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Updated: 06 मार्च, 2022 08:04 PM
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स्पोर्ट्स बायोग्राफिकल ड्रामा झुंड नागराज मंजुले की पहली बड़ी फिल्म है. पहली हिंदी फिल्म भी. अब तक मंजुले मराठी में ही फ़िल्में बनाते आए हैं. मंजुले को मुखर निर्देशकों में शुमार किया जाता है. उनकी फ़िल्मी कहानियों में जातीय भेदभाव प्रमुखता से केंद्र में रहे हैं. पिस्तुलया (Pistulya) से झुंड तक मंजुले हमेशा वैचारिक जमीन पर खड़े नजर आए हैं. हालांकि लीक से हटकर फ़िल्में बनाने के बावजूद मंजुले को सिनेमाघरों में खूब दर्शक मिलते थे. लेकिन झुंड की टिकट खिड़की के सामने वैसा नजारा नहीं दिख रहा जो सैराट के समय आम था.

समीक्षाओं में मंजुले के झुंड की जमकर तारीफ़ हुई है. प्राय: समीक्षकों ने फिल्म को 3 से ज्यादा पॉइंट देकर रेट किया. यहां तक कि अब तक जिन दर्शकों ने भी फिल्म देखी है उनकी प्रतिक्रियाओं में भी झुंड के रूप में मंजुले का काम लाजवाब दिख रहा है. नागपुर में स्लम सॉकर की स्थापना करने वाले विजय बोरसे के जीवन पर आधारित फिल्म 4 मार्च को रिलीज हुई थी. टिकट खिड़की पर पहले दिन फिल्म ने 1.50 करोड़ का कारोबार किया. दूसरे दिन  फिल्म का कलेक्शन बढ़ा और 2.10 करोड़ रहा. तीसरे दिन झुंड ने 3.60 करोड़ का कारोबार किया.

झुंड की कमाई में घाटा नजर नहीं आ रहा, पर जो दिख रहा उससे बेहतर अपेक्षा थी  

यानी कुल 7.20 करोड़ का कारोबार. इस हिसाब से पहले हफ्ते फिल्म का 15 करोड़ कमाना भी मुश्किल दिख रहा है. हालांकि करीब 22 करोड़ के बजट में बनी फिल्म के अबतक के कलेक्शन खराब नहीं कहा जा सकता. यह भी नहीं कहा जा सकता कि कमाई निर्माताओं को होने वाले घाटे का संकेत है. पर जब मंजुले की ही सैराट से फिल्म की तुलना करते हैं तो कारोबारी फीडबैक को अपेक्षाओं पर खराब ही माना जाएगा. जाति के सवाल को लेकर पिछले कुछ सालों में आई साउथ की कमर्शियल फिल्मों के मुकाबले भी झुंड का बिजनेस निराश करता है.

महाराष्ट्र के एक अंचल में ऑनर किलिंग को दिखाने वाली टीनएज प्रेम कहानी 'सैराट' का बजट करीब 4 करोड़ रुपये ही था. मराठी में आई रोमांटिक ड्रामा ने बॉक्स ऑफिस पर करीब 100 करोड़ से ज्यादा कारोबार कर हर किसी को हैरान कर दिया था. सैराट ने पहले 10 दिन में ही 41.11 करोड़ रुपये कमा लिए थे. इसमें भी पहले हफ्ते का हिस्सा 25.50 करोड़ था. अब पहले हफ्ते में सैराट के 25.50 करोड़ के मुकाबले झुंड (15 करोड़ से नीचे ही रहेगा) की कमाई बेहद कम है. जबकि दिलचस्प पहलू यह भी है कि सैराट मराठी में थी. सिनेमाघरों में उसे मराठी दर्शक ही मिले थे. रिलीज से पहले सैराट की हाइप ना के बराबर थी. फिल्म की स्टारकास्ट भी ऐसी नहीं थी कि माना जाए उनकी वजह से दर्शक टूट पड़े थे. मंजुले भी जाना पहचान नाम तो थे, पर उन्हें दर्शकों की भीड़ खींचने वाला निर्देशक नहीं कहा जा सकता. ऐसा निर्देशक जिसकी फिल्म से 100 करोड़ कारोबार की अपेक्षा की जाए.

jhund झुंड और सैराट के बॉक्स ऑफिस में क्या फर्क दिख रहा है.

महाराष्ट्र के सिनेमाघरों में हिंदी फिल्मों का कारोबारी दबदबा रहता है. हिंदी फिल्मों के कारोबार का सबसे बड़ा हिस्सा यहीं से निकल कर आता है. सैराट ने सारी बाधाओं को पार किया और वर्ड ऑफ़ माउथ की वजह से कीर्तिमान बनाए. झुंड की तुलना में पिछले कुछ सालों के दौरान साउथ से आई कमर्शियल फिल्मों का कारोबार देखें तो उस लिहाज से भी मंजुले की फिल्म का कलेक्शन बहुत औसत नजर आता है. रजनीकांत की काला और कबाली भी पॉपुलर धारा में जाति के सवाल पर बात करती हैं. इन फिल्मों के हिंदी वर्जन की कमाई ऐतिहासिक है. मजेदार यह भी है कि फिल्मों ने मुंबई सर्किट में ही सबसे ज्यादा कारोबार किया.

झुंड को नुकसान कहां हुआ और सैराट ने बाजी कहां मारी थी

दूसरी तरफ झुंड का स्केल सैराट के मुकाबले कहीं बहुत बड़ा था. फिल्म पहले दिन से ही चर्चा में है. अमिताभ बच्चन का मुख्य भूमिका में होना बहुत बड़ा प्लस पॉइंट था. इस वक्त मुंबई और उसके आसपास के 14 जिलों के सिनेमाघरों में 100 प्रतिशत दर्शक क्षमता की अनुमति है. हिंदी में होने की वजह से झुंड एक रिलीज के साथ ही महाराष्ट्र के बाहर एक व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच रही है. फिल्म की कहानी भी प्रेरक होने के साथ महाराष्ट्र की स्थानीय कहानी है. बावजूद तमाम चीजें दर्शकों को आकर्षित करती नहीं दिख रही हैं.

वैसे झुंड के कुल 7.20 करोड़ के कारोबार में बड़ा हिस्सा मुंबई सर्किट का ही है. हिंदी रीजन्स में फिल्म का कलेक्शन बहुत ही निराशाजनक है. समीक्षकों ने फिल्म की जिस तरह तारीफ़ की और प्रोजेक्ट के पक्ष में दिख रही अन्य चीजों से काफी बेहतर कारोबार का अनुमान था. कहीं कहीं फिल्म के डिस्ट्रीब्यूशन में लोचा नजर आ रहा है. सैराट भले मराठी में थी मगर उसकी स्क्रीनिंग ठीकठाक हुई थी. फिल्म महाराष्ट्र के सभी प्रमुख शहरों में थी. सैराट को रिलीज के बाद वर्ड ऑफ़ माउथ से इसका फायदा मिला था. झुंड है तो महाराष्ट्र की ही कहानी, पर महाराष्ट्र के ही अलग अलग अंचलों में तमाम लोग यह शिकायत करते सुने जा रहे हैं कि उनके शहर या कस्बे में फिल्म है ही नहीं. विदर्भ में नागपुर और आसपास के कुछ जिलों में फिल्म की स्क्रीनिंग नहीं होने की बातें कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर रखी हैं. माना जा सकता है जिस क्षेत्र में सबसे ज्यादा बिजनेस निकाला जा सकता था वह इस एक चीज ने मंजुले की फिल्म को कमजोर किया.

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