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Updated: 16 नवम्बर, 2018 02:50 PM
मनीष जैसल
मनीष जैसल
  @jaisal123
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लम्बे समय से यह देखा, समझा जा रहा है कि इंटरनेट की दुनिया में किसी का भी पहरा नही है. वहां हमें वह सब मिल सकता है जो तथाकथित सामाजिक धारणाओं, मान्यताओं के अनुरूप नहीं है. ऐसे में यह देखना भी अब जरूरी है कि इसकी वर्तमान स्थिति क्या है? सीधे तौर पर फिल्मों के माध्यम से इसे समझे तो पाएंगे कि जब जब सरकारी एजेंसियों ने आपत्तिजनक फिल्मों पर प्रतिबंध की बात की है, तब तब लोगों ने इंटरनेट का हवाला देकर अपना पक्ष मजबूत किया. हर तीसरा आदमी यह कहता मिल ही जाएगा कि इंटरनेट पर जब सब कुछ है तो किस बात का सरकारी प्रतिबंध.

अमेजन प्राइम, नेटफ़्लिक्स, कंटेंट, सेंसर  मुंबई के माफिया पर सीरीज सेक्रेड गेम्‍स का यह दृश्‍य आमतौर पर किसी टीवी सीरियल में देखा नहीं जा सकता, लेकिन नेटफ्लिक्‍स पर सब चलता है.

फिलहाल, हाल ही में एक गैर सरकारी संगठन जस्टिस फ़ॉर राइट्स ने आपत्तिजनक कंटेंट वाली फिल्मों को नेटफ़्लिक्स और अमेजन प्राईम से हटाने की बात कही है. इसको लेकर संगठन ने अदालत का सहारा लिया है. हालांकि यह तर्क भी सही है कि कोई भी व्यक्ति या संगठन जन भावनाओं के आहत होने या फिर उनसे बचने के लिए अदालती सहारा ले सकता है लेकिन इसके पीछे की राजनीति और सरकारी हस्तक्षेप को भी समझना जरूरी है.

इसके लिए सबसे पहले यह समझना होगा कि अमेजन प्राइम और नेटफ़्लिक्स जैसे ऑनलाइन मीडिया सर्विस प्रोवाइडर ने अपने बोल्ड विषयों के चलते दुनिया भर में अपनी पहुंच बनाई है. भारत के संदर्भ में यह इसलिए भी लोकप्रिय हो पाया क्योंकि यहां किसी भी प्रकार का सेंसर या प्रमाणीकरण जैसी पद्धति नहीं है, कोई भी व्यक्ति वहां किसी भी विषय पर अपनी राय दर्शकों तक पहुंचा सकता है. लेकिन बीते पांच सालों के सेन्सरशिप विवादों में जिस तरह एक पक्ष ने नेटफ़्लिक्स और अमेजन प्राइम का हवाला दे देकर अपनी बात को जायज ठहराया, इससे यही दोनों माध्यम अब निशाने पर आते हुए दिख रहे हैं.

सीधे तौर पर तो नहीं पर कहीं न कहीं इसमें सरकारों की भी मिली भगत मालूम देती है क्योंकि नान प्रॉफ़िट संगठन ने जिस तरह से इस मुद्दे को उठाया है उस पर उनकी ही खुद की साख पर कई गम्भीर सवाल खड़े होते हैं.

जस्टिस फ़ॉर राइट्स के लिए लड़ने वाला एक एनजीओ यह शायद भूल रहा है कि हर एक नागरिक का अभिव्यक्ति का अधिकार है जो उसे स्वतः संविधान से मिला है, वहीं दूसरी ओर आपत्तिजनक या फिर द्वेशपूर्ण अथवा किसी भी तरह का असंवैधानिक कंटेंट अगर फिल्मों या किसी विजुअल में है भी तो उसके लिए कोर्ट है. जो स्वतः संज्ञान ले सकता है. लेकिन उसके लिए एनजीओ सरकारी एजेंसी की तरह काम करे तो प्रश्न खड़े होंगे ही.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और फिल्म  सेन्सरशिप को लेकर लम्बें समय से एक बहस चली आ रही है जिसका सार्थक निष्कर्ष कब आ पाएगा इसका कोई पता नहीं. एक विकल्प के रूप में पनप रही ऑनलाइन स्ट्रीमिंग कम्पनी ने जिस तरह भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में एक बेहतर विकल्प दिया है उस पर भी पहरा डालने की एक कोशिश यहां होती दिख रही है. चूंकि सरकारें नहीं चाहती कि उनके विरुद्ध कभी कोई संदेश किसी माध्यम से कहा जाए, या फिर जिस समाज से उन्हें वोट बैंक की राजनीति करनी है वहां विजुअल को लेकर कोई विमर्श हो.

देश अभी भी विजुअल संचार को समझने में काफी पीछे है, नागिन देख कर नाचने वाले, हॉरर फिल्में देखकर दर्शकों को बुखार आने वाला यह देश इस माध्यम को गम्भीरता से समझने के बजाए उस पर बंदिशे ही लगाता जा रहा है. उसमें सरकारें कभी सीधे हस्तक्षेप करती दिखती हैं तो कभी ग़ैर सरकारी संगठनो के सहारे. पद्मावत जैसी फिल्मों में किसी खास जाती वर्ग सम्प्रदाय के समूह द्वारा जिस तरह एक माहौल शुरू किया गया बाद में राज्य सरकारों की उसमें सक्रीयता देखी गई यह इसका प्रबल उदाहरण पेश करती है.

इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री का इस्तेमाल किसी को परोसा नहीं जा रहा, जो देखना चाहता है उसे ही वह दिया जा रहा है. ऐसे में यह चुनाव उपभोक्ता को होना चाहिए कि वह क्या देखे, क्या खरीदे. समूह की राजनीति से एक बेहतर मिल रहे विकल्प पर पहरा डालने की एक कोशिश का पर्दाफ़ाश होना ही चाहिए.

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लेखक

मनीष जैसल मनीष जैसल @jaisal123

लेखक सिनेमा और फिल्म मेकिंग में पीएचडी कर रहे हैं, और समसामयिक मुद्दों के अलावा सिनेमा पर लिखते हैं.

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