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Updated: 20 नवम्बर, 2022 06:12 PM
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अभिषेक पाठक के निर्देशन में आई थ्रिलर ड्रामा दृश्यम 2 को एक्टर्स मूवी भी करार दिया जा रहा है. एक ऐसी फिल्म जिसे तमाम किरदारों को जीने वाले एक्टर्स के उम्दा अभिनय ने जीवंत कर दिया हो. जहां भले मुख्य एक्टर्स हों मगर दूसरे किरदारों की अहमियत है. यानी ऐसी फिल्म जिसमें कथा का केंद्रीय पात्र होने के बावजूद कथा को आगे बढ़ाने वाले दूसरे किरदार पूरी मजबूती से उभरकर आते हैं. उन्हें या तो उभरने का स्वाभाविक मौका दिया गया या फिर उन्होंने जीवंत अभिनय से अपने छोटे-छोटे किरदारों को आकर्षक बना दिया. वे सभी किरदार सिनेमाघर से बाहर निकलने वाले दर्शकों के दिलों दिमाग में रच बस चुके हैं.

दृश्यम 2 के लगभग सभी किरदार ऐसे ही हैं. वे चाहे दो चार फ्रेम में ही नजर आए हों लेकिन अपनी पूर्णता में दिखते हैं. और बॉलीवुड की मुख्यधारा में जिस तरह से किरदारों को आकर्षक बनाने के लिए गढ़ा जाता है उससे पूरी तरह भिन्न हैं. बावजूद बॉलीवुड के रूटीन किरदारों से ज्यादा मौलिक नजर आते हैं. दृश्यम 2 का मुख्य आकर्षण विजय सलगांवकर है. यानी अजय देवगन. दूसरा बड़ा आकर्षण इस बार आईजी तरुण अहलावत है. यानी अक्षय खन्ना. लेकिन अन्य किरदार भले बड़े ना हों, उन्हें अलग करते ही दृश्यम 2 का जादू टूट जाएगा. वह चाहे एक छोटा सा होटल चलाने वाले मार्टिन अंकल ही क्यों ना हों. श्रिया सरन भी उनमें से एक हैं. बावजूद कि उनका किरदार कहानी में अहम बिंदु है. उन्होंने विजय सलगांवकर की पत्नी नंदिनी का किरदार निभाया है.

drishyam 2दृश्यम 2 में श्रिया सरन और इशिता दत्ता.

दृश्यम में सबसे मुश्किल किरदार श्रिया सरन का है उसे ऐसे समझिए

श्रिया एक बेहतरीन अभिनेत्री हैं. दक्षिण की कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों में काम कर चुकी हैं. दो चार साल के अंतराल पर हिंदी में भी दिख जाती हैं. दृश्यम फ्रेंचाइजी का एक जरूरी हिस्सा बन चुकी हैं. और फिल्म में उनके किरदार को देखकर एक सेकेंड भी नहीं लगता कि उसे कोई दूसरा कर पाएगा. एक तरह से देखा जाए तो श्रिया ने दृश्यम फ्रेंचाइजी का सबसे टिपिकल किरदार बखूबी जिया है. एक ऐसा किरदार जिसे समझना सबके बस की बात नहीं. उनका किरदार कई परतों में हैं, और एक परंपरागत भारतीय स्त्री की छवि को परदे पर उतार देती हैं. वे कम पढ़ी-लिखी हैं, पति पर अटूट भरोसा है, उपेक्षा से दुखी भी हैं, पति भी उपेक्षा करता दिखता है एकाध बार. लेकिन वे शांत रहती हैं. पति उन्हें प्यार भी करता है. आशंकाओं से घिरी दिखती हैं, परेशान रहती हैं और घबराई नजर आती हैं. बावजूद उनमें अपने बच्चों को प्रोटेक्ट करने के लिए अचानक से पता नहीं कहां से ताकत जुटा लेती हैं.

किसी परिवार में अगर कोई अनहोनी हो जाए तो हकीकत में उस घर की अगुआ महिला के चेहरे और हाव भाव में जो कुछ भी दिख सकता है- वह सब श्रिया के किरदार में नजर आता है. उनके किरदार के लिए तड़क-भड़क की कोई जरूरत नहीं थी. भला अभिनय के लिए तड़क-भड़क का क्या ही काम. मेकर्स ने उन्हें साड़ी में ही दिखाया. वह दो किशोर बेटियों की मां भी हैं. एक बेटी (इशिता दत्ता) गोंद ली हुई है और दूसरी ने गर्भ से जन्म लिया है. लेकिन कहीं भी एक पल के लिए नहीं लगता कि श्रिया अपने किरदार में फिट नहीं हैं. या उन्हें नंदिनी के रूप में ध्यान आकर्षित करने के लिए तड़क-भड़क की जरूरत थी. एक फिल्म में और सबसे मुश्किल किरदार में उन्होंने अपने लिए गुंजाइश बना ली और यह वाकई बहुत बड़ी बात है. अभिनय का कोई मास्टर ही ऐसा कर सकता है.

मसला पहनावे का नहीं, बल्कि चीजों को वैसे दिखाना है जैसे वह व्यापक समाज में है

बॉलीवुड की रूटीन फिल्मों में जब अभिनय के मायने खासकर, अभिनेत्रियों के लिहाज से बदल चुके हों- श्रिया समूचे बॉलीवुड को आइना दिखाती हैं. बॉलीवुड में अमूमन नायिकाओं की प्रस्तुति ग्लैमर गुड़िया के तौर पर ही की जाती है. मसला ड्रेस या नायिकाओं के पहनावे का नहीं है. असल में ग्लैमर गुड़िया के जरिए अभिनय नहीं अंग दिखाकर दर्शकों को आकर्षित करना है तो साड़ी पहनाने से परहेज होगा. और साड़ी पहनाना जरूरी भी लगा तो वहां गैरजरूरी अंग प्रदर्शन के लिए टिप टिप बरसा पानी जैसी शरारतें दिखेंगी. कुल मिलाकर साड़ी में एक स्त्री जिस तरह मौलिक दिखती है उसे हकीकत से उलट ही दिखाया जाएगा. या फिर दिखाएंगे ही नहीं. जबकि दक्षिण में हीरो धोती में और हीरोइन साड़ी में ख़ूबसूरत तो लगती ही है जानदार अभिनय भी करते नजर आते हैं.

दृश्यम 2 भी मलयाली रीमेक है. मूल फिल्म में मोहनलाल समेत तमाम किरदार लुंगी में ही नजर आते हैं. नंदिनी का किरदार वहां साड़ी में ही है बावजूद कि वह ईसाई है. असल में दक्षिण की ताकत उनकी फिल्मों में दिखने वाली स्थानीय सांस्कृतिक झलक ही है जो बॉलीवुड में जानबूझकर गायब की गई. वह भी फर्जी आधुनिकता के नाम पर. पश्चिम के गैरजरूरी अंधानुकरण के नाम पर. जबकि आधुनिकता सबसे संदिग्ध शब्द है. क्या साड़ी और लुंगी पहनने भर से कोई व्यक्ति पिछड़ा हो सकता है.

साड़ी में श्रिया सरन एक तरह से बॉलीवुड के तमाम फिल्म मेकर्स के गाल पर तमाचा भी जड़ रही हैं. हीरोइनों का कपड़ा बदल देने भर से पावरहाउस परफॉर्मेंस नहीं निकलता. किरदार को मौलिकता और वह जिस जमीन पर है- उसे पकड़ने से अभिनय जीवंत बनता है.

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