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Updated: 08 मई, 2022 07:15 PM
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''जो लोग तिलक कलावा बांधकर, हमारी बेटियों के साथ छलावा करते हैं, वो लोग सुधर जाएं, क्योंकि देश का हिंदू जाग चुका है''...फिल्म 'द कन्वर्जन' का ये डायलॉग उसकी पूरी कहानी कहता है. साफ पता चलता है कि फिल्म लव जिहाद जैसे संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दे पर आधारित है. लेकिन फिल्म का फिल्मांकन जिस तरह से किया गया है, वो उसे ए ग्रेड की फिल्मों में तो कत्तई शामिल नहीं करता, बल्कि बी ग्रेड फिल्मों की झलक दिखती है. हालांकि, सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक जिस तरह से इस पर चर्चा चल रही है, कुछ लोग इसे विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' से तुलना करने लगे हैं. जैसे 'द कश्मीर फाइल्स' ने हिंदुस्तान में लोगों को कश्मीरी पंडितों के उत्पीड़न और घाटी में हिंदूओं के नरसंहार के बारे में सोचने और चर्चा करने का मौका दिया था, उसी तरह 'द कन्वर्जन' मूवी से लव जिहाद का मुद्दा फिर से भड़कना लाजमी है. आरोप लगता रहा है कि हिंदू लड़कियों को बहला-फुसला कर उनसे शादी करने का खेल मुस्लिम युवक संगठित रूप से करते हैं. और शादी के बाद उन पर इस्‍लाम कबूल करने का दबाव बनाया जाता है. ऐसा न होने पर उन्‍हें मौत के घाट तक उतार दिया जाता है. 'लव जिहाद' को लेकर ऐसी ही चर्चाएं होती हैं. 

माना जा रहा है कि फिल्म 'द कन्वर्जन' बहुसंख्यक समाज की एक गंभीर चिंता से संबंधित है, लेकिन यह मानना अभी जल्दीबाजी होगा कि इस फिल्म का प्रभाव और प्रसार वैसा ही होगा, जैसा कि विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' का हुआ था. क्योंकि विवेक ने अपनी फिल्म को बॉलीवुड की बेहतरीन स्टारकास्ट के साथ उत्तम तकनीक के साथ बनाया था. फिल्म में अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती, दर्शन कुमार और पल्लवी जोशी जैसे कलाकार मौजूद है. इसके साथ ही फिल्म का प्रमोशन भी बड़े पैमाने पर योजनाबद्ध तरीके से किया गया था. सभी जानते हैं कि द कश्मीर फाइल्स माउथ पब्लिसिटी की वजह से सुपर-डुपर हिट हुई है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये रही है कि हर प्रमोशन इवेंट में विवेक ने अपनी फिल्म की टीम के साथ कश्मीरी पंडितों के पीड़ित परिवारों को रखा. इस तरह लोगों के सामने कश्मीरी पंडितों का वास्तविक दर्द पेश हुआ, जिसने लोगों से सीधा कनेक्ट किया. इसके विपरीत 'द कन्वर्जन' की मेकिंग दोयम दर्जे की लगती है. फिल्म में कोई नामचीन कलाकार भी नहीं है.

the-conversion-poste_050722114857.jpgफिल्म 'द कन्वर्जन' लव जिहाद जैसे संवेदनशील और ज्वलंत मुद्दे पर आधारित है. विनोद तिवारी के निर्देशन में बनी फिल्म 'द कन्वर्जन' में विन्ध्या तिवारी, प्रतीक शुक्ला और रवि भाटिया जैसे कलाकार मुख्य भूमिका में हैं. तीनों ही कलाकारों को बहुत कम लोग जानते हैं. फिल्म की पूरी शूटिंग बनारस में हुई है. यहां एक बात गौर की जा सकती है कि फिल्म के प्रेस के दौरान इसके मेकर्स ने जरूर बज क्रिएट करने की कोशिश की थी. इस दिन दिल्ली बीजेपी नेता कपिल मिश्रा को बतौर मुख्य अतिथि बुलाया गया था. कपिल के बुलावे पर कई दक्षिणपंथी संगठनों के लोग और पत्रकार भी बड़ी संख्या में पहुंचे थे. फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर काफी कुछ लिखा जा रहा है. फिल्म 6 मई को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है, लेकिन बहुत कम लोगों को ये बात होगी. हो सकता है कि आने वाले समय में माउथ पब्लिसिटी की वजह से फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' की तरह चल जाए और इसकी बंपर कमाई हो जाए. आईएमडीबी रेटिंग को देखकर तो कुछ ऐसा ही लगता है. इस वक्त फिल्म की रेटिंग 8.9/10 है, जो कि 'द कश्मीर फाइल्स' की रेटिंग 8.3/10 से भी ज्यादा है. फिल्म ने पहले दिन वर्ल्डवाइड 2.50 करोड़ रुपए का कलेक्शन भी किया है.

फिल्म 'द कन्वर्जन' खो देखने के बाद वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय ने सोशल मीडिया पर अपनी समीक्षा लिखी है. वो लिखते हैं, ''फिल्म की कहानी को देखा जाए तो मध्यांतर तक फिल्म थोड़ी हलकी-फुल्की रहती है. अच्छा संगीत, दृश्यानुसार गीत और सुरुचिपूर्ण लोकेशन फिल्म को गति देते हैं. गीत कर्णप्रिय हैं. वाराणसी के घाट, कैम्पस की बिंदास ज़िन्दगी और एक संस्कारवादी हिन्दू माता-पिता तथा उनकी 'मॉर्डन' बेटी के बीच के टकराव का अच्छा चित्रण निर्देशक विनोद तिवारी ने किया है. कहानी लिखी है वंदना तिवारी ने. फिल्म ये बताने में सफल है कि 'लव जिहाद' अब हिंदूवादियों की एक राजनीतिक फेंटेसी मात्र नहीं, बल्कि ऐसी सच्चाई है जिससे समाज को लगातार दो-चार होना पड़ रहा है. यों तो प्यार और जिहाद दो कभी न मिलने वाले अलग-अलग किनारे जैसे लगते हैं, मगर मजहबी कट्टरता कई बार आदमी को इंसान बने नहीं रहने देती. धर्मान्धता में अपने मजहब के विस्तार के लिए कैसे प्रेम जैसी पवित्र भावना का दुरुपयोग हो सकता है, फिल्म इसे गहनता के साथ उकेरती है. फिल्म के डायलॉग और बेहतर हो सकते थे.''

''फिल्म द कन्वर्जन का सबसे सशक्त पक्ष है, हीरोइन का पात्र निभाने वाली अभिनेत्री का अभिनय. मुझे नहीं मालूम कि अभिनेत्री विंध्य तिवारी ने इससे पहले कौन से फिल्म की है. मगर बाप रे बाप क्या अभिनय क्षमता है इस अभिनेत्री में. एक ही किरदार में अनेक कठिन भाव बड़ी कुशलता के साथ उसने निभाए हैं. एक बिंदास भरी उत्श्रंखलता से लेकर असहनीय अत्याचार और दर्द सहने वाली नायिका का सशक्त अभिनय विंध्य तिवारी ने किया है. सच मानिए तो हीरोइन की शुरुआती एंट्री इतनी अधिक प्रभावित नहीं करती पर जैसे फिल्म आगे बढ़ती है वैसे ही श्रृंगार, करुणा, भय, छल, क्रोध और रौद्र आदि कई जटिल भावों को वे बड़ी सहजता से निभाती नज़र आतीं हैं. फिल्म के कई दृश्य बहुत भावपूर्ण है. मुझे सबसे सबसे अधिक मार्मिक दृश्य लगता है कि जब फिल्म में साक्षी बनी अभिनेत्री निकाह के समय अपना नाम बदलने को मज़बूर होती है. जिस गहराई के साथ सिर्फ अपनी आंखों के ज़रिए अपने साथ हुए अनजाने छल को विंध्य अभिनीत करती हैं, वह उनकी अभिनय क्षमता का नमूना है. हलाला की घृणित क्रूरता विचलित कर देने वाली है.''

''निर्देशक की दाद देनी पड़ेगी कि वे इस दौरान आम मुम्बईया फिल्मों की तरह सेक्स दिखाने के लालच से बचे रहे. आप अपनी जवान होती बेटी के साथ फिल्म को देखने में असहज नहीं होते. बबलू शेख की भूमिका में प्रतीक शुक्ला ने भी जोरदार अभिनय किया है. कुल मिलाकर एक नाज़ुक विषय पर बनी एक सशक्त फिल्म है- द कन्वर्जन. मुद्दा विवादास्पद होने के साथ-साथ समीचीन भी है. फिल्म पर राजनीति होना भी अवश्यम्भावी है. निर्देशक विनोद तिवारी ने शुरू में बताया ही था कि उनकी फिल्म महीनों सेंसर बोर्ड में लटकी रही थी. देखा जाए तो मजहब, राजनीति, विवाद और स्त्री विमर्श- ये सब मिलकर बॉक्स ऑफिस पर इसकी सफलता की कहानी अभी से कह रहे हैं.''

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