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Updated: 11 जनवरी, 2022 02:20 PM
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भारतीय सिनेमा पर पिछले कुछ सालों में राजनीति से प्रेरित होकर फ़िल्में बनाने के आरोप लगते रहे हैं. यूपी समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले बॉलीवुड में बन रही तमाम फिल्मों के राजनीतिक एजेंडा को लेकर चर्चाएं भी थीं, खासकर अक्षय कुमार और अजय देवगन की फिल्मों को लेकर. इनके फिल्मों के विषय की वजह से दोनों अभिनेताओं को भाजपा का पक्षकार करार दिया जाता है. कई और फिल्मकार भी हैं इनमें से कुछ फ़िल्में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले रिलीज होनी थीं.

फ़िल्में राजनीतिक एजेंडा के तहत बनी या उनका विषय इत्तेफाकन राष्ट्रवादी मूड का है- यह बाद की बात है. पर सामजिक स्तर पर इस बात को खारिज करने के वाजिब तर्क नहीं मिलते कि फिल्मों के जरिए किसी तरह का मानस तैयार नहीं होता. चूंकि फिल्मों को चुनाव से ठीक पहले रिलीज किया जा रहा था तो इन्हें राजनीतिक नजरिए से देखना स्वाभाविक बात है. हालांकि अचानक से उठे कोरोना महामारी की 'लहर' से घबराएं निर्माताओं ने कदम वापस खींच लिए हैं. फिल्मों का भले राजनीतिक प्रोपगेंडा हो पर चुनाव पर उनका असर तो नहीं पड़ने वाला है.

कौन सी तीन फिल्मों का राजनीतिक असर पड़ सकता था?

7 जनवरी को एसएस राजमौली की एक्शन पीरियड ड्रामा आरआरआर को रिलीज होना था. इसके बाद गणतंत्र दिवस से पहले अक्षय कुमार की पीरियड ड्रामा पृथ्वीराज और गणतंत्र दिवस पर विवेक अग्निहोत्री के निर्देशन में बनी कश्मीर फाइल्स. आरआरआर की कहानी देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत है. फिल्म दो स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन पर आधारित है. दोनों में से एक बड़ी जाति से और दूसरा अनुसूचित जनजाति से. राष्ट्रवादी राजनीति में हमेशा इस तरह के सांस्कृतिक गठजोड़ों की वकालत की जाती है. हो सकता है कि यह फिल्म राष्ट्रवादी लिहाज से एक निष्कर्ष प्रस्तुत करती. निष्कर्ष के असर राजनीतिक भी होते हैं.

kashmir-files-650_011022080806.jpgकश्मीर फाइल्स की रिलीज भी टल गई है.

अक्षय कुमार के अभिनय से सजी पृथ्वीराज एक ऐसे नायक की कहानी है जिन्हें सैकड़ों साल से हिंदू गौरव का प्रतीक पुरुष माना जाता रहा है. पृथ्वीराज को देश का आख़िरी हिंदू सम्राट माना जाता है. संघ और भाजपा हमेशा से पृथ्वीराज को महानायकों में शुमार करते आए हैं. चुनाव से पहले रिलीज होने की स्थिति में निश्चित ही यह फिल्म हिंदू-मुस्लिम की बहस में एक पॉलिटिकल रेफरेंस बनती. वैसे भी साफ़ दिख रहा है कि समूचे चुनाव पर ध्रुवीकरण का तगड़ा असर दिख रहा है.

शास्त्री की मौत के बाद अब कश्मीर का बहाना

कश्मीर फाइल्स भी जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक हालात को लेकर बनी फिल्म है. विवेक अग्निहोत्री काफी वक्त से अपनी राजनीतिक विचारधारा जाहिर करते रहे हैं. उनकी पिछली फिल्म द ताशकंत फाइल्स पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु पर आधारित है जिसके जरिए कुछ पार्टियों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. इसमें दिखाया गया है कि कैसे देश में मुस्लिम तुष्टिकरण की शुरुआत हुई और कैसे सत्ता पर काबिज नेताओं ने राष्ट्रीय हितों को दरकिनार कर कार्य किया. फिल्म के जरिए सीधे-सीधे कांग्रेस और मौजूदा राजनीति पर निशाना साधा गया.

कश्मीर फाइल्स में भी कश्मीर में आतंकवाद और उसके लिए जिम्मेदार लोगों की शिनाख्त की गई होगी. मोदी के दूसरे कार्यकाल से पहले तक कश्मीर का विशेष स्टेटस राजनीतिक मुद्दा बना रहा. भाजपा ने हमेशा कश्मीर में आर्टिकल 370 का विरोध किया है जो राज्य को विशेषाधिकार प्रदान करता है, लेकिन दूसरे कार्यकाल में मोदी ने इसे ख़त्म कर दिया. कश्मीर फाइल्स में विवेक के निशाने पर फिर से राजनीति रहती और इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि एक पॉलिटिकल रेफरेंस भी देती. फिलहाल तीनों फ़िल्में रिलीज नहीं होंगी.

सोशल मीडिया पर मुस्लिम विरोधी जो बातें करते हैं सूर्यवंशी में वो सबकुछ है

वैसे सुहेलदेव की कहानी बैटल ऑफ़ बहराइच, अक्षय की ही रामसेतु जैसी तमाम और फ़िल्में भी हैं जो राजनीतिक असर वाली मानी जा सकती हैं. यहां तक कि दीपवाली पर आई अक्षय कुमार की सूर्यवंशी के विषय को लेकर भी सवाल जवाब हो रहे हैं. कई लोगों का आरोप है कि सूर्यवंशी एक भाजपाई एजेंडा पर बनी फिल्म है. आतंकवाद की कहानी को दर्शाती फिल्म में मुस्लिम राष्ट्रवाद की कोशिश दिखती है. सूर्यवंशी में कसाब और कलाम जैसे संवाद है. घुसपैठिया और लव जिहाद जैसी चीजें हैं. पाकिस्तान और आईएसआई की साजिशें हैं. आतंक के खिलाफ जंग में मुस्लिम नुमाइंदगी और हिंदुओं के साथ उनके भाईचारा को दिखाया गया है.

हिंदू मुस्लिम डिबेट में आम लोग जिस तरह के तर्क देते हैं उन्हें फिल्म में एड्रेस किया गया है. मसलन भारत के अलग-अलग शहरों में स्लीपर सेल का सालों से रहना. उनका धर्म बदलकर हिंदू लड़कियों से शादी करना और बच्चे पैदा करना आदि. यह काल्पनिक फिल्म हिंदू-मुस्लिम बहस में विवाद के तमाम मुद्दों को एड्रेस करती है और राष्ट्र्रवादी नजरिए में कई निष्कर्ष भी देती है. ऐसे सवाल फिल्म के निर्माता निर्देशक रोहित शेट्टी से भी हुए थे पर उन्होंने किसी दुर्भावना से फिल्म बनाने के आरोपों को खारिज किया था.

इसमें कोई शक नहीं कि फ़िल्में जनमानस बनाती हैं. यह साफ़ साफ़ नहीं कहा जा सकता कि कोरोना की वजह से जो फ़िल्में टल गईं उनका आगामी चुनावों पर कितना असर होता. लेकिन ऐसा मानने की वजह है कि उनका कुछ ना कुछ प्रभाव तो होता ही.

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