मिथुन चक्रवर्ती का राजनीतिक सफर: वामपंथ, तृणमूल से लेकर भाजपा तक
मिथुन चक्रवर्ती बॉलीवुड की उन चुनिंदा शख्सियतों में शुमार हैं, जिनका न कोई फिल्मी बैकग्राउंड रहा और न ही इंडस्ट्री में कोई गॉडफादर, लेकिन फिर भी उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी मेहनत से एक अलग पहचान बनाई है. फिल्मों की तरह उनकी राजनीतिक यात्रा भी बहुत रोचक रही है.
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बॉलीवुड के 'डिस्को डांसर' मिथुन चक्रवर्ती भगवाधारी हो गए हैं. कोलकाता में आयोजित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में उन्होंने बीजेपी ज्वाइन कर ली. मिथुन की जिंदगी हमेशा से रोमांच से भरी रही है. बहुत कम लोग जानते हैं कि अभिनेता बनने से पहले वो एक नक्सली नेता थे. वामदल (LEFT) के प्रति उनका झुकाव सर्वविदित है. लेकिन बाद में ममता बनर्जी से प्रभावित होकर TMC में शामिल हो गए; और अब RSS प्रमुख मोहन भागवत से मिलने के बाद बीजेपी (RIGHT) का दामन थाम लिया है. इस तरह उनका सियासी सफर अल्ट्रा लेफ्ट से सेंटर लेफ्ट और अब राइट विंगर तक हो गया है.
70 वर्षीय मिथुन चक्रवर्ती का जन्म 16 जून, 1950 को कोलकाता में हुआ था. उनका असली नाम गौरांग चक्रवर्ती है. उन्होंने यह नाम कभी फिल्मों में इस्तेमाल नहीं किया है. मिथुन बॉलीवुड की उन शख्सियतों में शुमार हैं, जिनका न कोई फिल्मी बैकग्राउंड रहा और न ही इंडस्ट्री में कोई गॉडफादर, लेकिन फिर भी उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपनी मेहनत से एक अलग पहचान बनाई है. पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट FTII में दाखिला लेने से पहले मिथुन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के सदस्य थे. वे 60 के दशक में स्थापित हुए नक्सली आंदोलन में सक्रिय थे. उनको अर्बन नक्सल कहा जाता था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में मिथुन चक्रवर्ती ने बीजेपी ज्वाइन कर लिया.
उस दौर के लोकप्रिय नक्सली नेता रवि राजन उनके बहुत करीबी दोस्त थे. उनको मिथुन 'भा' कहकर पुकारते थे. इसका मतलब सबसे बड़ा रक्षक होता है. उसी समय उनके छोटे भाई की एक हादसे में मौत हो गई. उन्हें घर वापस लौटना पड़ा. लेकिन बंगाल में नक्सलियों पर पुलिस की सख्ती के कारण, उनको कई दिनों तक छिप कर रहना पड़ा. बहुत समय तक वो भगोड़ा बने रहे. इसी बीच परिवार के दबाव में आकर उन्होंने FTII में दाखिला ले लिया. लेकिन कई बार हमारे पिछले कर्म आगे चलते हैं. मिथुन के साथ भी वही हुआ. फिल्म इंडस्ट्री में उनके वाम समर्थक होने की बात पहले ही पहुंच गई.
मिथुन दा ने खुद एक बार बताया था, 'फिल्म इंडस्ट्री में और इसके बाहर के लोग कलकत्ता में नक्सली आंदोलन के साथ मेरी भागीदारी और नक्सलियों के नेता चारू मजूमदार के साथ मेरे करीबी संबंधों के बारे में जानते थे. मेरे परिवार में त्रासदी होने के बाद मैंने आंदोलन छोड़ दिया था, लेकिन नक्सली होने का लेबल मेरे साथ लगा रहा चाहे मैं जहां भी गया. वह पुणे में FTII हो या फिर बॉम्बे.' अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद मिथुन उस दौर के मशहूर लेखक और फिल्म निर्माता ख्वाजा अहमद अब्बास से मिले. उन्होंने साल 1980 में उन्हें अपनी फिल्म 'द नक्सलाइट' में लीड रोल की पेशकश कर दी.
अपनी जिस पहचान को छिपाने के लिए मिथुन चक्रवर्ती फिल्मों में आए, वही उनके सामने आकर खड़ी हो गई. वह इस ऑफर को स्वीकारने में हिचक रहे थे. उनको इस बात का डर था कि कहीं पुरानी यादें दोबारा ताजा न हो जाएं. मिथुन ने इसके बारे में कहा था, 'अब्बास साहब की वजह से मैं ये फिल्म करने के लिए प्रेरित हुआ. मुझे एक अभिनेता से ज्यादा एक डांसर और फाइटर के रूप में ब्रांडेड किया जा रहा था. यहां अब्बास साहब द्वारा निर्देशित एक फिल्म में एक नक्सली की भूमिका निभाने का मौका था, उनकी वजह से मैंने फिल्म में एक नक्सली के जीवन को जीने की चुनौती स्वीकार कर लिया.'
मिथुन ने फिल्मी करियर की शुरुआत 1976 में आई फिल्म 'मृगया' से की थी इस फिल्म में दमदार अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इसके बाद उन्होंने कई हिट फिल्में दी थी. इस दौरान उनका बंगाल से राजनीतिक कनेक्शन बना रहा. वो CPIM के नेता सुभास चक्रवर्ती के बहुत करीबी थे. साल 1986 में कलकत्ता के साल्ट लेक स्टेडियम में बाढ़ पीड़ितों के लिए फंड जुटाने के लिए मिथुन ने एक शो किया था. इससे CPIM काफी खुश थी. इस शो में अमिताभ बच्चन और रेखा भी आए थे. मिथुन के कहने पर मुख्यमंत्री ज्योति बसु भी शरीक हुए थे.
CPIM सरकार के दौरान बने फंडरेजर
वेस्ट बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु को मिथुन चक्रवर्ती अंकल कहा करते थे. इसके बाद जब भी CPIM सरकार के दौरान फंड जुटाने के लिए कार्यक्रम की जरूरत हुई, मिथुन ने बिना कोई पैसा लिए लाइव परफॉर्मेंस दी. साल 2000 में ज्योति बसु के बाद बुद्धदेब भट्टाचार्जी के बंगाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद मिथुन का लेफ्ट से मोहभंग होने लगा. इधर सुभास चक्रवर्ती का भी अपनी पार्टी में असर कम होने लगा. साल 2009 को सुभास चक्रवर्ती का निधन हो गया. इसके बाद धीरे-धीरे मिथुन राजनीति से दूर हो गए. इधर बंगाल से लेफ्ट का सफाया हुआ और ममता बनर्जी सूबे की सीएम बन गईं.
श्मशान में मिला था सांसद बनने का न्योता
साल 2014 की बात है. बंगाल की मशहूर अभिनेत्री सुचित्रा सेन का निधन हुआ था. क्योराटाला श्मशान में अंतिम संस्कार की रस्में निभाई जा रही थीं. उस वक्त सियासी गलियारे में राज्यसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज थी. तभी ममता बनर्जी ने फैसला किया कि वो मिथुन को अपनी पार्टी से राज्यसभा भेजेंगी. तुरंत मिथुन को संदेश भेजा गया. उस वक्त वो श्मशान में ही मौजूद थे. इसके बाद मिथुन पहले टीएमसी के सदस्य बने, फिर उनको राज्यसभा सदस्य के रूप में संसद में भेज दिया गया. लेकिन शारदा चिटफंड घोटाले में नाम आने के बाद राज्यसभा से इस्तीफा देना पड़ा. करीब दो साल सांसद रहे.
घोटाले में आया था मिथुन चक्रवर्ती का नाम
शारदा चिटफंड घोटाले की वजह से उस वक्त वेस्ट बंगाल की राजनीति में बहुत बवाल मचा था. टीएमसी के दो सांसद एक्टर मिथुन चक्रवर्ती और एक्ट्रेस शताब्दी रॉय ब्रांड एंबेसडर थे. इन दोनों पर भी इसमें शामिल होने के आरोप लगे. इस मामले में साल 2014 में सीबीआई जांच कराई गई. ईडी से पूछताछ में मिथुन ने कंपनी से मिले सारे पैसे लौटाने की बात कही थी. मिथुन को शारदा कंपनी की ओर से करीब 2 करोड़ रुपए की पेमेंट की गई थी. मिथुन ने टैक्स का पैसा छोड़कर बाकी पूरा अमाउंट ईडी के पास जमा करा दिया था. इस घोटाले की वजह से बीमारी की बात कहकर मिथुन ने इस्तीफा दे दिया.
संघ प्रमुख से मिलने के बाद सियासी अटकलें
बंगाल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच पिछले महीने संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मिथुन चक्रवर्ती से मुलाकात की थी. इसके बाद ही सियासी अटकलें तेज हो गई कि मिथुन बीजेपी ज्वाइन कर सकते हैं. मिथुन भी साल 2019 में नागपुर गए थे. इस दौरान उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की थी और उन्हें घर आने का न्योता दिया था. उस दौरान भी मिथुन के भाजपा में आने की अटकलें थीं. खैर, मिथुन ने बीजेपी ज्वाइन कर ली है. मोदी के मंच से उन्होंने बंगाल चुनाव का बिगुल फूंक दिया है. अब देखना दिलचस्प होगा कि मिथुन कितना करिश्मा कर पाते हैं.

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