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Updated: 03 जून, 2016 02:29 PM
पल्लवी त्रिवेदी
पल्लवी त्रिवेदी
  @pallavi.trivedi.3
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यार मीडिया वालों... किसी को चैन से जीने दोगे या नहीं? अब उस बेचारी टॉपर की खुशी तुम लोगों से देखी नहीं गई. टॉप ही तो किया था, कोई जुर्म कर दिया क्या? ये नहीं कि जाते, बधाई देते, दूसरे विद्यार्थियों के नाम सन्देश लेते और मुंह मीठा करके चले आते. क्या ज़रूरत थी विषयों के नाम पूछने की. जो नाम उस मेधावी बालिका ने साल भर नहीं लिया उसे उच्चारित करने में तकलीफ नहीं आएगी क्या? प्रोडिकल साइंस में खाना बनाने वाली बात को तुम चाहते तो हास्य बोध की तरह लेकर मामला रफा दफा कर सकते थे. मगर नहीं..तुमसे कहां उसकी खुशी सहन होती.

ठीक इसी जिले में पिछली साल भी तुम लोगों ने चार मंजिला स्कूलों की खिड़कियों पर नकल कराने के लिए स्पाइडर मैन की तरह लटके जिगरी दोस्तों पर अपना कैमरा तान दिया था. जांबाजी का ये सिला? मित्रता की पराकाष्ठा पर कसीदे पढ़ने की बजाय बिचारों की ऐसी तैसी कर डाली.

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नकल में भी करनी पड़ती है मेहनत

अब इन टॉपरों ने ही कितनी मेहनत की होगी. रटना अकेले ही मेहनत का काम नहीं है. चिट, पुर्जे बनाना, नोटों की गड्डी का मोह छोड़कर नंबर बढ़वाने जैसे कार्य में खर्च करना, मास्टरों को सेट करना, खाली कॉपी छोड़कर सौ में से सौ नंबर पाना इत्ता भी आसान नहीं है. बहुत परिश्रम मांगता है ये कार्य. और तुम लोग...बस एक प्रश्न पूछकर लज्जित कर आए बच्चों को.

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मत ऐसा ग़ज़ब ढाया करो मित्रों. ह्रदय में थोड़ी करुणा पैदा करो. अगली बार जाओ तो बधाई दो, लड्डू खाओ, माइक घड़ी करो और निकल आओ. पढ़ाई लिखाई की बातें अब न करना.

शिक्षा प्रणाली मजबूत दिख रही है ना तो दिखाई देने दो. उसे उघाड़कर उसकी गंदगी काहे दिखा रहे हो?

देखिए ये दिखाया हम मीडिया वालों ने-

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लेखक

पल्लवी त्रिवेदी पल्लवी त्रिवेदी @pallavi.trivedi.3

लेखक मध्यप्रदेश में पुलिस अधिकारी हैं

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