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Updated: 30 जुलाई, 2021 07:20 PM
मुकेश कुमार गजेंद्र
मुकेश कुमार गजेंद्र
  @mukesh.k.gajendra
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ईश्वर में आस्था रखने वाले अक्सर कहते हैं कि धरती पर जब भी कोई बड़ा संकट आता है, तो भगवान खुद अवतार लेकर लोगों की रक्षा करते हैं. लेकिन इस बार जब कोरोना महामारी के रूप में महासंकट आया तो लगा ईश्वर ने अपने दूत को लोगों की रक्षा के लिए भेजा है. ऐसा दूत जो इंसान होते हुए भी भगवान के काम कर रहा है. जब पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ था. लोग पैदल हजारों किलोमीटर की यात्रा करके अपनी कर्मभूमि से जन्मभूमि की ओर कूच कर रहे थे. बच्चे और बूढ़े भूख से बिलबिला रहे थे. रास्ते में बेजान हुए लोगों की जान जा रही थी. सरकारें मूक होकर बस तमाशा देख रही थीं. उस वक्त रुपहले पर्दे का एक विलेन लोगों के लिए हीरो बनकर आया. एक सुपरहीरो की तरह लोगों की मदद की. उनको घर भेजा. खाना खिलाया. जी हां, हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद की, जिनका आज जन्मदिन है.

फिल्म अभिनेता सोनू सूद कुछ लोगों के लिए धरती के भगवान बन गए हैं. उनसे मदद पाए लोग मंदिर में उनकी मूर्ति की स्थापना कर रहे हैं. अपने नवजात बच्चे का नाम सोनू रखकर उनके प्रति आभार प्रकट कर रहे हैं. कई लोग तो हजारों किमी साइकिल चलाकर सोनू से महज एक मुलाकात के लिए मुंबई आ रहे हैं. उनके घर के बाहर लगी लोगों की भीड़ इस बात की तस्दीक करती है कि लोगों को अब उनसे बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं. जब सोनू को कोरोना संक्रमण हुआ, तो उस वक्त झारखंड के रहने वाले पप्पू यादव ने उनकी सलामती के लिए नवरात्रि का व्रत रखा था. पप्पू उनको भगवान मानते हैं. उनका कहना है कि यदि सोनू उनकी मदद नहीं करते, तो वो कैंसर जैसी बीमारी का कभी इलाज नहीं करा पाते और ना ही जीवित रह पाते. उनको नया जीवन उनकी वजह से मिला है. उन्होंने अपने मंदिर में सोनू की तस्वीर भी लगा रखी है.

sonu-650_073021060625.jpgपैसा कमाकर धनकुबेर तो बहुत से लोग हो गए, लेकिन अपनी कर्मों की बदौलत जीते जी भगवान सोनू सूद ही बन पाए हैं.

बड़प्पन तो देखिए, लोगों से इस कदर प्यार और सम्मान मिलने के बाद भी सोनू सूद खुद को कोई मसीहा नहीं मानते हैं. उनका कहना है कि उनके माता-पिता से मिले संस्कारों की वजह से वो लोगों की मदद के लिए आतुर रहते हैं. उन्होंने संकटग्रस्त लोगों की मदद के दौरान हुए अनुभवों पर 'मैं मसीहा नहीं' शीर्षक से एक किताब भी लिखी है. इस किताब की भूमिका में ही यह साफ कर दिया गया है कि यह आत्मश्लाघा की कहानी नहीं है और न ही उनके जीवन में यह सब कुछ अचानक हुआ.

सोनू बताते हैं कि उनके माता-पिता ने उनके अंदर यह बुनियादी सोच पैदा की कि खुद को तब तक किसी लायक नहीं समझना चाहिए, जब तक अपने से कमतर हालात वाले किसी व्यक्ति की मदद न कर दो. उनकी इस सीख के बावजूद जीवन में कभी उन्हें यह महसूस नहीं हुआ कि वे इतने बड़े अभियान का हिस्सा बनेंगे. अब इस अभियान का नेतृत्व करने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि बहुत-सी बाहरी शक्तियां हमारे रास्तों का निर्माण करती हैं. उनकी किताब की सबसे बड़ी सीख यही है.

हजारों लोगों को उनके घर पहुंचाया

लॉकडाउन के दौर में शुरू हुई सोनू सूद की मदद की मुहिम आज भी जारी है. किसी का इलाज करवाना हो, किसी के स्‍कूल की फीस भरनी हो, किसी को रोजगार दिलवाना हो या फिर किसी को सिर पर छत की जरूरत हो. सोनू सूद आज भी मदद के लिए एक पैर पर खड़े दिखते हैं. लॉकडाउन पीरियड में करीब 1.5 लाख से अध‍िक प्रवासियों को उनके घर पहुंचाने का काम किया है. बस, ट्रेन से लेकर हवाई जहाज तक का इस्तेमाल करके उन्होंने बेहाल लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाया है. महामारी के वक्त मचे हाहाकार के समय एक शख्स किसी सरकार या संस्था से बढ़कर सुनियोजित तरीके से लोगों की मदद कर पाएगा, ऐसा किसी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, लेकिन सोनू सूद ने कर दिखाया. इस पर सोनू कहते हैं, 'उस वक्त मेरे घर के बाहर 2500 लोग लाइन में खड़े रहते थे. मैं अभी तक 1.5 लाख से अधिक लोगों को उनके घर भेज पाया हूं. जबकि विदेशों में फंसे 6700 लोगों को हम अपने देश लेकर आए हैं. मदद का ये सिलसिला ऐसे ही आगे भी जारी रहेगा.'

हेल्थ वर्कर्स के लिए खोला होटल

प्रवासियों की मदद के साथ ही सोनू सूद ने हमारे कोरोना वॉरियर्स यानि हेल्थ वर्कर्स के लिए भी मदद का हाथ बढ़ाया था. एक्टर ने उनके लिए मुंबई के जूहू में स्थित अपना होटल खोल दिया, जिससे सभी स्वास्थ्यकर्मी आकर ठहर सकें. अपनी इस पहल पर सोनू ने कहा था, 'हमारे देश के डॉक्टर, नर्स और पैरा-मेडिकल कर्मचारी लगातार लोगों को बचाने के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं, उनके लिए यह करना मेरे लिए काफी सम्मान की बात है. वे मुंबई के विभिन्न हिस्सों से आते हैं और उन्हें आराम करने के लिए जगह की आवश्यकता होती है. हमने पहले ही नगरपालिका और निजी अस्पतालों से संपर्क किया है और उन्हें सुविधा के बारे में सूचित किया है. इस मुश्किल दौर में हम लोगों को राष्ट्रीय हीरो का समर्थन करने की जरूरत है, जो रात-दिन बिना थके हमारे लिए काम कर रहे हैं. इसलिए मैं स्वास्थ्यकर्मियों के लिए जूहू में स्थित अपना होटल खोल रहा हूं. इन हीरो द्वारा किये जा रहे इस काम को ध्यान में रखते हुए हम उनके लिए इतना तो कर ही सकते हैं.'

शक्ति अन्नदानम: भूखे को भोजन

लॉकडाउन में सबसे बड़ी मार गरीबों के पेट पर पड़ी थी. रोजाना कमाई करके अपना जीवन यापन करने वाले लोग दो जून की रोटी के लिए तरसने लगे. ऐसे में सोनू सूद ने जरूरतमंदों के लिए भोजन बांटने की पहल की शुरुआत की थी. उन्होंने ये पहल अपने पिता के नाम पर लॉन्च किए शक्ति आनन्दम के जरिए की थी. इसके तहत मुंबई में रोजाना करीब 45 हजार लोगों को भोजन कराया गया. अपनी इस पहल के बारे में सोनू ने बताया था, 'हम कोरोना वायरस के खिलाफ इस कठिन समय में एक साथ हैं. हम में से कुछ लोग भोजन और आश्रय पाकर खुश हो जाते हैं, लेकिन कई ऐसे भी हैं जिन्होंने कई दिनों से भोजन नहीं किया है. यह उनके लिए वास्तव में कठिन है. इन लोगों की मदद करने के लिए मैंने अपने पिता के नाम पर एक विशेष भोजन और राशन अभियान शुरू किया है, जिसका नाम शक्ति अन्नदानम है.'

बेरोजगारों के लिए 'प्रवासी रोजगार'

कोरोना संकट काल में लॉकडाउन से जिन लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा, उनमें मजदूर, खासकर प्रवासी मजदूरों की संख्या सबसे ज्यादा हैं. लॉकडाउन की वजह से काम-धंधा अचानक रुक गया और इन दिहाड़ी मजदूरों की आय का जरिया भी अचानक से खत्म हो गया. ऐसे वक्त में फिल्म एक्टर सोनू सूद प्रवासी मजदूरों के लिए मसीहा बनकर सामने आए. उन्होंने बेरोजगार मजदूरों के लिए प्रवासी रोजगार मुहिम शुरू की है. इसके लिए वेब पोर्टल और मोबाइल ऐप लॉन्च किया है, जिसकी मदद से वह उन मजदूरों को नौकरी दिलाने में हरसंभव मदद करेंगे. यह ऐसा प्रयास है, अगर इसका लॉन्ग टर्म असर दिख गया तो वाकई आने वाले समय में सोनू सूद की पॉप्युलैरिटी और उनकी मजदूरों के मसीहा वाली छवि लाखों लोगों के मन में ऐसे इंसान के रूप में घर करेगी, जिसने वाकई संकट की स्थिति में लाखों लोगों की जिंदगी संवारी. सिंगापुर की निवेश कंपनी Temasek’s-GoodWorker ने सोनू सूद द्वारा लॉन्च किए गए जॉब पोर्टल में 250 करोड़ रुपये का निवेश किया है.

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लेखक

मुकेश कुमार गजेंद्र मुकेश कुमार गजेंद्र @mukesh.k.gajendra

लेखक इंडिया टुडे ग्रुप में सीनियर असिस्टेंट एडिटर हैं.

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