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Updated: 06 जून, 2021 09:16 PM
मुकेश कुमार गजेंद्र
मुकेश कुमार गजेंद्र
  @mukesh.k.gajendra
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अक्सर देखा गया है कि प्रोफेशनल लाइफ में सफल व्यक्ति की पर्सनल लाइफ ठीक नहीं होती. कई एक बेहतरीन अफसर या राजनेता अपने घर में पति और पिता की भूमिका में फ्लॉप साबित होता है. लेकिन कुछ लोगों ने इस बात को झूठा भी साबित किया है. ये लोग अपनी प्रोफेशनल लाइफ की तरह अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारियों को भी बूखबी निभाते रहे हैं. ऐसे ही दिग्गज लोगों की फेहरिस्त में शानदार अभिनेता और राजनेता रहे सुनील दत्त का नाम शामिल है. दत्त साहब रुपहले पर्दे पर जितने बेहतरीन कलाकार थे, संसद में भी उतने ही संवेदनशील राजनेता और समाज सेवा में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाले समाजसेवी थे. वो अपने परिवार के लिए एक मजबूत अभिभावक, पत्नी के लिए सच्चे प्रेमी और जिम्मेदार पति और बच्चों के लिए एक अनुशासित पिता थे.

हिंदी सिनेमा के महान अभिनेता सुनील दत्त की आज बर्थ एनिवर्सरी है. 6 जून 1929 को पाकिस्तान स्थित झेलम में पैदा हुए दत्त साहब का असली नाम बलराज था. उनकी छोटी उम्र में पिता की मृत्यु, देश के विभाजन और मां के संघर्ष ने बचपन में ही जिम्मेदार बना दिया था. पाकिस्तान से भारत आने के बाद उन्होंने लखनऊ को अपना ठिकाना बनाया. वहां मां के साथ रहने लगे. लेकिन आगे की पढ़ाई और नौकरी के लिए साल 1955 में मुंबई चले आए. अपना गुजारा करने के लिए बस कंडक्टर की नौकरी करनी पड़ी. लेकिन ऊर्दू जुबान और अच्छी आवाज की वजह से एक रेडियो कंपनी में नौकरी मिल गई. वो रेडियो सिलोन में बतौर प्रजेंटेटर काम करने लगे. लेकिन उनके साथ हुई एक घटना ने उनकी जिंदगी बदल दी और वो फिल्मी दुनिया के चमकते सितारे बन गए.

दत्त साहब के साथ वो कौन सी घटना घटी थी? वो फिल्मी दुनिया के चमकते सितारे कैसे बने थे? उनकी सच्ची लव स्टोरी क्या है? वो राजनीति में कैसे आए? बतौर अभिनेता, राजनेता, पिता, प्रेमी और पति वो कैसे थे? उनकी जिंदगी से हमें क्या और क्यों सीख लेनी चाहिए? आइए इन सभी के बारे में जानते हैं...

1_650_060621085523.jpgसुनील दत्त अपनी पत्नी नर्गिस और बच्चों संजय दत्त, प्रिया दत्त और नम्रता दत्त के साथ.

एक अभिनेता के रूप में...

रेडियो सिलोन में काम के दौरान साल 1953 में बलराज (सुनील दत्त का असली नाम) की फिल्म निर्देशक रमेश सहगल से मुलाकात हुई थी. तब वो सहगल साहब को बहुत पसंद आए थे. उन्होंने उनको अपनी अपकमिंग फिल्म रेलवे प्लेटफॉर्म में लेने की इच्छा जताई, तो दत्त साहब तुरंत तैयार हो गए. इस तरह उनको बॉलीवुड में पहला ब्रेक मिला. ये फिल्म साल 1955 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म से बलराज को एक नए नाम से पहचान मिली, 'सुनील दत्त'. नाम बदलने का ये काम रमेश सहगल ने ही किया था, ताकि उस दौर के दिग्गज अभिनेता बलराज साहनी के साथ नाम के टकराव से बचा जा सके. इसके बाद साल 1956 में सुनील दत्त को पता चला कि महबूब खान 'मदर इंडिया' नामक एक फिल्म बना रहे हैं. इसमें नर्गिस पहले से ही बतौर हीरोइन फाइनल हो चुकी हैं. हीरो की तलाश जारी है. इसके लिए ऑडिशन हो रहे हैं.

सुनील दत्त बिना देर किए वहां पहुंच गए. हालांकि, महबूब जब स्टारकास्ट फाइनल कर रहे थे तो उनके दिमाग में पहला नाम दिलीप कुमार का था. लेकिन नर्गिस ने इस पर आपत्ति जता दी. उनका कहना था कि इतनी फिल्मों में वो दिलीप कुमार की प्रेमिका बनी है कि लोग उनके मां के किरदार में स्वीकार नहीं कर पाएंगे. इसका असर फिल्म पर भी पड़ेगा. महबूब साहब को बात समझ आ गई. इसके बाद नए कलाकारों का ऑडिशन हुआ. इसमें सुनील दत्त की एक्टिंग महबूब और नर्गिस दोनों को बहुत पसंद आई. इस तरह फिल्म मदर इंडिया में सुनील दत्त की एंट्री हो गई. इस फिल्म की रिलीज के बाद सुनील दत्त रातों-रात सुपर स्टार बन गए. उनका बिरजू का किरदार बहुत पॉपुलर हुआ. फिल्म ने देश में तो कई अवॉर्ड जीते ही, ऑस्कर के लिए भी नामित हो गई. इसके बाद सुनील दत्त के सामने फिल्मों की लाइन लग गई.

इसके बाद 1950 और 1960 के दशक में कई सफल फिल्मों में अभिनय करना जारी रखा. इसमें साधना (1958), इंसान जाग उठा (1959), सुजाता (1959), मुझे जीने दो (1963), खानदान (1965), मेरा साया (1966), पड़ोसन (1967), गुमराह (1963), वक्त (1965) और हमराज़ (1967) जैसी फिल्में शामिल हैं. दत्त साहब बेहतरीन अभिनेता के साथ ही कुशल निर्माता और निर्देशक भी थे. फिल्म इंडस्ट्री के लिए उनके योगदान को देखते हुए कई अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था. इनमें साल 1963 में फिल्म मुझे जीने दो के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार, 1964 में फिल्म यादों के लिए सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, साल 1965 में फिल्म खानदानी के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार, साल 1968 में पद्म श्री पुरस्कार, साल 1995 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, 1998 में राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार, 1999 में स्क्रीन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड और 2001 में ज़ी सिने लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड शामिल है.

एक प्रेमी और पति के रूप में...

रेडियो सिलोन में बतौर अनाउंसर काम करते हुए सुनील दत्त को एक दिन पता चला कि एक बहुत बड़ी एक्ट्रेस स्टूडियो में आ रही हैं, जिनका इंटरव्यू उनको लेना है. नाम पता चला, तो वे बहुत खुश हुए, क्योंकि दत्त साहब एक्ट्रेस नर्गिस के बहुत बड़े फैन थे. लेकिन हैरानी की बात ये कि नर्गिस का इंटरव्यू लेने के दौरान उनके मुंह से एक शब्द तक नहीं निकला. यहां तक कि इस इंटरव्यू को कैंसिल करना पड़ गया. बहुत मुश्किल से नौकरी बच पाई. लेकिन इस घटना ने नर्गिस के एक और दीवाने से दुनिया को परिचय करा दिया था. नर्गिस जैसे सितारे का क्या उनके लिए तो ऐसी घटनाएं आम थीं, लेकिन सुनील दत्त उनसे मोहब्बत कर बैठे थे. इसके बाद फिल्म दो बिघा के सेट पर नर्गिस से उनकी दूसरी मुलाकात हुई. तीसरी मुलाकात फिल्म मदर इंडिया के ऑडिशन में हुई. फिल्म में उन्होंने नर्गिस के बिगड़ैल-गुस्सैल बेटे का किरदार निभाया था. इस फिल्म की शूटिंग के दौरान घटी दो घटनाओं ने दोनों को बहुत करीब ला दिया. पहली घटना सेट पर घटी. दरअसल, हुआ ये कि गुजरात के बिलिमोर गांव में फिल्म 'मदर इंडिया' का सेट लगा हुआ था. वहां एक सीन को फिल्माए जाने के लिए चारों ओर पुआल बिछाए गए थे. पुआलों में आग लगा दी गई.

देखते-देखते आग चारों ओर फैल गई. अचानक एक शोर उठी. आवाज आई कि फिल्म की हीरोइन नर्गिस आग में फंस गई हैं. सुनील दत्त ने जैसे ही ये बात सुनी अपनी जान पर खेलकर दहकते अंगारों के बीच कूद गए. बहुत मुश्किल से उन्होंने नर्गिस की जान बचाई. उन्होंने नर्गिस को तो बचा लिया लेकिन खुद बहुत बुरी तरह जल गए. इतने ज़्यादा जल गए कि वहीं बार-बार बेहोश होने लगे. उनको तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया. कहते हैं कि सुनील जितने दिन अस्पताल में भर्ती रहे, नर्गिस उनसे मिलने रोज आती रहीं. दोनों के बीच खूब बातें हुआ करती थीं. बातों और मुलाकातों ने नर्गिस के मन में इश्क का बीज बो दिया. उसी दौरान दूसरी घटना घटी. सुनील दत्त की छोटी बहन अपनी एक साल की बच्ची के साथ उनके घर रहा करती थीं. एक दिन पता चला कि उनको ग्लैंड हो गया है. इसे लेकर सुनील परेशान हो गए.

शूटिंग के वक्त भी उदास से रहने लगे. उनको समझ नहीं आ रहा था कि बहन का इलाज कैसे कराया जाए. सेट पर किसी ने पूछा तो उन्होंने अपने दिल की बात बता दी. अपन मन हल्का करने के लिए उस रोज शूटिंग के बाद वो अपने एक दोस्त के घर चले गए. देर रात जब घर वापस लौटे तो बहन ने बताया कि नर्गिस जी आई थीं. सुनील हैरान रह गए. बहन ने बताया कि नर्गिस उनको लेकर डॉक्टर के पास गई थीं. तीन दिन बाद ऑपरेशन की डेट मिली है. यहां तक कि नर्गिस ने यह भी कहा कि जब तक सुनील की बहन अस्पताल में रहेंगी वो उनकी एक साल की बेटी को अपने साथ रखेंगी. इस घटना ने सुनील दत्त का दिल जीत लिया. उनको लगा वो जैसी लाइफ पार्टनर चाहते थे, वैसी ही नर्गिस हैं. एक दिन उन्होंने एक्ट्रेस ड्राइवर को हटाकर खुद कार ड्राइव करने लगे. रास्ते में कार के अंदर नर्गिस को प्रपोज कर दिया.

उनसे बोले कि क्या वो शादी करना चाहेंगी? नर्गिस कुछ नहीं बोलीं. सुनील दत्त ने सोच लिया कि यदि उन्होंने इंकार कर दिया तो वो मुंबई छोड़कर गांव चले जाएंगे. वहां खेती करेंगे. कुछ दिन बाद उनकी बहन ने उनको बधाई दी, तो वे कारण पूछे. बहन ने बताया कि नर्गिस ने तो हां कर दिया है. सुनील दत्त से शादी के लिए तैयार हो गई हैं. अब समस्या आई कि मां से कैसे इजाजत ली जाए. सुनील की मां थोड़े पुराने ख्यालात की थीं. उनसे जब एक्टर ने अपनी शादी के लिए इजाजत मांगी तो उन्होंने कहा, 'सुनील तुम आज जो भी हो खुद की बदौलत हो, इसलिए अपने जीवन का अहम डिसिजीन भी खुद ही करो.' बस फिर क्या था सुनील-नर्गिस के मन में खुशी की लहर दौड़ गई. दोनों कलाकारों ने शादी कर ली. नर्गिस प्यार से सुनील को बिरजू कहा करती थीं. फिल्म मदर इंडिया में सुनील के किरदार के नाम बिरजू ही था. नर्गिस को जब कैंसर हुआ तो सुनील दत्त ने उनके इलाज के लिए भारत से अमेरिका एक कर दिया था. उनके आखिरी समय में यहां तक कि डॉक्टरों के मना करने के बाद उनका वेंटिलेटर सपोर्ट नहीं हटाने दिया, ताकि कुछ पल और नर्गिस को जिंदा रख सकें. वो नर्गिस से बहुत प्यार करते थे. अंतिम वक्त तक उनका साथ दिया था.

एक राजनेता के रूप में...

सुनील दत्त फिल्मी दुनिया से राजनीति के क्षेत्र में आए अकेले ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने आदर्श कायम किया था. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत साल 1984 से की थी. मुंबई की उत्तर-पश्चिम लोकसभा सीट से उन्हें सफलता मिली. उन्हें कांग्रेस पार्टी से वहां का सांसद चुना गया. विभाजन की त्रासदी झेलने वाले दत्त साहब ताउम्र हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के पैरोकार बने रहे. विभाजन के दौरान हुए दंगों में उनके एक मुस्लिम दोस्त ने ही उनकी और परिवार की जान बचाई थी. ये बात उनके दिल में घर कर गई थी. वो धर्मभेद में विश्वास नहीं करते थे. धर्मनिरपेक्षता, शांति और सद्भाव जैसे जीवन मूल्यों के प्रति जीवन भर समर्पित रहने वाले सुनील दत्त राजीव गांधी के कहने पर राजनीति में आए थे. उन्हें लगा कि राजनीति के माध्यम से वो अपना संदेश लोगों तक बखूबी पहुंचा सकते हैं. इन सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अपनी राजनीतिक संसाधनों का खूब इस्तेमाल भी किया. देश में अभिनेता से राजनेता बने किसी दूसरे शख़्स में ऐसी खासियत शायद ही होगी. 1991 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद जब मुंबई में दंगे भड़के, तब सुनील दत्त ने लोगों की खूब मदद की थी. यहां तक कि दुखी होकर संसद से इस्तीफा दे दिया था.

इतना ही नहीं सुनील दत्त शांति और सामाजिक सद्भाव को लेकर लंबी-लंबी पदयात्राएं करने के लिए जाने थे. इन सभी यात्राओं में उनकी बेटी प्रिया दत्त जरूर उनके साथ होती थीं. साल 1987 में उन्होंने पंजाब में उग्रवाद की समस्या के समाधान के लिए मुंबई से अमृतसर के स्वर्ण मंदिर तक 2000 किलोमीटर की पैदल यात्रा की थी. इसके अगले साल 1988 में उन्होंने जापान के नागासाकी से हिरोशिमा तक विश्व शांति और परमाणु हथियारों को नष्ट करने को लेकर 500 किलोमीटर की पैदल यात्रा की थी. बताते हैं कि दत्त साहब कहा करते थे कि जो पैसा हम हथियारों पर खर्च करते हैं, वो लोगों को पानी मुहैया कराने, सर्वशिक्षा, मेडिकल सुविधाएं और नौजवानों को रोजगार देने पर खर्च कर सकते हैं. साल 1990 में उन्होंने भागलपुर दंगे के बाद सांप्रदायिक शांति कायम करने के लिए वहां का दौरा किया था. इसके बाद उन्होंने धार्मिक सद्भाव बनाने के लिए फैज़ाबाद से अयोध्या तक की पदयात्रा की थी. सामाजिक स्तर पर सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए उनके नेतृत्व में कांग्रेस के अंदर सद्भावना के सिपाही नाम से एक विंग तैयार किया गया था. उनके जाने के बाद उनकी इस मुहिम का कोई नामलेवा नहीं रहा. वो मनोहन सरकार में कैबिनेट मंत्री भी थे.

एक पिता के रूप में...

सुनील दत्त के तीन बच्चे हैं, संजय दत्त, प्रिया दत्त और नम्रता दत्त. संजय सबसे बड़े हैं. पत्नी नर्गिस के निधन के वक्त संजू को छोड़कर दोनों बच्चियां छोटी थीं. संजू जवान थे, लेकिन वो नशे की आगोश में आ चुके थे. शराब, सिगरेट और यहां तक कि ड्रग्स भी लेने लगे. बतौर पिता दत्त साहब ने बहुत मजबूती से संजय दत्त का साथ दिया था. ड्रग्स की लत छुड़ाने से लेकर मुंबई बम धमाके में उनका नाम आने के बाद उनके लिए पैरवी करने तक, उन्होंने दिन-रात एक कर दिया था. यहां तक कि अपने राजनीतिक विरोधी शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से तक मिलने गए, ताकि किसी तरह संजू को निर्दोष साबित कर दिया जाए. हालांकि, ये मामला कोर्ट में चला और संजय को सजा हुई. अपनी सजा काटने के बाद अब वो जेल से बाहर अपनी नॉर्मल जिंदगी बीता रहे हैं. लेकिन एक वक्त था जब संजय दत्त को लेकर वो बहुत चिंतित रहा करते थे. सुनील दत्त ने ही अपने बेटे संजय दत्त को फिल्म 'रॉकी' से लॉन्च किया था. इस फिल्म में उन्होंने पहली बार बतौर डायरेक्टर काम किया था.

बताया जाता है कि दत्त साहब में एक ही सबसे बड़ी कमी थी, उनका गुस्सा. फिल्म मदर इंडिया का 'बिरजू' जितना गुस्सैल था, कुछ वैसे ही वो थे. उनका ये नेचर ही उनके किरदार को नेचुरल बना दिया था. सेट से लेकर घर तो वो बिल्कुल सख्त और अनुशासन के बिल्कुल पाबंद थे. काम के वक्त किसी भी तरह मसखरी पसंद नहीं करते थे. यही वजह है कि उनके बेटे संजय दत्त उनके निर्देशन में बनने वाली फिल्मों में काम करने से कतराते थे. एक किस्सा है. दत्त साहब अपनी छोटी बेटी नम्रता को स्विमिंग सीखाने के लिए मुंबई के सैंड एंड ब्लू होटल ले जाते थे. एक महीने बीत गए, जब नम्रता ने स्विमिंग नहीं सीखा, तो उनको गुस्सा आ गया. उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और 10 फीट गहरे पुल में ढकेल दिया. उनको लगा कि वो तैरने की कोशिश करेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वो पानी में नीचे चली गई. आनन-फानन में दत्त साहब ने उनको बाहर निकाला. उन्होंने पूछा, 'तुमने तैरने की कोशिश क्यों नहीं की थी. हाथ-पैर तो चलाना चाहिए था.' इस पर नम्रता बोली, 'जब आपने मुझे मारने के लिए पानी में फेंक दिया, तो मैं तैरने की कोशिश क्यों करूं?' इस बात को सुनकर वो दंग रह गए. उस दिन तय कर लिया कि अब उसे स्विमिंग नहीं सिखाएंगे.

सुनील दत्त का उनके 76वें जन्मदिन से कुछ दिन पहले 25 मई 2005 को उनके मुंबई स्थित घर पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था.

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लेखक

मुकेश कुमार गजेंद्र मुकेश कुमार गजेंद्र @mukesh.k.gajendra

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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