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Updated: 16 सितम्बर, 2020 11:45 AM
मीनाक्षी कंडवाल
मीनाक्षी कंडवाल
  @meenakshi.kandwal
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डियर बॉलीवुड,

ड्रग्स लेना ‘कूल’ नहीं है!

ड्रग्स लेना ‘क्रिएटिव’ नहीं है!

ड्रग्स लेना ‘कल्चर’ नहीं है!

ड्रग्स लेना ‘कंपनी’ भी नहीं है!

और कानूनी तो बिल्कुल नहीं है!

वैसे इस सब ‘नहीं’ के दायरे में और भी बहुत कुछ आता है. लेकिन संसद में हिंदी सिनेमा की महानायिका रहीं जया बच्चन जी ने जिस अंदाज में बॉलीवुड पर आंच आने पर नाराज़गी जाहिर की... उसने इस ‘नहीं’ में सबसे बड़ी लाइन जोड़ दी है.

“बॉलीवुड अपनी गंदगी पर उठने वाले सवालों के प्रति जवाबदेही ‘नहीं’ चाहता”!

ड्रग्स मामले को संसद में बीजेपी सांसद और एक्टर रवि किशन द्वारा उठाए जाने पर जया बच्चन कहती हैं कि “जिस थाली में खाते हैं उसमें छेद करते हैं”... फिल्ममेकर अनुभव सिन्हा, जया जी के बयान को ‘रीढ़ की हड्डी’ कहते हैं. एक्ट्रेस सोनम कपूर कहती हैं वो जया जी जैसी बनना चाहती हैं. समर्थन के स्वर लिस्ट में जुड़ते जाते हैं.

Jaya Bachchan Bollywood drugsजया बच्चन समेत बॉलीवुड के वरिष्ठ लोगों को ही तय करना है कि वह फिल्म इंडस्ट्री की सफाई को चुनते हैं या गंदगी को कारपेट के नीचे धकेलना चाहते हैं.

‘थाली’ की इस एनॉलजी को समझिए... थाली क्या खैरात में मिली? थाली में खाने वाला कौन है.. क्या मुफ्तखोर है? थाली में मौजूद ‘खाने’ की शिकायत में किसी ने अगर आवाज़ उठा दी... तो ‘विरोध के स्वर’ को लोकतंत्र की ताकत बताने वाला बॉलीवुड इतना ‘असहिष्णु’ क्यों हो गया?

जया बच्चन सांसद हैं.. फिल्म इंडस्ट्री की प्रतिनिधि होने के नाते उनका हक है इंडस्ट्री के मुद्दों पर बोलना. लेकिन इस बयान की टाइमिंग भी अहम है. ये देखना बेहद दुखद है कि एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने बॉलीवुड के काम करने के तरीके को कई तरह से कटघरे में खड़ा किया है... नेपोटिज्म से लेकर बॉलीवुड के गैंग्स और अब ड्रग्स. ड्रग्स मामले की जांच में स्टार किड्स का नाम सामने आना सनसनीखेज तो है लेकिन चौंकाता नहीं है क्योंकि ड्रग्स बॉलीवुड का ‘ओपन सीक्रेट’ है. लेकिन ‘डर’ तो ओपन सीक्रेट के खुलने का भी होता है. यही वजह है कि इंडस्ट्री और इंडस्ट्री के दिग्गज एक घनघोर खामोशी में डूबे हैं.

लेकिन ये खामोशी टूटती है देश के सबसे बड़े मंच से, बॉलीवुड के सबसे प्रतिष्ठित परिवार और सर्वमान्य हस्ती की तरफ से. जया बच्चन की नाराज़गी लाज़िमी है.. क्योंकि ड्रग्सखोर पूरे बॉलीवुड का प्रतिनिधित्व नहीं करते, और ना ही उनके आधार पर पूरे बॉलीवुड को ‘गटर’ कहा जा सकता है.

सबसे बड़ा सवाल ये है कि ये ‘ड्रग्सखोर’ गैंग कितना बड़ा और प्रभावशाली है? कितने इनको फॉलो करने लगते हैं? कितनों की किस्मत ये तय करता है? कितने नए आर्टिस्ट और इंडस्ट्री में काम करने वालों को इन ‘भाग्यविधाताओं’ की संगत पाने के लिए ड्रग्स की सीढ़ी का इस्तेमाल करना पड़ता है? कितने इन बड़े-बड़ों का चेहरा छिपाने के लिए ड्रग्स डीलिंग-पेडलिंग और प्रोक्यूरमेंट से जुड़ जाते हैं? और ना जाने कितने वो ‘संघर्षशील’ हैं जो इन ‘ड्रग्समाफिया’ को ‘ना’ कहने की कीमत चुकाते हैं?

बॉलीवुड में जारी इतने गंभीर अपराध की जांच इसलिए ना हो क्योंकि बॉलीवुड इंडस्ट्री से देश को सबसे ज्यादा टैक्स और डोनेशन मिलते हैं? ये आपकी दलील है.. और दलील का एक्सटेंशन ये कि ‘जया जी के बयान का गलत मतलब ना निकाला जाए’.. !!

बॉलीवुड को ‘बदनाम’ क्या किसी ‘बाहरवाले’ ने किया?

फिल्मी घरानों से साराअली खान, श्रद्धा कपूर के नाम तो आज सामने आए हैं लेकिन इनके सीनियर्स ने क्या किया..? ऐसा कौन सा नशा है जो संजय दत्त ने नहीं किया. क्या फरदीन खान ड्रग्स के मामले में जेल नहीं गए. एक्टर विजय राज से लेकर डीजे अकील तक ड्रग्स मामले में पकड़े गए. रणबीर कपूर ने एक इंटरव्यू में ड्रग्स लेना स्वीकार किया. प्रतीक बब्बर से लेकर हनी सिंह तक नशे की लत छुड़वाने के लिए रिहेब भेजे गए.

यूथ ऑइकॉन से लेकर फैशन ऑइकॉन के नाम पर जितने अवॉर्ड आपने हासिल किए, जितने मैग्जीन कवर पर आप छाए रहे.. उस सम्मान के प्रति सार्वजनिक जीवन में एक जिम्मेदारी होती है. और उसका हिसाब आज कानून की कसौटी पर चुकाना पड़ा तो दुहाई दी जा रही है कि पूरे बॉलीवुड को ‘गटर’ ना कहें. लेकिन यही बॉलीवुड जब ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म बनाता है.. पंजाब राज्य अपना नाम खराब होने की शिकायत करता है तो अनुराग कश्पय जवाब देते हैं “हमने कम से कम ड्रग्स माफिया के खिलाफ फिल्म बनाने की हिम्मत तो दिखाई, समस्या तो पूरे देश की है”... और एक पूरी लॉबी सिनेमा में विचारों की आजादी मांगने लगती है. ये डबल स्टैंडर्ड क्यों ?

क्रिकेट से लेकर राजनीति तक की दुनिया जब जब काले अध्यायों से गुजरी है तो उसने आलोचनाओं का सामना किया है.. लेकिन आपकी {बॉलीवुड} की आलोचना हुई तो स्टार्स को बचाने का एक डिफेंस सिस्टम एक्टिव हो गया!

ये ‘डिफेंस-सिस्टम’ किसी भी तरह के पर्दाफाश होने की स्थिति में एक रोगप्रतिरोधक कवच की तरह ‘बड़ी-मछलियों’ के काम आएगा. इस डिफेंस मैकेनिज्म को सत्ता से लेकर सिस्टम और जांच करने वालों तक का संरक्षण प्राप्त है. इस संरक्षण के बिना क्या मुमकिन है कि लॉक्डाउन में जहां आम आदमी को बुनियादी जरुरतों तक के लिए भटकना पड़ा.. वहां उसी लॉक्डाउन में ड्रग्स की खेप, ड्रग्स की ऐशगाहों तक बेरोक-टोक पहुंचती रहीं?

खेल बड़ा है.. खिलाड़ी बहुत शातिर... तस्वीर के पीछे बहुत कुछ होता है, बहुत कुछ साधने के लिए.. ये जो पब्लिक है ये सब जानती है!

Drugs In Bollywood, Jaya Bachchan Vs Ravi Kishan, Jaya Bachchan Vs Kangana Ranaut

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