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Updated: 29 अक्टूबर, 2015 01:29 PM
राहुल मिश्र
राहुल मिश्र
  @rmisra
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फॉक्सावैगन वही कार कंपनी है, जिसने पूरी दुनिया में आम आदमियों को न सिर्फ कार चलाने का सपना दिखाया बल्कि उसे पूरा भी किया. लेकिन, अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों में दौड़ रही इस कंपनी की एक करोड़ से भी ज्यादा डीजल गाडि़यों में गड़बड़ी पाई गई. इनमें वे कारें भी हैं, जो महाराष्ट्रा के चाकन प्लां ट से बनकर निकलीं.

ये खबर हमारे लिए कितनी चौंकाने वाली है? या क्‍या वाकई हम फॉक्सइवैगन को माफ करने का दर्जा रखते हैं-

आखिर क्यों फॉक्सवैगन की बेइमानी का भारत पर असर नहीं

भारत एक अजूबा देश है. यहां सड़कों पर आज भी आधे से ज्यादा लोग बिना ड्राइविंग लाइसेंस के गाड़ी दौड़ाते हैं. जिनके पास लाइसेंस है, उनमें भी ज्यादातर ऐसे हैं जिन्होंने लाइसेंस पाने का आसान तरीका अपनाया है. मसलन ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट में सुविधा शुल्क देकर बिना टेस्ट दिए लाइसेंस प्राप्त कर लिया है. लिहाजा, ऐसे लोगों को फर्क नहीं पड़ता यदि उनकी गाड़ी प्रस्ताविक मानकों से थोड़ा अधिक प्रदूषण कर दे.

सड़क पर रेड लाइट का साफ मतलब है कि गाड़ी रोक लें और हरी लाइट होने का इंतजार करें. हमारे देश में इस नियम के प्रति व्यवहार भी अजूबा है. चौराहे की रेड लाइट पर अगर हाथ में डंडा लिए और पीसीआर वैन के साथ कुछ पुलिस वाले मौजूद नहीं हैं, तो रास्ता साफ है. बेफिक्र रहिए, रेड लाइट का कोई मतलब नहीं क्योंकि आप पकड़े नहीं जाएंगे, लिहाजा आराम से रेड लाइट जंप कीजिए.

शहरों में बढ़ते प्रदूषण के चलते देश में पॉल्यूशन सर्टिफिकेट लेने का प्रावधान है. फॉक्सवैगन ने इसी टेस्ट को पास कराने के लिए अपनी गाड़ी में एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है. यह सॉफ्टवेयर गाड़ी के इंजन मोड में बदलाव कर देता है जब गाड़ी का प्रदूषण टेस्ट किया जाता है. लिहाजा इस खुलासे के बाद विदेशों में ग्राहकों की नाराजगी जायज है क्योंकि वे नियमित तौर पर यह टेस्ट कराते थे और नहीं कराने पर उनकी गाड़ी का चालान होना तय रहता है. वहीं यकीन मानिए, भारत में इस टेस्ट को भी ‘सुविधा’ शुल्क की ताकत पर पास किया जा सकता है. हालांकि, कोई यह देखता भी नहीं कि आपकी गाड़ी पर लगे पॉल्यूशन सर्टिफिकेट का गाड़ी से निकल रहे धुएं से कोई लेना-देना है या नहीं. इसीलिए ज्यादातर गाड़ियों में तीन महीने की मियाद वाला हरे रंग का पॉल्यूशन सर्टिफिकेट कई साल तक कंपनी फिटेड ही रहता है.

हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से ब्लू लाइन बसों को हटा दिया गया. ऐसा इसलिए किया जा सका क्योंकि ब्लू लाइन के स्तर की ढुलाई करने के लिए दिल्ली मेट्रो तैयार हो चुकी थी. इससे दिल्ली को तो ब्लू लाइन के काले धुंए से छुट्टी मिल गई, लेकिन वे सारी बसें और उस जैसी बसें आज भी दिल्ली से 100 किलोमीटर दूर किसी दिशा में बेफिक्र दौड़ रही हैं.

अब आप ही बताएं, सड़क, यातायात और गाड़ियों के प्रति अगर हमारी इतनी ‘परिपक्वता’ पहले से है तो फिर फॉक्सवैगन की यह चोरी कहां लगती है. लिहाजा, निश्चिंच रहे फॉक्सवैगन, क्योंकि हम आप से बड़े वाले फॉक्सवैगन हैं.

लेखक

राहुल मिश्र राहुल मिश्र @rmisra

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में असिस्‍टेंट एड‍िटर हैं

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