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Updated: 23 दिसम्बर, 2017 03:12 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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लालू प्रसाद यादव, जैसे ही ये नाम सामने आता है मन के किसी कोने से एक आवाज़ आती है कि "ये तो वहीं वाले नेता हैं जिन्होंने चारा घोटाला किया था" चारा घोटाला क्या था, पुराने लोग उससे परिचित हैं. नए लड़कों से पूछिये तो शायद वो लोग या तो इधर उधर देखें या फिर ये कह दें कि हो सकता है कभी लालू ज्यादा भूखे रहे हों और जल्दबाजी में चारा खा गए हों. जो जानते हैं, अच्छी बात है. जो नहीं जानते हैं वो जान लें. अब से कोई 21 साल पहले तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद यादव और पूर्व सीएम जगन्नाथ मिश्र चर्चा में तब आए थे जब उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने देवघर के सरकारी कोषागार से 84.53 लाख रुपये की अवैध निकासी की है. ध्यान रहे कि पूर्व में लालू और जगन्नाथ मिश्र को चाईबासा कोषागार से 45 करोड़ रुपये की अवैध निकासी मामले में सजा सुनाई जा चुकी है.

कुछ देर में सीबीआई की विशेष अदालत अपना फैसला सुना देगी. फैसला आने वाला है अतः लालू लालू के लिए बीपी का बढ़ना और टेंशन होना लाजमी है. लालू दिलेर आदमी है उन्होंने भगवान पर पूरा भरोसा जताया है. कोर्ट कुछ भी फैसला दे मगर मुझ जैसा इस देश का आम आदमी यही मानता है कि लालू ने "चारा" अकेले नहीं खाया था. इस बन्दर बांट में सब मिले हुए थे. इसमें सबका हाथ था.

लालू प्रसाद यादव, चारा घोटाला, बिहार, सीबीआई    कहा जा सकता है कि ये फैसला लालू के राजनीतिक भविष्य का फैसला करेगा

जब लालू चारा खा चुके हैं और उनके साथ भी लम्बी डकार ले चुके हैं. ऐसे में अब हो हल्ला मचाने से क्या फायदा. कहा जा सकता है कि हमें इस बात को सिरे से नकार देना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि हम पूर्व में कई ऐसे मामले देख चुके हैं जहां जिसको जो हजम करना था, वो हजम कर चुका और 25 - 30 साल बाद जब फैसला आया तो कोर्ट ने कह दिया कि "भइया देखो न हमारे पास सुबूत हैं और न गवाह तो ऐसा है तुम जाओ हम तुम्हें बाइज्जत बरी करते हैं. इस बात को समझने के लिए आप बीते दिनों 2जी पर आए फैसले को देख लीजिये. देश का आम आदमी हाथ में पॉप कॉर्न, चिप्स और नमकीन के पैकेट लेकर अपनी टीवी स्क्रीन के सामने बैठा था नतीजा जो आया वो मूड खराब करने के लिए काफी था.

बहरहाल, मुझे पूरा यकीन है आज फिर कोई बाइज्जत बरी होगा और हम टैक्स पेपर फेसबुक और ट्विटर पर इस पूरे मामले की कड़े शब्दों में निंदा कर देंगे और शाम को चाय संग हल्दीराम की आलू भुजिया खाते हुए नाक भौं सिकोड़ कर कह देंगे कि "न चाहे मोदी जी आएं या कोई और इस सिस्टम का कुछ नहीं हो सकता". अब जब हम ये मान चुके हैं कि जब इस सिस्टम का कुछ नहीं हो सकता तो फिर रोने से क्या फायदा. क्यों न लालू को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए और ये मान लिया जाए कि हम आम आदमी कमा कमा के टैक्स भरेंगे और ये नेता हमारे टैक्स के नाम पर जमा धन से यूं ही अपने वारे न्यारे करते रहेंगे.

अंत में इतना ही कि ये जानते हुए कि होना कुछ खास है नहीं मगर एक आशावादी इंसान के रूप में मैं भी इस अहम फैसले के इन्तेजार में बैठा हूं. फैसला आ गया तो ठीक वरना लालू को बरी होता देख फेसबुक और ट्विटर तो है ही कुंठा निकालने और कड़े शब्दों में निंदा करने के लिए.

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तब भी लालू था... अब भी लालू है...

लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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