New

होम -> इकोनॉमी

 |  अर्थात्  |  5-मिनट में पढ़ें  |  
Updated: 17 अगस्त, 2015 12:39 PM
अंशुमान तिवारी
अंशुमान तिवारी
  @1anshumantiwari
  • Total Shares

बहुमत की सरकारें भी डर कर रेत में सिर घुसा सकती हैं. जनप्रिय नेतृत्व के संकल्पवान होने की कोई गारंटी नहीं है. कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश बड़े जनादेश के बाद बड़े सुधारों की बाट जोह रहा हो, सरकारें तो आम तौर पर एक जैसा डीएनए लेकर आती हैं. यदि आप लोकसभा से विपक्ष के 25 सांसदों को निलंबित करने के फैसले को मोदी सरकार के साहस का प्रमाण मान रहे हों तो जरा ठहरिए. साहस और संकल्प का इससे बड़ा मौका तो संसद सत्र से पहले आया था जब काले धन पर विशेष जांच दल (एसआइटी) ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी, जो भारतीय शेयर बाजारों के टैक्स हैवेन से रिश्तों और देसी अर्थव्यवस्था में काले धन के कारखानों पर ठोस व प्रामाणिक तथ्य सामने लाई है. अलबत्ता, जिस एसआइटी के गठन को मोदी सरकार काले धन के खिलाफ सरकार के संकल्प का घोषणा पत्र मान रही थी उसकी रिपोर्ट देखकर सरकार के पैर कांप गए. वित्त मंत्री ने कांग्रेसी राह पर चलते हुए इस रिपोर्ट पर पानी डाल दिया जबकि एसआइटी के निष्कर्षों की रोशनी में काले धन के खिलाफ नीतिगत और प्रशासनिक अभियान शुरू होना चाहिए था.
 
ऐसा पहली बार हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट की निगहबानी में गठित दो न्यायाधीशों का विशेष जांच दल, सरकारी दस्तावेजों और सूचनाओं की पड़ताल के बाद काले धन को लेकर ठोस निष्कर्षों पर पहुंचा है जो काली कमाई और इसके निर्यात को रोकने की रणनीति का ब्लू प्रिंट हैं. पहला निष्कर्ष यह है कि टैक्स हैवेन में जमा काला धन पार्टिसिपेटरी नोट्स (पी नोट्स) के जरिए शेयर बाजार में आ रहा है. दूसरा, भारत में कागजी यानी लेटर बॉक्स कंपनियां काली कमाई को घुमाने-छिपाने का सबसे बड़ा जरिया हैं और तीसरा, अलग-अलग राज्यों में बने विशेष आर्थिक जोन मनी लॉन्ड्रिंग का जरिया हैं.
 
पी नोट्स एक वित्तीय उपकरण है, जिन्हें भारत में पंजीकृत विदेशी निवेशक (एफआइआइ) विदेश में बैठे निवेशकों को जारी करते हैं. इनके जरिए वे निवेशक सेबी में पंजीकरण कराए बगैर भारतीय शेयर बाजार में पैसा लगाते हैं. पी नोट्स के जरिए निवेश करने वाले तकनीकी भाषा में बेनीफिशियल ओनर कहे जाते हैं, जिनकी पहचान संदिग्ध होती है. बेनीफिशियल ओनर की पहचान न केवल अंतरराष्ट्रीय टैक्सेशन में बहस का विषय है बल्कि भारत में भी संसदीय समिति व विशेषज्ञ समूह इस पर सवाल उठा चुके हैं. ब्रिटेन ने इन्हें टैक्स हैवेन के इस्तेमाल और कर चोरी का जरिया माना है और कॉर्पोरेट पारदर्शिता के लिए एक नया कानून पारित किया है जो जनवरी 2016 से लागू होगा.
 
भारत के संदर्भ में पी नोट्स के खेल को समझना जरूरी है, क्योंकि एसआइटी ने सेबी की मदद से कुछ ऐसी सूचनाएं दी हैं जो पहले नहीं मिलीं. भारत में पी नोट्स और बेनीफिशियल ओनर्स के जरिए जितना ऑफ शोर डेरेवेटिव इन्वेस्टमेंट (ओडीआइ) होता है, उसका लगभग 80 फीसदी निवेश केमैन आइलैंड (31%), अमेरिका (14%), यूके (13.5%), मॉरिशस (9.9%) और बरमूडा (9.1%) से आता है. इनमें कुछ देश घोषित टैक्स हैवेन हैं. सेबी के आंकड़ों के मुताबिक, फरवरी 2015 के अंत तक भारतीय बाजारों में 2.7 लाख करोड़ का ओडीआइ मौजूद था. आश्चर्य यह है कि लगभग 60,000 की आबादी वाले केमैन आइलैंड से अकेले भारत में 85,000 करोड़ रुपए का निवेश हुआ. यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय निवेशक केमैन आइलैंड के जरिए बड़े पैमाने पर काला धन पी नोट्स के जरिए भारतीय बाजार में ला रहे हैं. सरकार के लिए यही मौका है जब पी नोट्स को टैक्स हैवेन शेयर बाजार से खत्म करने की निर्णायक मुहिम शुरू की जा सकती है. लेकिन वित्त मंत्री ने क्या किया? एसआइटी की रिपोर्ट पर शेयर बाजार ने जरा-सी घबराहट क्या दिखाई, सरकार बोली कि ऐसा कुछ भी नहीं होगा जिससे बाजार को धक्का पहुंचे. मतलब यह कि टैक्स हैवेन और बाजार के रिश्ते फलते-फूलते रहेंगे. कांग्रेस भी इसी नीति पर चली थी.
 
काले धन पर चुनावी जुमलेबाजी की गर्द अब कमोबेश बैठ चुकी है. मोदी सरकार अगर विदेश और देश में जमा काले धन को लेकर गंभीर है तो उसे तीन कदम तत्काल उठाने होंगे. एक, विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में टैक्स (एसटीटी) से बचने के लिए टैक्स हैवेन या कर रियायतों वाले देशों को आधार बनाकर पी नोट्स के जरिए निवेश करते हैं. कर कानूनों को उदार बनाकर इसे रोका जा सकता है और पी नोट्स धारकों (बेनीफिशियल ओनर) की पहचान अनिवार्य की जा सकती है. दो, एसआइटी की इस राय को मानने में क्या अड़चन है कि काली कमाई को छिपाने व घुमाने में काम आने वाली लेटरबॉक्स कंपनियों पर सख्ती के लिए कंपनी कानून (धारा 89/4) पारदर्शिता बढ़ाई जाए और वित्त मंत्रालय के मातहत सीरियस फ्रॉड ऑफिस इन पर सख्ती करे. तीन, वित्त मंत्रालय की राजस्व जांच एजेंसी (डीआरआइ) सरकार को यह बताती रही है कि एसईजेड संगठित मनी लॉन्ड्रिंग का जरिया हैं यदि इन पर सख्ती की जाए तो काले धन की धुलाई के ये कारखाने रुक सकते हैं.
 
विदेश में काले धन को लेकर मोदी सरकार का कानून तो मैक्सिमम गवर्नमेंट का उदाहरण है जो नौकरशाही को उत्पीडऩ की ताकत दे रहा है. दरअसल कालेधन के अपराध को थामने का असली एजेंडा तो एसआइटी की रिपोर्ट ने थमाया है जो काली अर्थव्यवस्था के खिलाफ सरकार के संकल्प का आधार बन सकता है.
 
पता नहीं, नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से कालेधन पर कुछ कहेंगे या नहीं, लेकिन देश यह समझ पाने में मुश्किल महसूस कर रहा है कि मोदी लगातार उन मौकों को क्यों गंवाते जा रहे हैं जो उन्हें एक साहसी और निर्णायक सरकार का मुखिया साबित कर सकते हैं. उनके पास न केवल सख्त और बड़े सुधारों का भव्य जनादेश है बल्कि कालाधन और पारदर्शिता पर अदालते भी उनके साथ हैं. फिर भी एसआइटी की रिपोर्ट देखने के बाद सरकार अगर उसी खोल में घुस जाती है जिसमें कांग्रेस सरकार हमेशा छिपी रही थी तो मोदी सरकार की नीयत पर सवाल उठाने में कोई हर्ज नहीं है.

#काला धन, #मोदी सरकार, #नरेंद्र मोदी, काला धन, मोदी सरकार, नरेंद्र मोदी

लेखक

अंशुमान तिवारी अंशुमान तिवारी @1anshumantiwari

लेखक इंडिया टुडे के संपादक हैं.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय