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Updated: 14 जुलाई, 2016 07:36 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
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इंटरनेट पर आज एक शास्त्रीय गायक के चर्चे हैं. एक वीडियो के जरिए उनकी उपलब्धियां गिनाई जा रही हैं. बताया जा रहा है कि कुछ नया करने की चाहत में इन्होंने (सर)हदें लांघ दी हैं. उन्होंने भारतीय रागों को अंग्रेजी में गाया है.

ये सुनते ही ये जानने की जिज्ञासा हुई कि शास्त्रीय संगीत को भला अंग्रेजी में गाया कैसे जाता है. वीडियो प्ले किया और कानों में पड़ा- 'व्हाट ए कूल प्लीजेंट एटमॉस्फियर हियर'. ये अंग्रेजी की लाइन है जिसे हिंदी में लिखा गया तो पढ़ने में जरा सी परेशानी हुई, जाहिर है अंग्रेजी अगर अंग्रेजी लिपी में लिखी जाती है तो उसे आसानी से पढ़ और समझ लिया जाता है. और ठीक उसी तरह ये खयाल कानों में पड़ते ही तुरंत बंद कर देने की इच्छा हुई. इसे सुनना मेरे कानों को तकलीफ दे रहा था.

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शास्त्रीय संगीत में अंग्रेजी भाषा

दिमाग को हिला देने वाले अंग्रेजी बोल, जिन्हें रागों में ढालकर, शास्त्रीय संगीत के किसी महान पंडित की तरह गाया जाए, तो वो अजीब ही सुनाई देगा. और ये अजीब और वाहियात सा लगने वाला काम किया है शास्त्रीय गायक किरण पाठक ने. इन्होंने राग केदार को अंग्रेजी में गाया है. यकीन कीजिए ऐसा पहले कभी किसी ने न सुना होगा और न करने की कल्पना ही की होगी.

राग केदार की बंदिश, ताल, तानपुरे के स्वर और इन सबके बीच अंग्रेजी के बोल. ऐसे लग रहे थे जैसे कि किसी ने शास्त्रीय संगीत से उसकी आत्मा निकाल ली हो. शास्त्रीय संगीत में गाए जाने वाले रागों में बोल और भावनाओं के बीच का नाता बहुत गहरा होता है. हो भी क्यों न, भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति वेदों से मानी जाती है. सरल शब्दों में कहा जाए तो शास्त्रीय संगीत के बोल और स्वर एक दूसरे के पूरक होते हैं. इसीलिए ये संगीत उन कानों को ही सुकून देता है जो उसे सुनना चाहते हैं और इस संगीत को महसूस करना चाहते हैं.

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शास्त्रीय संगीत पसंद न करने वाले लोगों को किरण पाठक का ये एक्सपेरिमेंट किसी चुटकुले की तरह ही लग रहा होगा, जिसे सुनकर और शेयर करके वो थोड़ा सा हंस लेंगे. लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो शास्त्रीय संगीत को कला कम, आराधना ज्यादा मानते हैं. और उस कला में ये अजीब बदलाव लागकर जो तस्वीर किरण पाठक ने संगीत प्रेमियों के सामने रखी है, उसमें कलाकारी कम, बल्कि शास्त्रीय संगीत का अपमान ज्यादा नजर आ रहा है.

इसपर पाठक जी का कहना है कि 'कला बदलनी ही चाहिए. संगीत को ग्लोबल होना चाहिए'. वीडियो में वो न सिर्फ खुद अंग्रेजी राग गा रहे हैं, बल्कि अपने शिष्यों को वो अंग्रेजी बंदिशें सिखा भी रहे हैं. इसपर इनका तर्क ये है कि, जब अंग्रेज अपना संगीत बजाते हैं तो वो इन्हें समझ नहीं आता, तो जो हम गाते हैं तो वो उन्हें कैसे समझ आएगा. उन्हें समझ आए, इसलिए उन्होंने हमारे संगीत से उसकी आत्मा अलग कर दी.

इसपर इनके तर्क भी सुनिए-

'नटखट कान्हा' की जगह 'ओ नॉटी कृष्णा' कह रहे हैं. ये सब करने को उचित ठहराने के कारण भी दे रहे हैं कि उन्हें डर है कि शास्त्रीय संगीत खत्म हो ता जा रहा है. लेकिन उनकी जानकारी के लिए ये बताना जरूरी है कि शास्त्रीय संगीत को पसंद करने वाले न सिर्फ भारत में हैं बल्कि विदेशों में भी बसे हुए हैं और वहां की यूनिवर्सिटीज तक में शास्त्रीय संगीत सिखाया जाता है. विदेशियों ने भारतीय संगीत को उसकी वास्तविकता के साथ अपनाया है, उसे सरलता से समझने के लिए उन्होंने उसके रूप को जरा भी नहीं बदला. हजारों विदेशी छात्र शास्त्रीय संगीत को भारतीय भाषा में ही सीखते और गाते हैं. यकीन नहीं तो ये वीडियो देखिए-

लेकिन ये एक्पेरिमेंट करके किरण पाठक ने किसी भी भाषा के साथ न्याय नहीं किया. उनका उद्देश्य भले दुनिया को कुछ नया देना हो, लेकिन ये करके उन्होंने लोगों को अपने ऊपर हंसने का सिर्फ मौका दिया है.

Classical Music, Raga, India

लेखक

पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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