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Updated: 22 जनवरी, 2023 03:04 PM
मुकेश कुमार गजेंद्र
मुकेश कुमार गजेंद्र
  @mukesh.k.gajendra
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जासूसों की जिंदगी जितनी रहस्यमयी होती है, उतनी ही ज्यादा रोमांचक भी होती है. यही वजह है कि जासूसों पर कई फिल्मों का निर्माण हो चुका है. किसी फिल्म में जासूसों की वास्तविक जिंदगी से परिचय कराया गया है, तो किसी में फैंटेसी के सहारे हाई ऑक्टेन एक्शन सीन करते हुए दिखाया गया है. इस कड़ी में 'राजी' (2018), 'एजेंट विनोद' (2012), 'रोमियो अकबर वॉल्टर' (2019), 'एक था टाइगर' (2012), 'टाइगर जिंदा है' (2017) और 'मद्रास कैफे' (2013) जैसी फिल्मों के नाम प्रमुख हैं. इस कड़ी में एक नई स्पाई थ्रिलर फिल्म 'मिशन मजनू' ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम की जा रही है. सतही और सपाट कहानी पर आधारित इस फिल्म में रहस्य और रोमांच नदारद है. हालांकि, सभी कलाकारों ने बेहतर अभिनय किया है. सिद्धार्थ मल्होत्रा और रश्मिका मंदाना की केमिस्ट्री भी अच्छी लग है.

फिल्म 'मिशन मजनू' के मेकर्स का दावा है कि इसकी कहानी एक रॉ एजेंट की जिंदगी पर आधारित है, जिसे देश ने कभी जाना नहीं है. वैसे ज्यादातर जासूसों की जिंदगी इसी तरह की होती है. वो अपने देश के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा देते हैं. अपने घर, परिवार, समाज और देश को छोड़कर दूसरे मूल्कों में रहकर वहां से सूचनाएं भेजते हैं. लेकिन जब वो पकड़े जाते हैं, तो हमारे देश की सुरक्षा एजेंसियां उनको पहचानने तक से इंकार कर देती हैं. भारत में सर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ दूसरे देशों में जासूसी का काम करती है. खासकर चीन और पाकिस्तान में रॉ का ऑपरेशन चलता रहता है. साल 1971 में भारत की मदद से बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग होकर एक नए मुल्क के रूप में अस्तित्व में आया था. इस दौरान हुए युद्ध में पाकिस्तान के 93 हजार से ज्यादा सैनिकों ने हिंदुस्तान के सामने सरेंडर कर दिया था.

1_650_012123040812.jpgस्पाई थ्रिलर फिल्म 'मिशन मजनू' ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम की जा रही है.

अपनी जगहंसाई से शर्मिंदा पाकिस्तान किसी भी कीमत पर भारत से बदला लेना चाहता था. इसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने परमाणु परीक्षण करके पूरे दुनिया में तहलका मचा दिया था. इससे पाकिस्तान ज्यादा बौखला गया. उनको लगा कि बांग्लादेश की तरह हिंदुस्तान उनसे कश्मीर भी छीन लेगा. इस डर की वजह से पाकिस्तान ने भी न्यूक्लियर प्रोग्राम शुरू कर दिया. इसकी भनक हिंदुस्तान को लग गई. यहां रॉ चीफ आर एन काव ने तुरंत इंदिरा गांधी को सूचित किया. उनकी अनुमति के बाद पाकिस्तान में अपने जासूसों को एक्टिवेट कर दिया. इसी दौरान पाकिस्तानी आर्मी ने अपने देश की सरकार का तख्ता पलट करके सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ले लिया. इधर इमरजेंसी की वजह से इंदिरा गांधी भी सत्ता से बाहर हो गईं. उनकी जगह मोरार जी देसाई प्रधानमंधी बन गए. आगे की कहानी फिल्म में दिखाई गई है.

फिल्म 'मिशन मजनू' की कहानी भारतीय जासूस अमनदीप अजितपाल सिंह (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की जिंदगी पर आधारित है, जो कि पाकिस्तान में तारिक अली नामक दर्जी बनकर रहता था. फिल्म में इस जासूसी मिशन और जासूस के बारे में कुछ इस तरह बताया गया है, ''वर्ल्ड वॉर 2 के दौरान पहली बार किसी देश ने न्यूक्लियर बम का इस्तेमाल किया था. अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में बम गिराकर वर्ल्ड वॉर तो खत्म कर दिया, लेकिन दुनियाभर में एक नई रेस शुरू हो गई. न्यूक्लियर बम बनाने की रेस. 1971 में पाकिस्तान तीसरी बार जंग हार चुका था. वो अपनी हार का किसी भी कीमत पर बदला लेना चाहते थे. भारत पर धाक जमाने का उनके पास एक ही तरीका था. वो था न्यूक्लियर बम बनाना. लेकिन जंग हथियारों से नहीं इंटेलिजेंस से जीती जाती है. इंडिया का ट्रंप कार्ड था रॉ. हमारे जासूस पेशावर से कराची तक फैल हुए थे. इनका काम गोली बारूद चलाना नहीं था, बल्कि जरूरी सूचनाएं देश भेजना था. अपनी मिट्टी से दूर मिट्टी के सिपाही. मेरा नाम आर एन काव है. मैं रॉ चीफ हूं. ये कहानी ऐसे ही एक जाबांज सिपाही की है.''

इस फिल्म में दिखाया जाता है कि अमनदीप के पिता के दामन पर देशद्रोह का ठप्पा लगा होता है, जिसकी वजह से वो खुदकुशी कर लेते हैं. अपनी पिता के दामन पर लगे दाग को छुड़ाने के लिए वो जासूस बन जाता है. पाकिस्तान में तारिक अली के नाम से दर्जी का काम करने लगता है. इसी दौरान एक नेत्रहीन मुस्लिम लड़की नसरीन (रश्मिका मंदाना) से उसकी मुलाकात होती है. वो उससे प्यार करने लगता है. दोनों बाद में शादी कर लेते हैं. इसी दौरान रॉ चीफ आर एन काव (परमित शेट्ठी) उसे पाकिस्तान के न्यूक्लियर मिशन का पता लगाने की जिम्मेदारी सौंपते हैं. भारत की तरह से इसे 'मिशन मजनू' नाम दिया जाता है. अमनदीप की मदद के लिए दो अंडर कवर एजेंड शारिब हाशमी और कुमुद मिश्रा सामने आते हैं. तीनों मिशन प्लान करते हैं. बहुत जल्द न्यूक्लियर फैसिलिटी का पता लगा लेते हैं. लेकिन अंदर की जानकारी हासिल करने के लिए अमनदीप अपनी जान जोखिम में डालकर वहां जाने का फैसला करता है. क्या अमनदीप अपने मिशन में कामयाब होगा? क्या वो अपने पिता के दामन पर लगे दाग धो पाएगा? जानने के लिए फिल्म देखनी होगी.

शांतनु बागची के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा, रश्मिका मंदाना, शारिब हाशमी, परमीत सेठी, शिशिर शर्मा और कुमुद मिश्रा लीड रोल में हैं. फिल्म की कहानी परवेज शेख और असीम अरोरा ने लिखी है, जबकि पटकथा सुमित बथेजा, परवेज शेख और असीम अरोरा ने तैयार किया है. फिल्म की कहानी बहुत कमजोर है. एक स्पाई फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष रहस्य और रोमांच होता है, जो कि इस फिल्म में नदारद है. एक सामान्य सिने प्रेमी भी फिल्म देखते हुए उसके अंत का अनुमान लगा लेगा. जासूसों की जिंदगी पर बनी ऐसी कई कहानी रुपहले पर्दे पर पहले भी देखी जा चुकी हैं. इसलिए इसमें नयापन नहीं है. फिल्म के किरदारों की वेशभूषा (दिव्या गंभीर और निधि गंभीर द्वारा तैयार किया गया है) से लेकर उनके बोलने के तरीके और सेट डिजाइन (रीता घोष द्वारा तैयार किया गया है) तक, सब कुछ रूढ़िवादी होने की वजह से फिल्म की प्रामाणिकता में बाधा डालता है. फिल्म खत्म होने के बाद सुमित बथेजा द्वारा लिखे गए एक भी संवाद याद नहीं रहते. बतौर निर्देशक शांतनु बागची की ये पहली फिल्म है, लेकिन वो असफल साबित हुए हैं.

कोरोना काल में अमेजन प्राइम वीडियो पर सिद्धार्थ मल्होत्रा की फिल्म 'शेरशाह' रिलीज की गई थी. इस फिल्म की जबरदस्त सफलता ने सिद्धार्थ को सुपर स्टार बना दिया है. लेकिन 'मिशन मजनू' जैसी फिल्म ने उनकी साख पर बट्टा लगाने का काम किया है. उनको ये फिल्म नहीं करनी चाहिए थी. इसमें कोई दो राय नहीं कि सिद्धार्थ ने फिल्म में बेहतर अभिनय किया है. कुछ एक्शन सीक्वेंस भी अच्छे हैं. लेकिन कमजोर कहानी और लचर निर्देशन ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया है. रश्मिका मंदाना ने अपने किरदार को ईमानदारी से निभाया है. सिद्धार्थ के साथ उनकी केमिस्ट्री भी अच्छी लग रही है. इसके साथ ही शारिब हाशमी और कुमुद मिश्रा ने हमेशा की तरह शानदार अभिनय किया है. लंबे समय बाद परमीत सेठी को देखना भी अच्छा लगता है. कुल मिलाकर, 'मिशन मजनू' कहने के लिए एक स्पाई थ्रिलर फिल्म है, क्योंकि इसमें न तो रहस्य है, न ही रोमांच है. यदि आपके पास खाली समय है. टाइम पास के लिए कोई नई फिल्म देखना चाहते हैं, तो ही इसे देखिए. वैसे इसे देखते वक्त आलिया भट्ट की फिल्म 'राजी' की याद जरूर आ जाएगी.

iChowk रेटिंग- 5 में 2 स्टार

लेखक

मुकेश कुमार गजेंद्र मुकेश कुमार गजेंद्र @mukesh.k.gajendra

लेखक इंडिया टुडे ग्रुप में सीनियर असिस्टेंट एडिटर हैं.

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