charcha me| 

होम -> संस्कृति

बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 19 जून, 2022 04:39 PM
आईचौक
आईचौक
  @iChowk
  • Total Shares

अफगानिस्तान काबुल में इस्लामी आतंकी समूहों ने गुरुद्वारा साहिब को निशाना बनाया. हमले में एक सिख श्रद्धालु समेत दो लोगों की मौत हुई है. आधा दर्जन से ज्यादा जख्मी बताए जा रहे हैं. आतंकियों की योजना तो बारूद भरी गाड़ी से गुरुद्वारा साहिब को ही उड़ाने की थी, लेकिन वे मकसद में पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाए. गुरुग्रंथ साहिब पर भी किसी तरह की आंच नहीं आई है. भीषण हमला शनिवार को हुआ. पवित्र गुरुग्रंथ साहिब को बचा लिया गया. जान जोखिम में डालकर नंगे पैर 'पवित्र गुरुग्रंथ साहिब' को सिर पर लादकर भागते सरदारों का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है. तालिबान के सत्ता में आने के बाद से ही वहां अल्पसंख्यकों- खासकर हिंदू और सिखों को निशाना बनाया जा रहा है.

दुनिया में इस्लाम के उदय से पहले तक अफगानिस्तान हमेशा से भारत का हिस्सा रहा. वहां पहले हिंदू और फिर बौद्ध धर्म खूब फला-फुला. लेकिन इस्लाम पहुंचने के साथ ही साथ इस्लामी धर्म और संस्कृति का बोलबाला हो गया. अलग धर्म-संस्कृति के बावजूद अफगानिस्तान में भारतीय धर्म और संस्कृतियों का असर प्रभावशाली रहा है. बहुत कम लोग इतिहास की उस दास्तान को जानते होंगे जो अफगानिस्तान की जमीन पर भारतीय शौर्य की अद्भुत गाथा है. एक ऐसी गाथा जिसे दुनिया आज भी हैरानी के साथ देखती है. असल में भौगोलिक बनावट और बर्बर लड़ाकों की वजह से अफगानिस्तान 18वीं सदी तक लगभग अपराजेय था. लेकिन महाराजा रणजीत सिंह ने इस भ्रम को तहस नहस कर दिया था. इतिहास में अगर महाराजा नहीं हुए होते तो अफगानिस्तान और पाकिस्तान का मौजूदा नक्शा अलग होता.

afaganistan sikhआतंकी हमले में पवित्र गुरुग्रन्थ साहिब को बचाते सिख.

सिखों की तलवार ने अफगानिस्तान में किस तरह मचाया था कोहराम?

महाराजा रणजीत सिंह 1801 में पंजाब की गद्दी पर बैठे थे. गद्दी पर बैठते ही उनकी योजना पश्चिम की सीमाओं को चाकचौबंद करने के साथ ही साथ सिख साम्राज्य को काबुल तक फैलाने की थी. लेकिन अफगानिस्तान को काबू करना आसान काम नहीं था. यह वो इलाका था जहां किसी भी योद्धा का वश नहीं चला. यहां तक कि दुनिया के सबसे महानतम सिकंदर को भी यहां से निराश लौटना पड़ा था. यहां तक कि बेशुमार ताकत के भरोसे भारत विजय का सपना लेकर निकले बाबर के पांव भी अफगानी लड़कों ने रोक दिए थे. बाबर ने 1519 में ताकत जुटाई और दोबारा हमला किया. वह जमरूद तक तो पहुंच गया लेकिन वहां से पंजाब के लिए आगे बढ़ने से हिचक गया. उसे डर था कि अगर वो आगे गया और वापस लौटने पर फिर मुकाबला हुआ तो बचना असंभव है. बाबर सिर्फ एक रात बिता पाया था.

लेकिन महाराजा रणजीत सिंह के दिमाग में अफगानिस्तान का नासूर बहुत पहले से था. उन्हें पता था कि अगर पश्चिम के रास्ते को नियंत्रित कर लिया गया तो पंजाब समेत समूचे उत्तर भारत को रौंदने वाले एक निरंतर काले अध्याय का हमेशा के लिए खात्मा हो सकता है. यह दुर्भाग्य है कि आधुनिक भारत के इतिहास में सबसे महान सिख साम्राज्य, महाराजा रणजीत सिंह और उनके कमांडर हरि सिंह नलवा की कहानी बच्चों को इतिहास में नहीं पढ़ाई जाती. खैर. रणजीत सिंह ने अफगानिस्तान पर नकेल कसने की जिम्मेदारी कमांडर हरि सिंह नलवा को दी. एक ऐसा योद्धा जिसके सामने पिछले 250 साल के इतिहास में कोई दूसरा भारतीय लड़ाका जंग के मैदान में नहीं दिखता है.

हरि सिंह की तलवार ने कैसे बर्बर लड़कों को भी मनुष्य बना दिया?

महाराजा रणजीत सिंह से पहले कसूर, अटक, कश्मीर, महमूदकोट, मुल्तान, मनकेरा, नौशहरा और पेशावर जैसे इलाके सिख साम्राज्य का हिस्सा नहीं थे. हरि सिंह ने महज 16 साल की उम्र में जीवन की पहली लड़ाई लड़ी और कसूर को जीतकर सिख साम्राज्य में मिलाया था. इसके बाद उनके नेतृत्व में सिखों की बेजोड़ पलटन ने वो कारनामा शुरू किया, हजार साल तक जिसके बारे में किसी भारतीय शूरवीर ने सोचा भी नहीं था. हरि सिंह ने कई बेजोड़ लड़ाइयां कीं और 1813 में अटक, 1814 में कश्मीर, 1816 में महमूदकोट, 1818 में मुल्तान, 1822 में मनकेरा और 1823 में नौशहरा को जीत लिया. यह वो इलाके हैं जहां इस्लामी आक्रमणकारियों की बर्बरता के सबूत आज भी नजर आते हैं. उस वक्त भी यह आसान काम बिल्कुल नहीं था. युद्ध के मैदान में अफगान लड़ाकों की बर्बरता जग प्रसिद्ध थी. लेकिन हरि सिंह की तलवार के आगे अफगानों की बहादुरी और बर्बरता भी पानी मांगते नजर आई. हरि सिंह जब खालसा फ़ौज लेकर पेशावर (1834 में) की ओर बढ़ें तो सिर्फ उनके खौफ भर से दुश्मनों ने बिना लड़े ही उसे छोड़ दिया.

महाराजा रणजीत सिंह की फ़ौज दिन महीने और साल बीतने के साथ लगातार काबुल की तरफ बढ़ती ही जा रही थी. तब काबुल में दोस्त मुहम्मद खान का राज था. काबुल की तरफ सिख सेना के रास्ते में सिर्फ जमरूद और खैबर दर्रा दो अवरोध थे. पेशावर जीतने के कुछ अंतराल के बाद ही हरि सिंह ने जमरूद (1836 में) को भी जीत लिया. हरि सिंह ने जमरूद में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण एक किला भी बनवाया. उधर, दोस्त मुहम्मद इस ताक में बैठा था कि एक अच्छा वक्त मिले ताकि वह जमरूद और पेशावर जैसे हारे हुए इलाकों को फिर से जीत ले. अफगान सेना सिखों की तलवार के आगे इतना विवश हो गई थी कि उसमें पलटवार करने की कोई क्षमता नहीं बची थी. भूगोल की वजह से खैबर दर्रा अफगानों की अंतिम उम्मीद थी. दोस्त मोहम्मद ने खैबर दर्रे के उस पार अपनी समूची शक्ति को पांच बेटों की निगरानी में रक्षा पंक्ति के रूप में खड़ा किया था. हमला करने की स्थिति में तो वह था भी नहीं.

hari-singh-nalwa-650_061922041046.jpg(हरि सिंह नलवा. फोटो- चंडीगढ़ हर्ट ऑफ़ पंजाब के फेसबुक पेज से साभार.)

हरि सिंह के डर में मौके का फायदा भी नहीं उठा पाया दोस्त मुहम्मद

दोस्त मुहम्मद का इंतज़ार ख़त्म हुआ. असल में हुआ ये कि 1837 में लाहौर में महाराजा रणजीत सिंह के पोते की शादी थी. इसमें तमाम राजा महाराजा और अंग्रेज अफसर बुलाए गए थे. शादी समारोह के बहाने सिख साम्राज्य अपनी सैन्य ताकत का भी प्रदर्शन करने वाला था. इसके लिए सिखों की लगभग समूची फ़ौज को बुला लिया गया था. दोस्त मुहम्मद को भी मेहमान के रूप में बुलाया गया था. जमरूद में सिखों के मात्र 600 सैनिक थे. अफगानों को पलटवार के लिए यह सबसे बेहतर मौका लगा. हरि सिंह ने खतरे को भांप लिया. महाराजा की इच्छा के बावजूद उन्होंने पेशावर में ही रहना बेहतर समझा. बाद में वो जमरूद के लिए निकल गए क्योंकि उन्हें पता था कि अफगान पूरी ताकत से हमला करेंगे. एक तो सिख सैनिकों की संख्या बहुत कम है दूसरा रसद भी पर्याप्त नहीं था. दोस्त मुहम्मद ने सेना को जमरूद किले को घेरने का आदेश दिया.

उधर, यह खबर भी आ गई कि जमरूद को बचाने के लिए हरि सिंह नलवा निकल पड़े हैं. इस एक खबर भर ने अफगानी सेना के हौंसले को लगभग पस्त कर दिया. 28 अप्रैल 1837 के दिन भीषण जंग हुई. हरि सिंह को गंभीर रूप से घायल हो गए. हालांकि एहतियात के तौर पर उन्होंने आदेश दिया कि अगर वे मर भी जाए उनके मौत की खबर किसी भी सूरत में बाहर ना निकलने पाए. ऐसा ही हुआ. हरि सिंह की मौत हो गई. कहते हैं कि उनकी मौत के बाद चार दिन तक लगातार हरि सिंह के कपड़ों को किले के बाहर सुखाया जाता था. अफगान चार दिन तक सिर्फ हरि सिंह के डर की वजह से सीधा हमला करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. बस दूर से गोला बारूद दागते रहते. जवाब में सिख सेना भी गोला बारूद दागती. जबकि अफगानों के पास इतनी विशाल सेना थी कि वे आसानी से जमरूद को कब्जे में ले सकते थे. चार दिन बाद हरि सिंह की मौत की खबर बाहर आई और लाहौर से सिखों की एक विशाल फ़ौज भी जमरूद पहुंच गई. अफगानों को पीछे जाना पड़ा.

हरि सिंह दो साल और जीवित रहते तो काबुल फिर भारत का होता

हरि सिंह जिंदा रहते तो शायद काबुल जीत कर दोस्त मुहम्मद के साम्राज्य का अंत कर देते. लेकिन उनकी मौत के बाद महाराजा रणजीत सिंह का सपना अधूरा रह गया. हालांकि जो इलाके हरि सिंह ने जीते थे वह सिख साम्राज्य का हिस्सा रहा. बाद में भारत पाकिस्तान बंटवारे में यही इलाके पाकिस्तान को मिले थे. महाराजा रणजीत सिंह हरि सिंह को बहुत स्नेह करते थे.

हरि सिंह का जन्म 28 अप्रैल 1791 को गुजरांवाला में हुआ था. वह एक साधारण परिवार से थे. जब उनकी उम्र 13 साल की थी एक संपत्ति विवाद में रणजीत सिंह के लाहौर दरबार में पहुंचे थे. उस दिन वहां कुश्ती का भी आयोजन था. महाराजा एक पहलवान का सम्मान कर रहे थे. हरि सिंह ने हिम्मत जुटाकर कहा कि वह इस पहलवान को हरा सकते हैं. महाराजा के निर्देश पर कुश्ती करवाई गई. और हरि सिंह ने कहे अनुसार अपने से बड़े और दोगुने पहलवान को दे मारा. हरि सिंह की बहादुरी से प्रभावित होकर महाराजा ने उन्हें अपना निजी अंगरक्षक बना लिया. अपनी काबिलियत, निष्ठा, ईमानदारी और देशप्रेम की वजह से हरि सिंह सिख साम्राज्य की ताकतवर सेना के कमांडर के पद तक पहुंचे.

हरि सिंह के युद्ध कौशल की वजह से ही महाराजा रणजीत सिंह को भारत के नेपोलियन की संज्ञा दी जाती है. हरि सिंह नलवा को ऑस्ट्रेलिया की एक पत्रिका ने दुनिया के 10 सर्वश्रेष्ठ लड़ाकों में शुमार किया है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान के तमाम इलाकों में आज भी माएं हरि सिंह नलवा का नाम लेकर अपने बच्चों  को शैतानी से डराती हैं.

लेखक

आईचौक आईचौक @ichowk

इंडिया टुडे ग्रुप का ऑनलाइन ओपिनियन प्लेटफॉर्म.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय