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Updated: 14 अप्रिल, 2021 05:08 PM
मुकेश कुमार गजेंद्र
मुकेश कुमार गजेंद्र
  @mukesh.k.gajendra
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करन जौहर की अपकमिंग डॉक्युमेंट्री 'सर्चिंग फॉर शीला' (Searching For Sheela) का ट्रेलर रिलीज होते ही सुर्खियों में छा गया है. इसमें आचार्य रजनीश उर्फ ओशो की सबसे करीबी शिष्या मां आनंद शीला अपनी गुमनाम की जिंदगी के बारे में बात करती हुई नजर आ रही हैं. साल 2019 में भारत यात्रा पर आईं शीला से करण जौहर ने उनके जीवन से जुड़े कई अहम मुद्दों पर बातचीत की थी, जिसे डॉक्युमेंट्री के रुप में पेश किया जा रहा है. इस बातचीत में शीला बता रही हैं कि वो आज भी ओशो को बहुत प्यार करती हैं. ओशो भी उनसे बहुत प्यार करते थे. शीला को उनकी जिंदगी से जुड़े विवादों और जेल में बिताए 39 महीने के बारे में बात करते भी देखा जा सकता है. 22 अप्रैल को ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर 'सर्चिंग फॉर शीला' की स्ट्रीमिंग होगी.

'ओशो' और 'शीला' के रहस्यमयी रिश्ते की कहानी हर किसी को हैरान करती है. शीला ओशो की शिष्या थीं. उनके ओशो मूवमेंट की प्रवक्ता, सेक्रेटरी और अमेरिका स्थित रजनीशपुरम आश्रम की मैनेजर भी थीं. सही मायने में कहा जाए, तो ओशो को भारत से अमेरिका ले जाने वाली, वहां उनका साम्राज्य स्थापित करने वाली और उनकी आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक हैसियत बनाने वाली शीला ही थीं. उनको ओशो की प्रेमिका भी कहा जाता है. वह खुद भी कहती हैं कि ओशो उनको बहुत प्यार करते थे, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि ओशो ने शीला पर इतने संगीन आरोप लगाए? उनको हत्यारिन और साजिशकर्ता तक कह दिया? साल 1984 में यूएस में हुए रजनीशी बायो टेरर अटैक का दोषी मानते हुए शीला को 20 साल की सजा हुई, लेकिन महज 39 महीने में ही वो रिहा हो गईं.

untitled-2-650_041321094823.jpgमां आनंद शीला, ओशो के लिए प्रेमिका, प्रवक्ता, सेक्रेटरी और मैनेजर, कई भूमिकाओं में थीं.

शीला से पहले ओशो को समझना जरूरी

मां आनंद शीला की कहानी जानने से पहले आचार्य रजनीश के ओशो तक के सफर को समझना बहुत जरूरी है. रजनीश का जन्म 11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में एक व्यापारी परिवार में हुआ था. 11 भाई-बहनों में से एक रजनीश का असली नाम चंद्र मोहन जैन था. उनका पालन-पोषण अपने नाना-नानी के घर हुआ था. वह जब 7 साल के थे, उनके नाना का निधन हो गया. उसके बाद वह अपने माता-पिता के पास चले आए. 15 साल की उम्र में उनकी गर्लफ्रेंड का निधन हो गया. इन दोनों मौतों ने रजनीश को झकझोर दिया. इसके बाद वह 'जीवन दर्शन' को समझने की कोशिश करने लगे. पारंपरिक धर्म के आलोचक बन गए. सांसों पर नियंत्रण, योग, ध्यान, उपवास, और सम्मोहन जैसी क्रियाएं करने लगे. हालांकि, कुछ समय के लिए वो भारतीय राष्ट्रीय सेना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़े, लेकिन वो किसी विचारधारा, प्रणाली और अनुशासन में कहां बंधने वाले थे, जल्दी ही दोनों संगठनों से अलग हो गए.

क्रांतिकारी विचारों ने बनाया था लोकप्रिय

'जीवन दर्शन' को समझने के लिए रजनीश ने साल 1957 में सागर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में MA कर लिया. इसके बाद लेक्चरर की नौकरी के साथ पूरे देश में घूम-घूम कर समाज, धर्म और जीवन पर उपदेश देने लगे. यही से आचार्य रजनीश का जन्म हुआ. जीवन, मृत्यु, रीति-रिवाज और धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ उनके क्रांतिकारी विचारों और बयानों की वजह से पूरे देश में लोग उनको जानने लगे. लोगों ने उनका विरोध किया, लेकिन बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयाई/शिष्य भी बने. उन्होंने लोगों को ध्यान और योग की तरफ आगे बढ़ने के लिए कहा, इसके लिए मेडिटेशन कैंप भी आयोजित करने लगे. यहां आकर लोग अपने सारे दुख-दर्द भूल जाते थे. उन्हें राहत मिलती थी. उन्होंने पुणे में अपना आश्रम बनाया, जहां धीरे-धीरे बड़ी संख्या में विदेशी भक्त भी आने लगे.

ऐसे हुई थी ओशो और शीला की मुलाकात

आचार्य रजनीश अब ओशो बन चुके थे. उनके पुणे स्थित आश्रम में ही शीला अंबालाल पटेल यानि मां आनंद शीला से उनकी पहली मुलाकात हुई थी. शीला का जन्म 28 दिसंबर 1949 में गुजरात के बड़ौदा में गुजराती दंपति अंबालाल और मणिबेन पटेल के घर हुआ था. 18 साल की उम्र में पढ़ाई के लिए अमेरिका चली गई. न्यूजर्सी में मोंटक्लेयर स्टेट कॉलेज से पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने मार्क हैरिस सिल्वरमैन से शादी कर ली. साल 1972 में वह अपने पति के साथ आध्यात्मिक अध्ययन के लिए भारत आईं. पुणे स्थित ओशो के आश्रम पहुंची. यहां ओशो के विचार, व्यवहार और क्रियाक्लाप से इतनी प्रभावित हुईं कि उनको अपना गुरु बना लिया. इसी बीच शीला के पति की मौत हो गई. इसके बाद वह ओशो के आश्रम में ही रहने लगीं. साल 1981 में ओशो ने शीला को अपना सेंक्रेटरी बना लिया. वो उनके आश्रम का सारा काम मैनेज करने लगीं. उनके कहने पर ओशो ने अमेरिका के ओरेगन में 64 हजार एकड़ जमीन अपना भव्य आश्रम 'रजनीशपुरम' बसा दिया.

Searching For Sheela Official Trailer... 

राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने किया बर्बाद

मां आनंद शीला की सलाह पर ओशो भारत से अमेरिका शिफ्ट हो गए. उधर, समर्थन और संपत्ति अर्जित करने के बाद शीला के अंदर राजनीतिक शक्ति की महत्वाकांक्षा जग गई. साल 1984 में हुए वास्को काउंटी चुनाव में दो सीटों पर कब्जा करना चाहती थीं. इसलिए आश्रम के पास से स्थानीय लोगों को भागकर बाहरी लोगों को बसाने की योजना बनाई. जहरीले पेड़-पौधों और बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया, ताकि लोग बीमार पड़ जाएं और वहां से भाग जाएं. लेकिन उनकी साजिश नाकाम रही और उनको साल 1985 में वहां से भाकर यूरोप जाना पड़ा. इधर, ओशो भी शीला के बारे में जान चुके थे. उनके सामने सारे राज खुल चुके थे. ओशो ने उन पर आगजनी, वायर टैपिंग, हत्या के प्रयास और जहर देने जैसे गंभीर आरोप लगाए. इसके बाद शीला को गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर मुकदमा चलाया गया. कोर्ट ने उन्हें 20 साल की जेल की सजा सुना दी. लेकिन महज 39 साल की जेल के बाद उनको रिहा कर दिया गया. इसकी वजह शीला अपने अच्छे कार्य-व्यवहार को बताती हैं.

पुणे में हुई थी ओशो की रहस्यमयी मौत

साल 1985 में ही शीला की गिरफ्तारी के बाद ओशो भारत वापस लौट आए. 19 जनवरी 1990 को 58 वर्ष की उम्र में पुणे स्थित आश्रम में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई. मौत का आधिकारिक कारण तो हार्ट अटैक बताया गया, लेकिन उनके शिष्यों का कहना था कि अमेरिका के जेल में रहने के दौरान उनको खाने में जहर दे दिया गया था. ये ऐसा जहर था, तो इंसान को धीमी मौत देता है. उधर, जेल से रिहा होने के बाद शीला ने ओशो आश्रम में मिले एक स्विस नागरिक से शादी कर ली. कुछ समय बाद उस पति की भी मौत हो गई. शीला इस वक्त स्विटजरलैंड में रहती हैं. वहां बुजुर्गों का ध्यान रखने के लिए दो नर्सिंग केयर होम चलाती हैं. हालांकि, कहा तो यहां तक जाता है कि शीला ने ही अपने दोनों पतियों की हत्या की है. ऐसा उन्होंने आश्रम में अपने एक साथी को बताया भी था.

एक अच्छे उद्योगपति थे आचार्य रजनीश

मां आनंद शीला ने एक किताब भी लिखी है, जिसका नाम है, 'डोंट किल हिम! द स्‍टोरी ऑफ माई लाइफ विद भगवान रजनीश'. इसमें उन्होंने ओशो के जीवन के बारे में बहुत विस्तार से लिखा है. वह लिखती हैं, 'भगवान रजनीश एक अच्छे उद्योगपति भी थे. वे अपने उत्पादों की कीमत और उसके बाज़ार को बखूबी समझते थे. वे आश्रम की मदद से सारी कीमतें वसूल लेना चाहते थे. आश्रम के लिए प्रवेश शुल्क भी उनके ही कहने पर ही रखा गया. उनके आश्रम के थेरेपिस्ट्स भी उन्हें इस काम में मदद करते. आश्रम में थेरेपी भोजन की तरह दी जाती. सैलानी अपने पसंद की थेरेपी कराते और उसकी कीमत भी अदा करते. आश्रम दूसरी सुविधाओं के लिए भी फीस लिया करता. पैसा वहां पानी की तरह बहता था. 70 के दशक के शुरुआती दिनों में इन थेरेपिस्ट ने विदेशियों के मनोविज्ञान को बहुत प्रभावित किया. उनके लिए ये थेरेपी आधुनिक मनुष्य को संतुष्ट/तृप्त करने का एक ज़रिया थीं. अलग-अलग ग्रुप के लोगों पर इनका अलग-अलग प्रभाव पड़ता था.'

थेरेपी के केंद्र में होती थी सेक्सुअलिटी

बता दें कि ओशो के आश्रम में दी जाने वाली 'थेरेपी' में ध्यान, साधना, सेक्स और योग सहित कई क्रियाएं शामिल होती थीं. इससे थेरेपी लेने वाले को गुस्से, नफरत, ईर्ष्या, शारीरिक कुंठाओं जैसे मनोभावों से मुक्त होने में मदद मिलती थी. खुद ओशो का भी मानना था कि मोहमाया और हर तरह की ईच्छा विरक्त इंसान ही तृप्ति पा सकता है. जो मनुष्य इन नकारात्मक भावों से मुक्त हो जाएगा वह आसानी से अपने भीतर की, अपने अंतर्मन की यात्रा कर पाएगा. उन्होंने अपनी किताब 'संभोग से समाधि की ओर' में इसका जिक्र भी किया है. सेक्सुअलिटी को ज्यादातर समस्याओं का कारण माना जाता इसलिए इन सारी थेरेपी के केंद्र में सेक्सुअलिटी को ही रखा जाता था. ओशो सेक्सुअलिटी के मसले पर नैतिकता और अपराधबोध से आगे निकल जाने की सलाह देते थे. शीला लिखती हैं, 'रजनीश संन्यासिनों का शोषण कर रहे थे. यह शोषण, ज्ञान की कीमत थी. गुरु दक्षिणा जैसी. और मैंने वह कीमत ख़ुशी ख़ुशी अदा की. ये थेरेपी ग्रुप खूब चलते थे.'

लेखक

मुकेश कुमार गजेंद्र मुकेश कुमार गजेंद्र @mukesh.k.gajendra

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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