charcha me| 

होम -> सिनेमा

 |  5-मिनट में पढ़ें  |  
Updated: 27 जुलाई, 2022 12:59 PM
आईचौक
आईचौक
  @iChowk
  • Total Shares

सीरियल किलिंग का इतिहास बहुत पुराना है. ठग बहराम से लेकर 'नर पिशाच' सुरेंद्र कोली तक ऐसे अपराधियों के नाम हमारे सामने हैं, जिनके जुर्म के बारे में सुनकर आज भी शरीर सिहर जाता है. यदि इनके बारे में रात को पढ़ लिया तो आंखों से नींद गायब हो जाती है. ठग बहराम तो ऐसा खूंखार कातिल था कि उसने रूमाल से ही सैकड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया था. सुरेंद्र कोली की करतूत हर कोई जानता है. उसने अपनी हवस की प्यास बुझाने के लिए दो दर्जन से ज्यादा बच्चों की बलि चढ़ा दी थी. उनके साथ जिस्मानी जरूरते पूरा करने के बाद उनके मांस तक खाने लगा था. ऐसे ही एक सीरियल किलर ने साल 2003 में दिल्ली में दहशत फैला दी थी. उसने एक के बाद एक सात लोगों की हत्या कर दी. उनके शरीर के अंग काटकर पूरे शहर में फैलाने लगा. इस शातिर किलर पर बनी एक वेब सीरीज 'इंडियन प्रीडेटर: द बुचर ऑफ दिल्ली' नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है.

वेब सीरीज 'इंडियन प्रीडेटर: द बुचर ऑफ दिल्ली' एक क्राइम डॉक्यूमेंट्री सीरीज है, जिसे तीन एपिसोड में रिलीज किया गया है. इस सीरीज का निर्देशन आयशा सूद ने किया है. इसमें मंजीत सिंह, अल्ताफ हुसैन, संजय बंसल, मुकेश पांडे, बन्नी अधिकारी और जितेंद्र शर्मा लीड रोल में हैं. सीरीज को बनाने के लिए मेकर्स की टीम को बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ी थी. इसके रिसर्च के लिए कई बार तिहाड़ जेल तक जाना पड़ा था, जहां सीरियल किलर चंद्रकांत झा बंद है. हालांकि, उसको ये नहीं पता है कि उसकी जिंदगी के ऊपर एक सीरीज बनाई गई है. चंद्रकांत बिहार के मधेपुरा का रहने वाला है. वो दिल्ली में रहकर सब्जी बेचने का काम करता था. उसने दो शादियां की है. दूसरी बीवी से उसे पांच बच्चे हैं. साल 2003 में उसने आधा दर्जन लोगों की हत्या की थी. उसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था. फिलहाल उसे तिहाड़ जेल में रखा गया है. उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई है.

650_072622114510.jpg

आइए सीरियल किलर चंद्रकांत झा की खौफनाक दास्तान जानते हैं...

साल 2003 से 2007 के बीच दिल्ली की जेलों और अदालतों के सामने सिर कटी लाशों के मिलने का सिलसिला शुरू होता है. किसी को कुछ पता नहीं था कि लाशें कौन फेंककर जा रहा है. लाश के साथ एक चिट्ठी भी होती है जिसमें पुलिस को चुनौती दी जाती है कि पकड़ सको तो पकड़ लो. इस तरह पुलिस को खुली चुनौती मिलने से महकमें में हड़कंप मच जाता है. किसी नहीं पता कि वो कातिल कौन है? आखिर वो ये सब क्यों करता है? इस तरह एक के बाद एक सात लोगों की हत्या हो जाती है. आखिरकार लंबे मशक्कत के बाद 20 मई 2007 को पुलिस सिरफिरे कातिल चंद्रकांत झा को गिरफ्तार कर पाई. पुलिस के सामने उसने जो राज खोला उसे सुनने के बाद हर कोई हैरान रह गया.

बिहार के मधेपुरा का रहने वाला चंद्रकांत झा दिल्ली के अलीपुर में रहकर सब्जियां बेचा करता था. उसकी शादी हुए काफी वक्त हो चुके थे. लेकिन बच्चा नहीं होने से परेशान होकर उसने दूसरी शादी कर ली. दूसरी पत्नी ने पांच बच्चों को जन्म दिया. परिवार का खर्च चलाने का दबाव उसे चिड़चिड़ा बना दिया. वो अक्सर गुस्से में रहता था. बात-बात पर भड़क जाना उसकी आदत बन चुकी थी. यहां तक उसकी दुकान पर काम करने वाले लोगों से भी वो अक्सर बुरा बर्ताव करता था. एक दिन किसी बात पर दुकान पर काम करने वाले अमित, उपेंद्र और दिलीप के साथ उसकी झड़प हो गई. उसने एक एक करके तीनों को मौत के घाट उतार दिया. उनके सिर काटकर कभी जेल तो कभी थाने के सामने रख आया.

सीरियल किलिंग की ये कहानी साल 1998 से शुरू हुई. दिल्ली के आदर्श नगर में पहली सिर कटी लाश मिली. इसके 5 साल बाद अलीपुर में एक कॉलेज के सामने सिर कटी लाश मिली. ये लाश बिहार के रहने वाले शेखर की थी. पकड़े जाने के बाद चंद्रकांत ने बताया कि शेखर बहुत शराब पीता था और झूठ बोलता था. 5 महीने बाद 20 नवंबर 2003 को दिल्ली के तिहाड़ जेल के गेट 1 के बाहर एक सिरकटी लाश मिली. लाश प्लास्टिक बैग में बंद थी. ये लाश उमेश नाम के शख्स की थी, जो कि बिहार का रहने वाला था. उसकी हत्या के बारे में चंद्रकांत ने बताया कि वो भी झूठ बोलता था, जो कि उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं है. उसने उसका कई बार भरोसा तोड़ा, इसलिए उसने उसकी हत्या कर दी.

इस वारदात के बाद दो साल तक कोई लाश नहीं मिली. दिल्ली पुलिस को पहले हुए दोनों हत्याओं के बारे में कोई सुराग नहीं मिला. लेकिन 2 नवंबर 2005 को मंगोलपुरी के एक नाले से एक युवक की लाश मिली. वो बिहार के रहने वाले गुड्डू की थी. इसके एक साल बाद 20 अक्टूबर 2006 को तिहाड़ जेल के गेट नंबर 3 के सामने एक सिरकटी लाश मिली. लाश प्लास्टिक के एक बैग में पैक थी, लेकिन इस बार दिल्ली पुलिस के लिए एक चिट्ठी थी. इसमें कातिल ने दिल्ली पुलिस को खुलेआम चुनौती दी थी कि पकड़ सको तो पकड़ लो. कातिल ने दिल्ली पुलिस के सीधे तौर पर चुनौती दी थी. इतना ही नहीं उसने एक बार तो पुलिस को पीसीओ बूथ से फोन कर हत्या की बात कबूली थी. हरिनगर थान के एसएचओ से सात मिनट तक बात करता रहा था. इस दौरान उसने एसएचओ को लगातार चुनौती दी कि वो उसे पकड़ कर गिरफ्तार कर ले. इसके बाद पुलिस ज्यादा सक्रिय हो गई.

पीसीओ बूथ, जिससे चंद्रकांत ने फोन किया, वही उसकी गिरफ्तारी में अहम कड़ी साबित हुआ. पुलिस ने उसे धर दबोचा. सबूत के तौर पर पीसीओ मालिक की गवाही, चंद्रकांत के घर से मिला खून से सना चाकू, उस चाकू पर दिलीप के खून के निशान और पुलिस को भेजी गई चिट्ठी में चंद्रकांत की राइटिंग का मिलना अहम रहा. पुलिस ने चंद्रकांत के खिलाफ दो चार्जशीट दाखिल की थी. पहली चार्जशीट अगस्त 2007 में दाखिल की गई. इसमें उस पर 6 कत्ल का आरोप लगाया गया. इसके 7 महीने बाद मार्च 2008 में दिल्ली पुलिस ने दूसरी चार्जशीट दाखिल की, जिसमें उस पर सातवें कत्ल का आरोप लगाया गया. साल 2013 में रोहिणी कोर्ट ने चंद्रकांत को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी.

लेखक

आईचौक आईचौक @ichowk

इंडिया टुडे ग्रुप का ऑनलाइन ओपिनियन प्लेटफॉर्म.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय