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Updated: 27 मई, 2021 03:15 PM
सर्वेश त्रिपाठी
सर्वेश त्रिपाठी
  @advsarveshtripathi
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अपने बाबा रामदेव का विवादों से जैसे चोली दामन का साथ हो.(आप सलवार कुर्ते का साथ भी समझ सकते हैं) बाबा टैलेंटेड बंदे हैं इसमें तो शायद ही किसी को संदेह हो. इतने टैलेंटेड हैं कि मौका मुकाम पर लाभप्रद डिबेट खड़ा करना उन्हें बाखूबी आता है. वैसे भी डिबेट अब न्यूज़ चैनल के रास्ते होते हुए हमारे घर घर में राष्ट्रीय संस्कार का रूप ले ही चुकी है. लॉकडाउन में सुबह सुबह हमारी पत्नी से यही डिबेट होती है कि बर्तन को ज्यादा घिसने से चमक चली जाती है और रोज झाड़ू लगाने से लक्ष्मी नाराज़ होती हैं. लेकिन धर्मपत्नी है कि पोछा तक रोज लगवाती हैं. कहती हैं हाइजीन से इम्यूनिटी बढ़ती है. ख़ैर विश्व का सबसे बड़े लोकतंत्र होने की अपनी कुछ जिम्मेदारी भी होती है कि नहीं? हम पूरी सहिष्णुता के साथ उनकी हर बात अंततः मान लेते है. जल में मगर से बैर कौन करे. हर आदमी थोड़े प्रधानमंत्री की तरह मगरमच्छ की पूंछ पकड़ सकता है भाई. अब देखिए जैसे देश अभी अस्पताल में वेंटीलेटर पर पड़ा कोरोना से जूझ रहा है और टीवी पर बाबा रामदेव डॉक्टरों से भिड़े पड़े हैं. यानि स्वास्थ्य के गंभीर मुद्दे पर देश डिबेट कर रहा है. बाबा के एलोपैथी और डॉक्टरों पर उनके दिए बयान पर घमासान मचा है. आईएमए और स्वास्थ्य मंत्री के कड़े रुख के बाद बाबा रामदेव कुछ ढीले तो पड़े हैं लेकिन चैनल पर आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर शर्मा और वर्तमान महासचिव डॉक्टर लेले से बहस पर बहस किए जा रहे हैं. मजेदार बात यह कि टीवी की इस डिबेट में बाबा अपनी दवा बीच बीच में स्क्रीन पर दिखाकर जैसे चिढ़ाते भी हैं. कलाकार बाबा.

Coronavirus, Ramdev, Covid 19, Disease, Death, Treatment, Satire, India, Ayurvedaएलोपैथी पर सवाल कर बाबा रामदेव ने डॉक्टर लॉबी को आहत कर दिया है

अगर आपको यह देखकर बहुत अज़ीब लग रहा है तो आप इस देश के लायक नहीं हैं. श्रीमान जी हम कब के तमाशा दिखाने वाले देश से अब तमाशा देखने वाले देश बन चुके है . नेहरू के सपेरों और मदारी वाले देश ने यही तो विकास किया है. सच कहें तो जो बचा खुचा था इस ससुरे कोरोना ने तमाशा बना दिया. फ़िलहाल थोड़ा सीरियस टॉक कर लें. हालांकि अब सीरियस तो बुद्धिजीवी भी नहीं होते क्योंकि अब वे सब भी आम चूसकर नहीं काटकर खाना पसंद करते है.

लेकिन हंसिए नहीं, बाबा ने एलोपैथी चिकित्सा और डॉक्टरों की मृत्यु पर जिस लहज़े में टिप्पणी की वह दुःखद है. खासतौर पर ऐसे समय जब कोरोना महामारी से पीड़ित करोड़ों लोगों के लिए यही आधुनिक चिकित्सा ही जान बचाने का एक बड़ा माध्यम बन रही है. देशभर में लाखों डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ इस गंभीर संक्रामक बीमारी में अपनी जान जोखिम में डालकर जी जान से लगे हैं.

सोचिए ऐसे समय में ऐसे बयान न सिर्फ चिकित्साकर्मियों को बल्कि मरीजों को भी हतोत्साहित करेगा कि जो डॉक्टर खुद की जान न बचा पाए वो मरीजों को क्या बचाएगा? हम तो कहते हैं बाबा जी को एक हफ्ते के लिए अपनी दवाई किट के साथ लेवल थ्री के कोविड सेंटर में भेज दें फिर बाबा से पूछे कि कैसन लगा गुरु?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में विभिन्न रोगों के उपचार के लिए योग के विभिन्न आसन और आयुर्वेद एक लोकप्रिय और सहज पद्धति के रूप में हमेशा से स्थापित रही है. पिछले कई दशकों में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के नैदानिक और उपचारात्मक तकनीक के विकास और एलोपैथी दवाईयों की प्रगति के बावजूद भी हर घर में आयुर्वेद की दवाएं जरूर मिलेगी. बाबा के हालिया बयान के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे अब मसला आयुर्वेद बनाम एलोपैथ बनाया जा रहा है और अब बात इगो पर है.

वैसे बाबा रामदेव अब सेठ रामदेव भी है तो इसमें किसी बिजनेस टैक्टिस से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है. आखिर उनकी भी दुकान है. एक बात यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति या संस्थान का किसी भी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति पर कोई एकाधिकार नहीं होता. तो बाबा रामदेव को भी अपनी भाषा में संयम लाते हुए इस प्रवृत्ति से बचना चाहिए.

दूसरी ओर सिर्फ महामारी की ही बात नही है सामान्य परिस्थितियों में नर्सिंग होम और निजी डॉक्टरों के महंगे इलाज़ ने जनता में इस धारणा को बनाने का कार्य किया है एलोपैथी या आधुनिक चिकित्सा महंगी है और कई बार तो इलाज़ के नाम पर मरीजों को लूट ही लिया जाता है. बाबा अगर आज गरज कर आईएमए के दिग्गजों के सामने बरस रहे है तो उसके पीछे बहुत हद तक इन्हीं धारणाओं से निर्मित नैतिक आधार है.

इस पक्ष को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति या एलोपैथ का विकास भारत में हाल के कुछ दशकों की देन है. आयुर्वेद और अन्य देशी चिकित्सा पद्धतियां अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब आम लोगों के जीवन में एकमात्र उपचार का साधन थी. साथ ही गरीबी और आधुनिक चिकित्सा ढांचे का पूर्ण विकास इतने विशाल देश में न होने से अभी भी एक बड़ी जनसंख्या वैद्य और हकीम से इलाज़ करवाती है.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि विश्व भर में एलोपैथ के विकास के साथ ही पारम्परिक चिकित्सा शैलियों ने भी अपना स्थान मजबूती से बचाए रखा है. इनमे भारतीय आयुर्वेद के अतिरिक्त यूनानी चिकित्सा, सिद्ध चिकित्सा, प्राचीन ईरानी चिकित्सा, चीनी चिकित्सा,पारम्परिक भारतीय एक्युप्रेशर चिकित्सा,पारम्परिक कोरियाई चिकित्सा, एक्यूपंक्चर, मुटी और इफ़ा (अफ़्रीकी पारम्परिक चिकित्सा) और अन्य पारम्परिक अफ़्रीकी चिकित्सा शैलियां शामिल हैं. प्रायः यह देखा भी गया है कि कई बीमारियों में यह कारगर भी रहती है.

फिलहाल इस सम्पूर्ण घटनाक्रम और विवाद पर मेरा यही कहना है कि कोई भी व्यक्ति, संस्थान अथवा वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति यह दावा नहीं कर सकती कि मानव के समस्त रोगों के इलाज़ में कोई एक पद्धति ही अंतिम रूप से कारगर और पर्याप्त है. सबका अपना विशिष्ट परिस्थितियों और संदर्भ में अलग अलग महत्व है. यही बात हमें समझना भी है. बाकी बाबा तो बाबा है, डॉक्टर है, अर्थशास्त्री और उससे कहीं ज्यादा मनोविज्ञानी.

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लेखक

सर्वेश त्रिपाठी सर्वेश त्रिपाठी @advsarveshtripathi

लेखक वकील हैं जिन्हें सामाजिक/ राजनीतिक मुद्दों पर लिखना पसंद है.

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