवश आया था और इन्हीं करकमलों से उसने दानों का स्वाद ग्रहण किया था. वह छवि अलौकिक क्यों न हो सकी?" मैं उसे थपकी मार ज्ञान-दर्शन देती हूँ कि "हे मूढ़! भक्ति, भक्तों से होती है. श्रद्धा से की जाती है. कोई किसी का भक्त यूँ ही नहीं बन जाता. इसके लिए व्यक्तित्व में जादू, भाषा में प्रवीणता और व्यवहार में अद्वितीयता होनी चाहिए. यह गुण रखने वाले विरले ही महापुरुष होते हैं. हम तुच्छ चींटी जैसे प्राणी नहीं!"

आज मैं कबीर के इस दोहे को सही अर्थों में समझ सकी हूँ-

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाही

सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही

अर्थात जब मैं अपने अहंकार में डूबी हुई थी, तब प्रभु को नहीं देख पाती थी. लेकिन जब मेरे हृदय में ज्ञान का दीपक प्रज्ज्वलित हुआ, तब अज्ञान का समस्त अन्धकार मिट गया. ज्ञान की ज्योति से, अहंकार जा चुका है और इसके आलोक में मैंने भी श्री प्रभु को पा लिया है.

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लेखक

प्रीति 'अज्ञात' प्रीति 'अज्ञात' @pjahd

लेखक ब्लॉगर और 'मध्यांतर' की ऑथर हैं

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